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This is because:-
We have this table
1. कर्ता कारक – शून्य, ने (को, से, द्वारा)
2. कर्म कारक – शून्य, को
3. करण कारक – से, द्वारा (साधन या माध्यम)
4. सम्प्रदान कारक – को, के लिए
5. अपादान कारक – से (अलग होने का बोध)
6. संबंध कारक – का–के–की, ना–ने–नी; रा–रे–री
7. अधिकरण कारक – में, पर
8. संबोधन कारक – हे, हो, अरे, अजी…….
परंतु इस मे भी हमारे पास से दो बार है: करण व अपादान
करण कारक और अपादान कारक दोनों में ही 'से' विभक्ति का प्रयोग होता है। लेकिन दोनों के प्रयोग में अंतर है। करण कारक : करण कारक में जो 'से' प्रयोग होता है - उसका अर्थ है 'के द्वारा' यानि किसी वस्तु या साधन के द्वारा कोई कार्य किया जाना जैसे - माली खुरपी से घास खोद रहा है।
अपादान का अर्थ है- अलग होना। जिस संज्ञा अथवा सर्वनाम से किसी वस्तु का अलग होना मालूम चलता हो, उसे अपादान कारक कहते हैं। करण कारक की तरह अपादान कारक का चिन्ह भी ’से’ है, परन्तु करण कारक में इसका अर्थ सहायता होता है और अपादान में अलग होना होता है।