मीरा - पठन सामग्री और सार Humanities/Arts Notes | EduRev

Hindi Class 11

Humanities/Arts : मीरा - पठन सामग्री और सार Humanities/Arts Notes | EduRev

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सारांश 

1. मेरे तो गिरधर गोपाल....................तारो अब मोही
यहाँ प्रस्तुत पहले पद में मीरा ने कृष्ण से अपनी अनन्यता व्यक्त की है तथा व्यर्थ के कार्यों में व्यस्त लोगों के प्रति दुख प्रकट किया है| मोर-मुकुटधारी श्रीकृष्ण को अपना पति और सर्वस्व मानते हुए मीरा कहती हैं कि उनके सिवा इस दुनिया में और कोई अपना नहीं है| उन्होंने लोक लाज सब त्याग का स्वयं को कृष्ण-भक्ति में लीन कर लिया है| संतों के साथ रहकर उन्होंने कुल की मर्यादा का भी ध्यान नहीं रखा| वे कहती हैं कि अपने आँसुओं से कृष्ण के प्रेम रूपी बेल को सींचा है जिसके बढ़ने से आनंद रुपी फल की प्राप्ति हुई है| इसका अर्थ है कि कृष्ण के प्रेम में पड़कर मीरा को आनंद की अनुभूति हो रही है| जिस प्रकार दूध में मथानी डालकर दही से मक्खन निकाला जाता है और बचे हुए छाछ को अलग कर दिया जाता है, उसी प्रकार मीरा ने भी भगवद् भक्ति को अपने प्रेम से प्राप्त किया है और सांसारिकता से स्वयं को दूर रखा है| एक ओर जहाँ मीरा भक्तों को देखकर प्रसन्न होती हैं वहीँ दूसरी ओर उन लोगों को देखकर दुखी होती हैं जो सांसारिकता के जाल में फँसे हुए हैं| मीरा अपने आप को आराध्य कृष्ण की दासी मानती हैं और उनसे विनती करती हैं कि वे उनका उद्धार करें| 

2. पग घुँघरू बांधि.......................सहज मिले अविनासी
दूसरे पद में, प्रेम रस में डूबी हुई मीरा सभी रीति-रिवाजों और बंधनों से मुक्त होने और गिरिधर के स्नेह के कारण अमर होने की बात कर रही हैं| मीरा कृष्ण के प्रेम में दीवानी होकर पैरों में घुँघरू बाँधकर नाच रही हैं| वह अपने इस कृष्ण-प्रेम को पूरी दुनिया के सामने व्यक्त करना चाहती हैं, जिसे लोग पागलपन कहते हैं| उनके रिश्तेदार कहते हैं कि ऐसा कर्म करके कुल की छवि मिट्टी में मिला दी है| राणा जी ने उसे मारने के लिए विष का प्याला भेजा जिसे मीरा ने हँसते-हँसते पी लिया और अमर हो गईं| मीरा ने यह भी कहा है कि यदि प्रभु की भक्ति सच्चे मन से किया जाए तो वे सहजता से प्राप्त हो जाते हैं| ईश्वर को अविनासी कहा गया है की क्योंकि वे नश्वर हैं| मीरा का प्रभु कृष्ण के प्रति भक्ति, प्रेम व आस्था ही उनका वास्तविक धन है| वे स्वयं को कृष्ण की दासी समझती हैं|

कवयित्री परिचय-: मीराबाई

जन्म- 1498, कुड़की गाँव (मारवाड़ रियासत) में|

प्रमुख रचनाएँ- मीरा पदावली, नरसीजी-रो-मोहेरो|

मृत्यु- सन् 1544 में|

मीरा सगुण धारा की महत्वपूर्ण भक्त कवयित्री थीं| संत कवि रैदास उनके गुरू माने जाते हैं| बचपन से ही उनके मन में कृष्ण भक्ति की भावना जन्म ले चुकी थी| इसलिए वे कृष्ण को ही अपना आराध्य और पति मानती रहीं| जीवन के अंतिम दिनों में वे द्वारका चली गईं| 

उन्होंने लोकलाज और कुल की मर्यादा के नाम पर लगाए गए सामाजिक और वैचारिक बंधनों का हमेशा विरोध किया| पर्दा प्रथा का भी पालन नहीं किया तथा मंदिर में सार्वजनिक रूप से नाचने-गाने में भी कभी हिचक महसूस नहीं की| 

मीरा की कविता में प्रेम की गंभीर अभिव्यंजना है| उसमें विरह की वेदना है और मिलन का उल्लास भी| मीरा की कविता का प्रधान गुण सादगी और सरलता है| कला का अभाव ही उसकी सबसे बड़ी कला है| उनकी भाषा मूलतः र्ताजस्थानी है तथा कहीं-कहीं ब्रजभाषा का प्रभाव है| मीरा की कविता के मूल में दर्द है|

कठिन शब्दों के अर्थ

• कानि- मर्यादा

• ढिग- साथ

• बेलि- प्रेम की बेल

• विलोयी- मथी

• छोयी- छाछ, सारहीन अंश

• आपहि- अपने ही आप, बिना प्रयास

• साची- सच्ची

• न्यात- कुटुंब के लोग

• कुल-नासी- कुल का नाश करने वाली

• विस- विष

• पीवत- पीती हुई

• हाँसी- हँस पड़ी, हँस दी

• सहज- स्वाभाविक रूप से, अनायास

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