Important Question & Answers - जूझ Humanities/Arts Notes | EduRev

Hindi Class 12

Humanities/Arts : Important Question & Answers - जूझ Humanities/Arts Notes | EduRev

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प्रश्न 1. सौंदलगेकर एक आदर्श अध्यापक क्यों प्रतीत होते हैं? ‘जूझ’ कहानी के आधार पर उनकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: सौंदलगेकर जूझ कहानी के लेखक आनंद यादव के स्कूल में मराठी के अध्यापक थे। लेखक जब उनके संपर्क में आया तब उसवेळ व्यक्तित्व में गुणों का समावेश होता चला गया क्योंकि सौंदलगेकर समझदार, धैर्यवान, चरित्रवान, योग्य, प्रतिभाशाली, मेहनती, विषय मर्मज्ञ, प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे। साथ ही वे प्रतिभान्वेषी भी थे। वे छात्र मनोविरचन के ज्ञाता एवं छात्रों की मदद करने वाले अध्यापक थे। उन्होंने जूझ के लेखक की हर तरह से मदद की। बिना उनकी सहायता प्राप्त हुए जूझ कहानी का लेखक आनंद साहित्यकार नहीं बन सकता था।
श्री सौंदलगेकर के व्यक्तित्व के आधार पर हम एक सच्चे अध्यापक वेळ निम्न जीवन मूल्य निर्धारित कर सकते हैं-
(i) चरित्रवान, धैर्यवान एवं सदैव सहायता को तत्पर,
(ii) विषय मर्मज्ञ, प्रभावशाली व्यक्तित्व सम्पन्न होना,
(iii) छात्रों की प्रतिभा को उन्हें पहचानकर उन्हें में उस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना।

प्रश्न 2. अध्यापक के रूप में सौंदलगेकर के चरित्र की विशेषताओं पर ‘जूझ’ पाठ के आधार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: अध्यापक के रूप में सौंदलगेकर के चरित्र की विशेषताएँ निम्नांकित हैं, जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जगाई-
(i) श्री सौंदलगेकर मराठी विषय पढ़ाते थे, अध्यापन के समय वे स्वयं पाठ में रम जाते थे।
(ii) वे कविता बहुत ही अच्छे ढंग से पढ़ाते थे। सुरीला गला, छंद की बढ़िया चाल और रसिकता उनमें थी।
(iii) उन्हें मराठी कविताओं के साथ-साथ अनेक अंग्रेजी कविताएँ कंठस्थ थीं। उनकी कविताओं में छंदों की लय, गति, ताल अच्छी तरह दिखायी देती थी।
(iv) वे कविता पढ़ते समय उसे गाकर सुनाने के साथ-साथ अभिनय के साथ कविता का भाव ग्रहण कराते थे।
(v) वे पढ़ाते समय अन्य दूसरे कवियों के संस्मरण भी सुनाते थे।

प्रश्न 3. ‘जूझ’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
अथवा
‘जूझ’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए
अथवा
‘जूझ’ कहानी के शीर्षक का औचित्य सिद्ध कीजिए।

उत्तर: ‘जूझ’ कहानी का शीर्षक एकदम उपयुक्त है। यह कहानी की मूल भावना पर आधारित है। कहानी का नायक आरम्भ से अन्त तक कठिन संघर्षा से जूझता रहता है। जूझते-जूझते वह सफल हो जाता है। इसी संघर्ष और जुझारू प्रवृत्ति को उजागर करने के लिए कहानी का शीर्षक भी ‘जूझ’ रखा गया है। यह शीर्षक संक्षिप्त, जिज्ञासापरक और सार्थक है। हम इसे सार्थक शीर्षक कह सकते हैं। ‘जूझ’ शीर्षक कहानी में कथा नायक का संघर्ष है। वह पढ़ना चाहता है पर उसका पिता उसे खेती-बाड़ी में लगा देना चाहता है और पर्ढ़ाइ बन्द कर देता है। कथानायक अपनी माँ और गाँव के चैधरी की मदद से स्कूल तो पहुँच गया पर वहाँ उसे फिर संघर्ष से गुजरना पड़ता है, क्योंकि उसके सहपाठी उससे उम्र में छोटे हैं और कई बार वह उपहास का पात्र बनता है, पर अंततः एक दिन शिक्षकों के सहयोग से ही उसका संघर्ष सफल होता है।

प्रश्न 4. जूझ कहानी का नायक किन परिस्थितियों में अपनी पढ़ाई जारी रख पाता है? अगर उसकी जगह आप होते तो किस प्रकार अपने सपने को जीवित रख पाते।
उत्तर: जूझ कहानी के नायक का पढ़ाई के प्रति प्रेम था इसलिए वह पिता की अनिच्छा के बावजूद अपनी पढ़ाई जारी रख सका। वह कठोर परिश्रमी था और पिता की शर्तों के अनुसार स्कूल जाने से पहले और लौटने के बाद खेतों में कठोर परिश्रम करता था। कविता के प्रति रुचि भी उसे पढ़ाई के दौरान ही जाग्रत हुई। यदि मैं कथा नायक के स्थान पर होता तो अपने सपने को पूरा करने के लिए कोई कोर कसर न उठा रखता। कठोर परिश्रम से तथा उत्ड्डष्ट इच्छा शक्ति से मैं अपनी पढाई जारी रखता और इस प्रकार अपने सपने को पूरा करता।

प्रश्न 5. जूझ के लेखक में स्वयं कविता रच सकने का आत्मविश्वास कैसे पैदा हुआ?
उत्तर: मराठी अध्यापक सौंदलगेकर जी के प्रोत्साहन, उत्साहवर्धन के कारण।
व्याख्यात्मक हल- मराठी अध्यापक सौंदलगेकर जी के प्रोत्साहन, उत्साहवर्धन के कारण जूझ के लेखक में स्वयं कविता रच सकने का आत्मविश्वास पैदा हुआ।

प्रश्न 6. ‘जूझ’ के लेखक को मराठी अध्यापक क्यों अच्छे लगते थे? दो कारण लिखिए।
उत्तर: ‘जूझ’ के लेखक ;आनन्द यादवद्ध को मराठी अध्यापक इसलिए अच्छे लगते थे क्योंकि
(i) मराठी अध्यापक श्री सौंदलगेकर का कविता पढ़ाने का ढंग अत्यन्त रोचक एवं विलक्षण था। कविता का वाचन वे भाव, लय, ताल, गति के साथ करते थे।
(ii) श्री सौन्दलगेकर स्वयं अच्छे कवि थे। उनकी कविता सुनते समय लेखक को अपना भान नहीं रहता था। वह एकाग्र होकर मास्टर साहब के हाव-भाव, ध्वनि, गति और रसों का रसास्वाद किया करते थे। आंनद यादव का यह कथन उचित है क्योंकि तमाम अभिभावक अपने बच्चों से खेती का काम करवाते हैं जिससे उनकी पढ़ाई में बाधा पड़ती रहती। लेखक ने यह बात इस संदर्भ में कही है कि उसने कविता लिखना कैसे और क्यों प्रारम्भ किया।

प्रश्न 7. बालक आनन्द यादव के पिता ने किन शर्तों पर उसे विद्यालय जाने दिया?
उत्तर: बालक आनन्द यादव (जूझ उपन्यास का नायक) के मन में पढ़ने की लालसा थी जबकि उसके पिता उसे पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। पिता, जिन्हें वह दादा कहता था, ने अन्ततः दत्ताजी राव के दबाव में आनन्द को स्कूल भेजना स्वीकार कर लिया किन्तु कुछ शर्तें लगा दीं। उसने पहली शर्त यह लगाई कि पाठशाला ग्यारह बजे शुरू होती है अतः दिन निकलते ही खेत पर हाजिर होकर ग्यारह बजे तक पानी लगाएगा और वहाँ से सीधा पाठशाला जाएगा। दूसरी शर्त यह थी कि यदि खेतों में ज्यादा काम हुआ तो पाठशाला से गैर हाजिर हो जाना पड़ेगा।

प्रश्न 8. ‘यह खेती हमें गड्ढे में ढकेल रही है’- बालक आनन्द यादव के इस कथन के पक्ष या विपक्ष में दो तर्क दीजिए
उत्तर: ‘यह खेती हमें गड्ढे में ढकेल रही है’ बालक आनन्द है और वे प्रगति नहीं कर पाते। किन्तु दूसरी ओर यह कथन इसलिए अनुचित प्रतीत होता है क्योंकि खेती-बाड़ी का काम घर-परिवार के लोग नहीं करेंगे तो और कौन करेगा। आनन्द के पिता यदि यह शर्त लगाते हैं कि पहले तुम खेती का काम करोगे, बाद में पाठशाला जाओगे, अनुचित शर्त नहीं है। घर-परिवार के सभी सदस्य खेती-बाड़ी में सहयोग देते हैं तभी परिवार का भरण-पोषण हो पाता है। यदि किसी भी सदस्य को इस काम में छूट मिलेगी तो दूसरे सदस्यों में असंतोष पनपेगा साथ ही श्रम के प्रति लोगों का रुझान कम होगा।

प्रश्न 9. ‘जूझ’ के लेखक का पिता बेटे की पढ़ाई-लिखाई के पक्ष में क्यों नहीं था?
उत्तर: जूझ कहानी के लेखक (आनन्द यादव) का पिता अपने बेटे की पढ़ाई-लिखाई का विरोध अपने स्वार्थ के कारण करता था। उसे लगता था कि यदि वह पढ़ने जाने लगा तो खेती का काम कौन करेगा।

प्रश्न 10. दत्ताराव ने लेखक की पढ़ाई की समस्या का समाधान किस प्रकार किया?
उत्तर:
• लेखक के पिता को खरी-खोटी सुनाई, धमकाया और बेटे को स्कूल भेजने के लिए कहा।
• लेखक के पिता ने जो शर्तें रखी थीं उन्हें भी मान लिया।
व्याख्यात्मक हल: दत्ताराव ने लेखक के पिता को खरी-खोटी सुनाई, धमकाया और बेटे को स्कूल भेजने को कहा। यही नहीं अपितु उन्होंने उन सभी शर्तों को भी मान लिया जो लेखक के पिता ने बेटे की पढ़ाई के लिए रखी थीं।

प्रश्न 11. ‘जूझ’ के लेखक के कवि बनने की कहानी का वर्णन कीजिए
उत्तर: जूझ के लेखक आनन्द यादव के पिता उसे स्कूल में नहीं भेजना चाहते थे।  किसी तरह पिता की शर्तों मानकर बालक आनन्द स्कूल में प्रवेश पा गया जहाँ मराठी के अध्यापक नं.व.सैंदलगेकर के सम्पर्क में आने का अवसर प्राप्त हुआ। वे कक्षा में मराठी कविता लय, तान के साथ पढ़ाते थे। लेखक ने उन्हीं की तरह कविता पढ़ने का अभ्यास किया। यही नहीं उनकी एक कविता को सिनेमा के गाने की तर्ज पर नए ढंग से अन्य विद्यार्थियों के सम्मुख प्रस्तुत किया। इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ा। मराठी के अध्यापक के पास मराठी कविताओं की कई पुस्तकें थीं तथा अध्यापक जी स्वयं अच्छी कविता कर लेते थे। इससे लेखक को विश्वास हुआ कि कवि भी उसी की तरह सामान्य मनुष्य होता है। मास्टर साहब ने अपने दरवाजे पर छाई लता पर कविता बनाकर उसे सुनाई तो उसे लगा कि वह भी अपने खेत-खलिहान, प्रकृति पर कविता लिख सकता है। वह फसलों पर, जंगली फूलों पर तुकबंदियाँ करके मास्टर साहब से सीखने लगा। वे उसे शाबाशी देते और इस प्रकार आनन्द को कविता लिखने का आत्मविश्वास प्राप्त हुआ और वह एक कवि बन गया।

प्रश्न 12. ‘जूझ’ के लेखक का पिता उसे पढ़ने से क्यों रोकना चाहता था, दत्ताराव को उसने लेखक की किन आदतों के बारे में बताया?
उत्तर: जूझ के लेखक (आनन्द यादव) का पिता उसकी पढ़ाई के पक्ष में नहीं था। वह जानता था कि यदि उसने पिता से पढ़ने-लिखने की बात की तो पिता उसे पीटते हुए हड्डी-पसली एक कर देंगे इसलिए वह इस ताक में रहता था कि कोई उसके पिता को समझा दें। वास्तव में उसका पिता उसे ;लेखक कोद्ध खेती के काम में लगाये रहता था और अपने स्वार्थ के कारण उसे लगता था कि अगर यह स्कूल गया तो खेती का काम कौन करेगा? पिता (दादा) ने अन्ततः दत्ता जी राव के दबाव में लेखक (आनन्द यादव) को स्कूल भेजने का फैसला कर लिया पर यह शर्त लगा दी कि ग्यारह बजे पाठशाला जाने से पूर्व वह खेत में पानी लगायेगा और यदि किसी दिन खेत में ज्यादा काम हुआ तो पाठशाला से गैर हाजिर हो जायेगा। दत्ताराव से दादा (पिता) ने लेखक की कई आदतों के बारे में बताया, उनमें एक यह भी थी कि मैं (लेखक) सिनेमा देखता हूँ। दत्ता जी राव ने मुझे दादा के सामने थोड़ी डाँट लर्गाइ और दादा (पिता) से कहा कि अगर वह एकाध बार सिनेमा चला गया तो क्या हुआ, बच्चा है।

प्रश्न 13. ‘जूझ’ कहानी के आधार पर लेखक और उसके प्रिय शिक्षक के सम्बन्धों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: ‘जूझ’ कहानी में लेखक और उसके प्रिय शिक्षक के मधुर सम्बन्ध थे। वे मराठी भाषा को बड़े आनन्द के साथ पढ़ाते थे। वे भाव, लय, छन्द के ज्ञाता थे और मधुर स्वर में कविता पाठ करते थे। उन्होंने लेखक को कविता लिखने की प्रेरणा दी और अध्यापक जी उनकी कमियों को दूर करते थे। शिक्षक की कृपा से लेखक कविता-सृजन में पारंगत हो गया। शिक्षक ने उन्हें माॅनीटर की तरह सबके सवाल देखने के काम में लगा दिया। इससे उसका उत्साह बढ़ गया। अध्यापक के मधुर व्यवहार के कारण ही लेखक उन्नति के पथ पर अग्रसर हुआ। अब वे उन शिक्षकों को भूल भी नहीं पाते। इस प्रकार लेखक और शिक्षक के मधुर सम्बन्ध बन गये जिनको लेखक ने जीवन पर्यन्त निभाया।

प्रश्न 14. जूझ कहानी का नायक किसके सम्पर्क में आकर कवि बना और कैसे?
उत्तर: जूझ कहानी के नायक ‘आनंद यादव’ को अपने विद्यालय में मराठी के अध्यापक न.व. सौंदलगेकर के सम्पर्क में आने का अवसर प्राप्त हुआ। वे कक्षा में मराठी कविता पढ़ाते समय लय, भाव, गति, ताल के साथ उन्हें पढ़ते थे लेखक ने भी उन्हीं की तरह पढ़ने का अभ्यास कर लिया। मराठी के अध्यापक के पास तमाम मराठी कवियों के काव्य संग्रह थे तथा उन्हें कवियों के अनेक संस्मरण भी याद थे जिन्हें वे कक्षा में सुनाते थे। यही नहीं अपितु वे मराठी की अच्छी कविता कर लेते थे। उनकी देखा-देखी लेखक भी अपने गाँव, खेत, खलिहान, प्रड्डति पर कविता लिखकर अपनी तुकबंदियाँ मास्टर साहब को दिखाने लगा। उन्होंने उसे शाबासी दी। इस प्रकार कविता लिखने का आत्मविश्वास उसके मन में उत्पन्न हुआ।

प्रश्न 15. काव्य रचना की ओर ‘जूझ’ के लेखक की रुचि जगाने में उसके अध्यापक के योगदान पर प्रकाश डालिए
अथवा

श्री सौंदलगेकर’ के अध्यापन की उन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए जिन्होंने कविताओं के प्रति ‘जूझ’ पाठ के लेखक के मन में रुचि जगाई।
अथवा

श्री सौंदलगेकर की उन विशेषताओं को रेखांकित करें जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रूचि जगाई 
अथवा
‘जूझ’ कहानी के आधार पर लेखक में कविता के प्रति रुचि जगाने और कविता करना सिखाने में उसके अध्यापक के योगदान को स्पष्ट कीजिएद्ध अथवा ‘जूझ’ कहानी के लेखक को कविता करने की प्रेरणा कैसे मिली?
उत्तर: मास्टर सौंदलगेकर लेखक की पांचवी कक्षा में मराठी पढ़ाते थे। वे कविता पढ़ाते समय स्वयं भी उसमें डूब जाते थे। उनके पास सुरीला गला और छंद की बढ़िया चाल भी थी। उन्हें मराठी के साथ-साथ अंग्रेजी की भी कुछ कविताएँ कंठस्थ थीं। जब वे कविता सुनाते थे तब साथ-साथ अभिनय भी किया करते थे। लेखक उनकी कविताएँ पूरी तल्लीनतासे सुनते थे। वे अपनी आंखों और कानों की पूरी शक्ति लगाकर दम रोककर मास्टर जी के हाव-भाव, ध्वनि, यति, गति, चाल और रसों का स्वादन किया करते थे। लेखक खेतों में पानी लगाते समय खुले गले से मास्टर जी के हाव-भाव और आरोह-अवरोह के अनुसार कविताएँ गाया करते थे। जिस प्रकार मास्टर जी अभिनय किया करते थे उसी प्रकार लेखक भी अभिनय करते थे। इस प्रकार लेखक भी कविताओं के साथ खेलने लगे। इन कविताओं के माध्यम से लेखक में नई रुचियाँ पैदा होने लगीं। श्री सौंदलगेकर के अध्यापन की विशेषतायें निम्नांकित हैं, जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जगाई-
(i) श्री सौंदलगेकर मराठी विषय पढ़ाते थे, अध्यापन के समय वे स्वयं पाठ में रम जाते थे।
(ii) वे कविता बहुत ही अच्छे ढंग से पढ़ाते थे। सुरीला गला, छंद की बढ़िया चाल और रसिकता उनमें थी।
(iii) उन्हें मराठी कविताओं के साथ-साथ अनेक अंग्रेजी कविताएँ कंठस्थ थीं। उनकी कविताओं में छंदों की लय, गति, ताल अच्छी तरह दिखायी देती थी।
(iv) वे कविता पढ़ाते समय उसे गाकर सुनाने के साथ-साथ अभिनय के साथ कविता का भाव ग्रहण कराते थे। (v) वे पढ़ाते समय अन्य दूसरे कवियों के संस्मरण भी सुनाते थे।

प्रश्न 16. ‘जूझ’ के कथा नायक का मन पाठशाला जाने के लिए क्यों तडप़ता था? उसे खतेी का काम क्यों अच्छा नहीं लगता था ? अथवा ‘जूझ’ कहानी का प्रतिपाद्य एक अनुच्छेद में समझाइए।
उत्तर:
‘जूझ’ शीर्षक कहानी में लेखक ने मध्यवर्गीय जीवन के संघर्ष की गाथा को बताया है। कथा नायक आनंद जीवन भर संघर्ष करता रहा। पढ़ाई का अधूरापन उसे हमेशा कचोटता रहता था। इसी कारण उसमें पढ़ाई की लालसा थी। दादा ने स्वार्थों के कारण उसकी पढ़ाई छुड़वा दी थी। उसका मन पाठशाला जाने के लिए तड़पता था, परन्तु दादा के आगे पढ़ाई के बारे में बात करने की हिम्मत नहीं पड़ती थी। दादा का स्वभाव भी कड़क व रूखा था। आनंद को अहसास था कि खेती से कुछ मिलने वाला नहीं है। सारा साल मेहनत करने के बाद भी फल मिलने की गारण्टी नहीं होती। खेती में व्यक्ति को कोल्हू के बैल की तरह लगे रहना पड़ता है। आनंदा सोचता था कि अच्छी तरह पढ़ने-लिखने से बढ़िया नौकरी मिल जायेगी और वह भी गाँव के प्रतिष्ठित व्यक्ति बिठोवा आण्णा की तरह कुछ अच्छा कारोबार कर सकेगा। उसकी सारी योजनायें असफल हो जातीं।

प्रश्न 17. ‘जूझ’ का कथा नायक किशोर छात्रों के लिए एक आदर्श प्रेरणा स्रोत है µकहानी के आधार पर टिप्पणी कीजिए।  अथवा ‘जूझ’ कहानी के कथा नायक का व्यक्तित्व नवयुवकों के लिए किस रूप में प्रेरणा का स्रोत है ?
उत्तर: ‘जूझ’ शीर्षक मेंकथा नायक की संघर्षमयी प्रवृत्ति का बोध होता है। दादा द्वारा पाठशाला से रोक लेने के बाद वह चुप नहीं बैठता। दादा व देर्साइ सरकार के सामने जिस दृढ़ता से अपनी बात रखता है और दादा को आश्वस्त करता है तथा अपने ऊपर लगे आरोपों का उत्तर देता है, उससे नायक की जुझारू प्रवृत्ति का बोध होता है। पाठशाला की विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करने में भी उसे जूझना पड़ता है। लग्न व परिश्रम केकारण मानीटर के बराबर सम्मान पाने लगा तथा स्वयं कविता लिखने लगा। यह नायक की जूझ का ही परिणाम है जो निश्चय ही नवयुवकों के लिए प्रेरणादायक है।

प्रश्न 18. ‘जूझ’ कहानी प्रतिकूल परिस्थितियों से संघर्ष की सफलता की कहानी है। इस कथन की सोदाहरण पुष्टि कीजिए।
अथवा
‘जूझ’ कहानी प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच संघर्ष की कहानी है। सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
‘जूझ’ कहानी का लेखक जुझारू योद्धा है। वह दीवार में भी खिड़की निकालना जानता है। उसकेमन मेंसंघर्ष करने की इच्छा इतनी बलवती है कि वह अपने लक्ष्य को पाने के लिए असंभव से प्रयत्न भी कर डालता है। वह छोटी-सी आयु में अपने लिए अपनी माँ से बात करता है। माँ को निराश देखकर उसे संभावित रास्ता बतलाता है। फिर वह राव साहब के घर जाकर सारी युक्तियाँ भिड़ाता है। इस प्रकार वह अपने दादा की अवरोधी चट्टान में से रास्ता निकाल लेता है। स्कूल में पहुंचने पर उसे घोर निराशा और तिरस्कार का सामना करना पडत़ा है। वहाँ उसका अपमान होता है। परन्तु वहाँ भी वह रास्ते निकाल लतेा है। जल्दी ही वह अपने अध्यापक का चहतेा छात्र ही नहीं, बल्कि कवि बन जाता है। उसकी यह प्रगति उसकेजुझारूपन की ही दने है।

प्रश्न 19.‘‘जझू’ कहानी के प्रमुख पात्र को पढऩा जारी रखने के लिए कैसे जझूना पडा़ आरै किस उपाय से वह सफल हअुा?
अथवा
आप कैसे कह सकते हैं कि ‘जूझ’ कहानी केप्रमुख पात्र की छूटी हुई पढ़ाई फिर से शुरू करने में उसकी माँ का भी हाथ है ?
उत्तर: ‘जूझ’ कहानी का प्रमुख पात्र स्वयं कहानी का लेखक है। वह पिछले वर्ष पाँचवी कक्षा में आया था, किन्तु उसके दादा ने उसे पाठशाला नहीं भेजा। लेखक पढ़ना चाहता है परन्तु दादा से वह अपनी इच्छा कह नहीं सकता। अतः माँ से पढ़ने भेजने की बात करता है। माँ की असमर्थता देखकर दत्ताजी राव सरकार की सहायता का सुझाव देता है। माँ-बेटे दत्ताजी राव के सामने अपनी पढ़ने की इच्छा को निःशंक होकर व्यक्त करता है। अपने ऊपर लगे आरोपों का सटीक उत्तर देता और जब दत्ताजी राव के दबाव में दादा के पाठशाला भेजने को अपनी शर्तों पर तैयार होते हैं तो वह उनकी शर्तों को भी स्वीकार कर लेता हैैै। इस प्रकार लेखक की छूटी हुई पढाई  फिर से शुरू करने में माँ का भी हाथ है।

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