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बच्चे काम पर जा रहे है भावार्थ - कविता का सार

बच्चे काम पर जा रहे हैबच्चे काम पर जा रहे है

कवि परिचय

राजेश जोशी
इनका जन्म सन 1946 में मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ जिले में हुआ। उन्होंने पत्रकारिता, अध्यापन कार्य भी किया। इन्होने कविताओं के अलावा कहानियाँ, नाटक, लेख, और टिप्पणियाँ भी लिखीं। उनकी कविताएँ गहरे सामाजिक अभिप्राय वाली होती हैं।

राजेश जोशीराजेश जोशी

कविता का सार

प्रस्तुत कविता श्री राजेश जोशी जी द्वारा रची गई है। इस कविता का प्रतिपाद्य बाल मज़दूरी तथा बाल श्रम है। कवि ने बाल मज़दूरी के कारण बच्चों से उनका बचपन छिन जाने की पीड़ा को जताने का प्रयास किया है। कवि यहाँ उन सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों की ओर हम सबका ध्यान आकषिर्त कराना चाहते हैं जिनके कारण बच्चे अपना बचपन खो देते हैं। उनकी शिक्षा नहीं हो पाती तथा वे बाल मज़दूरी करने पर विवश हो जाते हैं।

कविता का सार

कवि बताना चाहते हैं कि आर्थिक तंगी के कारण बच्चों को मजदूरी करनी पड़ती है। उन्हें सर्दी के समय में सवेरे कोहरे में ही काम पर जाना पड़ता है। उनके सामने कौन.सी समस्या है? केवल इतना सोचना और कहना ही पर्याप्त नहीं है। न ही कोई भयंकर बात है। बस सोचना यह है कि बच्चे काम पर क्यों जाते हैं किंतु इस प्रश्न का उत्तर भी समाज के पास नहीं है। बहुत बुरी बात है कि बच्चों को खेलने.खाने तथा मौज.मस्ती के समय मजदूरी करनी पड़ती है। कवि पूछते हैं उिनके हाथों के खिलौने किसने छीन लिए क्या उनकी रंग-बिरंगी किताबें काले पहाड़ के नीचे दब गई हैं उनके लिए बना मदरसा क्या किसी भूकंप में ढह गया? जो वे पढ़ने नहीं जाते क्या खेलने के स्थान बाग.बगीचे, आँगन आदि सभी खत्म हो गए जो उन्हें खेलने को नहीं मिलता। नहीं ऐसा कुछ नहीं है। सब कुछ मौजूद है किंतु फिर भी अनेक बच्चे सड़कों पर मज़दूरी करने जाते हैं। यही आश्चर्य है। यही विडंबना है। कवि कहना चाहते हैं कि सभी लोग मिलकर ऐसा कुछ महान कार्य करें जिससे गरीब बच्चे भी पढ़-लिख सकें ताकि उनका भविष्य सुधरे और वे भी खुश हों।

कविता का सार

संदेश

कविता का मुख्य संदेश यह है कि बच्चों का बचपन खेल और पढ़ाई में बिताना चाहिए, न कि मजदूरी में। यह कविता हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम एक समाज के रूप में बच्चों को वह बचपन क्यों नहीं दे पा रहे हैं जिसके वे हकदार हैं।

कठिन शब्द

  1. विवरण - वर्णन
  2. अंतरिक्ष - आकाश
  3. दीमक - एक प्रकार का कीड़ा जो लकड़ी और कागज खा जाता है
  4. मदरसा - स्कूल
  5. हस्बमामूल - सामान्य रूप से
  6. दुर्दशा - बुरी स्थिति
  7. उजागर - प्रकट करना
  8. सामान्य - सामान्य रूप से
  9. मजबूर - विवश
  10. वास्तविकता - सच्चाई
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FAQs on बच्चे काम पर जा रहे है भावार्थ - कविता का सार

1. बच्चे काम पर जा रहे हैं कविता में मुख्य संदेश क्या है?
Ans. यह कविता बाल श्रम की कड़ी आलोचना करती है और दिखाती है कि बचपन को स्कूल में होना चाहिए, काम पर नहीं। कवि राहुल सांकृत्यायन समाज को जगाना चाहते हैं कि कैसे गरीबी की वजह से बच्चों का भविष्य बर्बाद हो रहा है। कविता में बचपन की मासूमियत को खतरे में दिखाया गया है।
2. बच्चे काम पर जा रहे हैं भावार्थ में कवि का दृष्टिकोण कैसा प्रतीत होता है?
Ans. कवि की दृष्टि गहरी सहानुभूति और आक्रोश दोनों से भरी है। वह बाल श्रम को समाज की विफलता मानते हैं। कविता के माध्यम से राहुल सांकृत्यायन आर्थिक असमानता को उजागर करते हैं और यह सवाल उठाते हैं कि आखिर बचपन को ऐसे संकट का सामना क्यों करना पड़ता है।
3. इस कविता में बचपन का प्रतीकवाद कैसे दिखाया गया है?
Ans. बचपन को कविता में खेल, पढ़ाई और स्वप्न से जोड़ा गया है, जो काम के विरुद्ध खड़े हैं। कवि दिखाते हैं कि काम पर जाने वाले बच्चे अपना प्राकृतिक विकास खो रहे हैं। प्रतीकात्मक रूप से, ये बच्चे समाज की व्यवस्था के शिकार हैं।
4. बच्चे काम पर जा रहे हैं कविता से शिक्षा का संदेश क्या निकलता है?
Ans. कविता शिक्षा को बचपन का अधिकार और विकास का मूल आधार बताती है। कवि दर्शाते हैं कि बिना शिक्षा के बच्चे समाज के निचले स्तर पर ही रहते हैं। कविता CBSE के पाठ्यक्रम में सामाजिक जिम्मेदारी सिखाने के लिए शामिल की गई है।
5. क्या बच्चे काम पर जा रहे हैं कविता आज के समय में भी प्रासंगिक है?
Ans. हाँ, भारत में आज भी लाखों बच्चे काम करते हैं। कविता का भावार्थ और सार आधुनिक समय में भी बाल श्रम की समस्या को रेखांकित करता है। यह कविता सामाजिक चेतना बढ़ाती है और पाठकों को बाल कल्याण के प्रति संवेदनशील बनाती है।
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