आओ, मिलकर बचाएँ - पठन सामग्री और सार Humanities/Arts Notes | EduRev

Hindi Class 11

Humanities/Arts : आओ, मिलकर बचाएँ - पठन सामग्री और सार Humanities/Arts Notes | EduRev

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सारांश-: संथाल समाज में जहाँ एक ओर सादगी, भोलापन, प्रकृति से जुड़ाव और कठोर परिश्रम करने की क्षमता जैसे सकारात्मक तत्व हैं, वहीँ दूसरी ओर उसमें अशिक्षा, कुरीतियाँ और शराब की ओर बढ़ता झुकाव भी है| प्रस्तुत कविता ‘आओ मिलकर बचाएँ’ में दोनों पक्षों का यथार्थ चित्रण हुआ है| प्रकृति के विनाश और विस्थापन के कारण आज आदिवासी समाज का संकट में है, जो कविता का मूल स्वर है|

कवयित्री झारखंड की आदिवासी संस्कृति को शहरी सभ्यता के कुप्रभाव से दूर रखना चाहती हैं| वह तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण अपने प्रदेश को वृक्षविहीन होने से बचाना चाहती हैं| शहरी उच्छृंखलता आदिवासियों के सरल और सहज स्वभाव को प्रभावित कर रही है| कवयित्री चाहती हैं कि आदिवासी समाज के जीवन में उत्साह, जोश, भोलापन, अक्खड़पन तथा जुझारूपन बना रहे, जो झारखंडी संस्कृति की पहचान है| वे धनुष-बाण तथा कुल्हाड़ी को धारण कर अपनी सभ्यता की पहचान बनाए रखें| झारखंड के पर्वतों की शांति, नदियों का शोर, पहाड़ी गीतों का धुन उसे एक अलग विशिष्टता प्रदान करते हैं| वह चाहती हैं कि संथाल परगना की मिट्टी की सुगंध तथा उन पर लहलहाती फसलें ज्यों की त्यों बनी रहे| उन पर शहरी जीवन का प्रभाव न पड़े| कवयित्री के अनुसार वर्तमान युग में आपसी संदेह का वातावरण छाया हुआ है और लोगों में ईर्ष्या-द्वेष की भावना बढ़ रही है| वह चाहती हैं कि उनका संथाल समाज इन बुराइयों से बचा रहे तथा उनकी स्वाभाविक सहजता तथा संवेदनशीलता बनी रहे| इस प्रकार वह मनुष्य-जीवन के बीच घटते अविश्वास, आस्था, आशा आदि को बचाकर अपने आदिवासी संस्कृति को धूमिल होने से बचाना चाहती हैं| 


कवयित्री-परिचय-: निर्मला पुतुल

जन्म - सन् 1972, दुमका (झारखंड) में|

प्रमुख रचनाएँ - नगाड़े की तरह बजते शब्द, अपने घर की तलाश में|

इनका जन्म एक आदिवासी परिवार में हुआ| इनका आरंभिक जीवन बहुत संघर्षमय रहा| घर में शिक्षा का माहौल होने के बावजूद रोटी की समस्या से जूझने के कारण नियमित अध्ययन बाधित होता रहा| उन्होंने नर्सिंग में डिप्लोमा करने के बाद इग्नू से स्नातक की डिग्री प्राप्त की| संथाली समाज और उसके राग-बोध से गहरा जुड़ाव पहले से था, नर्सिंग की शिक्षा के समय बाहर की दुनिया से भी बाहर की दुनिया से भी परिचय हुआ| 

उन्होंने आदिवासी समाज की विसंगतियों को को तल्लीनता से उकेरा है- कड़ी मेहनत के बावजूद खराब दशा, कुरीतियों के कारण बिगड़ती पीढ़ी, थोड़े लाभ के लिए बड़े समझौते, पुरूष वर्चस्व, स्वार्थ के लिए पर्यावरण की हानि, शिक्षित समाज की दिक्कुओं और व्यवसायियों के हाथों की कठपुतली बनना आदि वे स्थितियाँ हैं जो पुतुल की कविताओं के केंद्र में है|


कठिन शब्दों के अर्थ-: 
• आबो-हवा- जलवायु

• माटी- मिट्टी

• सोंधापन- सुगंध

• उम्मीद- आशा

• दौर- समय

• अक्खड़पन- किसी बात को लेकर रुखाई से तन जाने का भाव

• जुझारूपन- जूझने या संघर्ष करने की प्रवृत्ति

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