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Long Question Answers: साखी

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1: ईश्वर भक्ति ने कबीर के अहंकार को दूर कर दिया। आप इस दोहे को पढ़कर क्या समझे हैं ? अपने विचार लिखिए।
'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या माँहि।।'
उत्तर: 

  • ईश्वरीय सत्ता सर्वोपरि है। मनुष्य स्वयं को भूलकर ईश्वर को ही स्वयं में व सम्पूर्ण संसार में देखता है।
  • व्यक्ति की शक्ति अत्यंत सीमित।
  • झूठा अभिमान किस लिए।

व्याख्यात्मक हल: जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाँहि। सब अँधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या माँहि।' इस दोहे को पढ़कर हम यह समझते हैं कि मनुष्य अहंकारी है तथा स्वयं को महत्त्वपूर्ण मानता है, इसलिए वह कण-कण में व्याप्त ईश्वर को नहीं देख पाता है, जबकि ईश्वरीय सत्ता सर्वोपरि है और मानव की शक्ति अत्यंत सीमित है। इसका अहसास व्यक्ति को तब होता है जब उसके अंदर ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश फैलता है और उसके अंदर का अहंकार रूपी अंधकार समाप्त हो जाता है। इस अवस्था में वह अपने झूठे अभिमान को त्यागकर अपने आपको भूल जाता है और ईश्वर को स्वयं में और सम्पूर्ण संसार में देखने लगता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि ईश्वर की भक्ति ने कबीर के अहंकार को दूर कर दिया है।

प्रश्न 2: अपने अंदर का दीपक दिखाई देने पर कौन-सा अँधियारा कैसे मिट जाता है ? कबीर की साखी के सन्दर्भ में स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: 
कबीर दास के अनुसार, अहंकारी व्यक्ति को ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि अहंकारी व्यक्ति स्वयं को सर्वोपरि मानता है, परन्तु जब उसके अंदर ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश फैलता है, तब उसके अंदर का अहंकार रूपी अंधकार समाप्त हो जाता है और मानव मन के सारे भ्रम, क्लेश, संदेह व परेशानियाँ समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 3: 'एकै अषिर पीव का पढ़े सु पंडित होय' पंक्ति का आप क्या अर्थ समझे हैं ? प्रेम का एक अक्षर सभी ग्रन्थों से किस प्रकार भारी है, अपने जीवन के एक अनुभव के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 

  • 'प्रेम' का एक अक्षर हृदय से पढ़ लेना सौ पुस्तकें पढ़ने के बराबर है।
  • मानव जीवन का मूल मंत्र-मानव प्रेम
  • व्यक्तिगत अनुभव

व्याख्यात्मक हल: एकै अषिर पीव का पढ़े सु पंडित होय' पंक्ति का अर्थ है कि जिस व्यक्ति ने प्रेम के एक अक्षर को पढ़ लिया है, वह विद्वान हो जाता है। यह पूर्णतः सत्य है क्योंकि संसार में लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़-पढ़कर मर जाते हैं परन्तु ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाते हैं और न ही सत्य को जान पाते हैं। कबीर दास जी का मानना है कि ईश्वर अनुभवगम्य है, अक्षरगम्य नहीं। वह केवल अपने अनुभव से ही जाना जा सकता है, दूसरों के अनुभवों से नहीं। मानव जीवन का मूल-मंत्र मानव प्रेम है और प्रेम का अक्षर हृदय से पढ़ लेना सौ पुस्तकों के पढ़ने के बराबर होता है। अतः स्पष्ट है कि प्रेम का एक अक्षर सभी ग्रन्थों पर भारी होता है।

प्रश्न 4: 'पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय'। कबीर के इस काव्यांश की सार्थकता पर टिप्पणी कीजिए। 
उत्तर:
इस काव्यांश का आशय है - संसार के लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते मर गए, किन्तु उन्हें न तो ईश्वर की प्राप्ति हो सकी और न सत्य एवं ज्ञान की। कवि के अनुसार ईश्वर अनुभवगम्य है, अक्षरगम्य नहीं। वह अपने अनुभव से जाना जा सकता है, दूसरों के अनुभवों से नहीं।

प्रश्न 5: कबीर द्वारा रचित साखियों का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
कबीर ग्रंथावली से संकलित 'साखी' कबीरदास द्वारा रचित है। 'साखी' शब्द 'साक्षी' शब्द का ही तद्भव रूप है। साखी शब्द साक्ष्य से बना है, जिसका अर्थ होता है- प्रत्यक्ष ज्ञान। यह ज्ञान गुरु शिष्य को प्रदान करता है। संत सम्प्रदाय में अनुभव ज्ञान की ही महत्ता है, शास्त्रीय ज्ञान की नहीं। कबीर का अनुभव क्षेत्र विस्तृत था। 'साखी' वस्तुतः दोहा छंद ही है। प्रस्तुत पाठ की साखियाँ इसका प्रमाण हैं कि सत्य की साक्षी देता हुआ ही गुरु शिष्य को जीवन के तत्त्व ज्ञान की शिक्षा देता है। यह शिक्षा जितनी प्रभावपूर्ण होती है, उतनी ही याद रखने योग्य भी। प्रस्तुत साखियों में संत कबीर ने वाणी, ईश्वर, आत्मज्ञान, ज्ञान और अज्ञान, विरह, निंदक, व्यावहारिक ज्ञान आदि के विषय में बताया है।

प्रश्न 6: पाठ्य-पुस्तक में संकलित साखियों का भाव संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
(i) ऐसी मीठी वाणी बोलो जिससे बोलने और सुनने वाले दोनों को शांति मिले।
(ii) राम प्रत्येक प्राणी के मन में वास करता है। फिर भी लोग उसे देख नहीं पाते।
(iii) अहंकार और परमात्मा इकट्ठे नहीं रह सकते। जब मन में परमात्मा का बोध जागा, तो अहंकार मिट गया।
(iv) परमात्मा के प्रति जाग्रत मनुष्य उसके विरह से तड़पता है, जबकि संसारिक लोग मौज करते हैं।
(v) विरह रूपी साँप के डँसने पर विरहणी आत्मा तड़पती रह जाती है। उसे परमात्मा के बिना शांति नहीं मिलती।
(vi) निंदक अपने निंदा-वचनों से साधक के चरित्र को पवित्र बना देता है। इसलिए निंदक को पास रखना चाहिए।
(vii) सांसारिक ज्ञान से ईश्वर नहीं मिलते। प्रेम के ढाई अक्षर से ही उसकी प्राप्ति होती है।
(viii) कबीर ने प्रभु-प्राप्ति के लिए अपनी सांसारिक वासनाओं में आग लगा ली है। अब वे अन्य साधकों को प्रेरणा दे रहे हैं।

प्रश्न 7: कबीर ने सच्चा भक्त और पंडित किसे कहा है ? पंडित या भक्त होने के लिए क्या आवश्यक है ?
उत्तर:
सच्चा भक्त वह है जिसने ईश्वर के प्रेम का अनुभव किया हो और वह ईश्वर को सच्चे हृदय से प्रेम करता हो। प्रेमी ही ज्ञानी और विद्वान भी है।
व्याख्यात्मक हल: कबीर ने सच्चा भक्त उसे कहा है जो प्रभु के विरह में घायल हो, जिसने प्रभु के प्रेम का अनुभव किया हो और पंडित उसे कहा गया है जिसने प्रेम का एक अक्षर पढ़ लिया है, अर्थात् जिसने प्रेम का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त कर लिया है, वही संसार का सबसे बड़ा विद्वान है। इससे स्पष्ट है कि पंडित या भक्त होने के लिए प्रेमी होना आवश्यक है।

प्रश्न 8: मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
लोग आदर और सम्मान भरे वचनों को सुनकर सुखी होते हैं। इसी प्रकार मीठी बोली बोलने वाला व्यक्ति बातचीत करते हुए जब अहंकार का त्याग कर देता है, तो उसके तन को भी शीतलता मिलती है।
व्याख्यात्मक हल: कबीर ने साखी के माध्यम से स्पष्ट किया है कि मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता प्राप्त होती है क्योंकि मीठी वाणी सुनने में मधुर और आदर-सम्मान से युक्त होती है। ऐसे आदर और सम्मान से भरे वचनों को सुनकर लोग सुखी होते हैं और मीठी बोली बोलने वाला व्यक्ति जब अपने अहंकार का त्याग करके बात करता है, तो उसके तन को भी शीतलता प्राप्त होती है।

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FAQs on Long Question Answers: साखी

1. साखी में कबीर का मुख्य संदेश क्या है और वह समाज को क्या सिखाना चाहते हैं?
Ans. साखी में कबीर का मूल संदेश सामाजिक और धार्मिक सुधार है-वे जाति-भेद, आडंबर और बाहरी रीति-रिवाजों का विरोध करते हैं। कबीर सभी को समानता और भक्ति का सरल मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं, तथा मानव-मानव के बीच भेदभाव को समाप्त करने का आह्वान करते हैं।
2. साखी के दोहों में कबीर ने भक्ति के बारे में क्या कहा है-सगुण या निर्गुण?
Ans. कबीर निर्गुण भक्ति के समर्थक हैं और ईश्वर को निराकार, सर्वव्यापी मानते हैं। साखी दोहों में वे मूर्ति-पूजा, पाखंड और धार्मिक कर्मकांड को खारिज करते हैं, भगवान से सीधा रिश्ता स्थापित करने पर जोर देते हैं और ह्रदय की शुद्धता को वास्तविक भक्ति मानते हैं।
3. साखी के CBSE पाठ्यक्रम में दीक्षा के विषय पर कबीर का दृष्टिकोण क्या है?
Ans. कबीर की साखी में दीक्षा का अर्थ गुरु से ज्ञान प्राप्त करना है, लेकिन वे औपचारिक दीक्षा-विधि से अलग होकर आंतरिक ज्ञान और आत्मबोध पर बल देते हैं। उनके अनुसार, सच्ची दीक्षा तब मिलती है जब साधक पाखंड को त्यागकर सच्चे गुरु से मार्गदर्शन लेता है और आत्मज्ञान की ओर बढ़ता है।
4. कबीर की साखी में 'सांसारिक माया' को लेकर क्या व्याख्या दी गई है?
Ans. साखी में कबीर सांसारिक माया को मानव जीवन का सबसे बड़ा विकार बताते हैं जो आत्मज्ञान में बाधक है। धन, संपत्ति और परिवार की आसक्ति से मुक्त होने का संदेश देते हुए, वे यह सिखाते हैं कि वास्तविक मुक्ति तभी संभव है जब मनुष्य संसार की नश्वरता को समझकर ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है।
5. साखी के लंबे उत्तरों में कबीर के विचारों को परीक्षा में कैसे प्रभावी तरीके से समझाया जा सकता है?
Ans. साखी के विचारों को समझाने के लिए प्रासंगिक दोहे उद्धृत करें, समकालीन धार्मिक परिस्थितियों का संदर्भ दें, और कबीर के सामाजिक सुधार के मिशन को स्पष्ट करें। EduRev पर उपलब्ध विस्तृत नोट्स, दोहे की व्याख्या, PPT और फ्लैशकार्ड का उपयोग करके विभिन्न पहलुओं को व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करें।
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