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The Hindi Editorial Analysis - 02 September 2022 | Current Affairs (Hindi): Daily, Weekly & Monthly - UPSC PDF Download

विद्युत् क्षेत्र का वास्तविक मूल्यांकन


चर्चा में क्यों?

  • विधि में यथोचित परिवर्तन कर लाइ गई पुर्नोत्थान वितरण क्षेत्र योजना (आरडीएसएस)विद्युत् क्षेत्र की चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र सरकार के प्रयासों की एक नवीन श्रृंखला है।
  • "विद्युत क्षेत्र में सुधार न केवल क्षेत्रक के आवश्यक है बल्कि राज्य सरकारों के वित्तीय स्वास्थ्य में सुधार हेतु आवश्यक तथा अपरिहार्य हैं ।

विभिन्न रिपोर्टो द्वारा प्रदत्त कुछ महत्वपूर्ण विन्दु

  • आरबीआई और पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की हालिया रिपोर्टें राज्यों की वित्तीय स्थिति का स्पष्ट विश्लेषण प्रदान करती हैं।
  • पंजाब और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों के राजकोषीय घाटे तथा लिए गए ऋण पंद्रहवें वित्त आयोग (एफएफसी) द्वारा निर्धारित लक्ष्यों से अधिक थे । परन्तु अधिकांश राज्यों के द्वारा इन दोनों लक्ष्यों अथवा किसी एक लक्ष्य को प्राप्त कर लिया गया था।
  • ये रिपोर्टें विद्युत् क्षेत्र की डिस्कॉम की अक्षमता के कारण राज्यों के समक्ष आने वाली चुनौतियों को उजागर करती हैं। राज्य सरकार के वित्त के विश्लेषण में डिस्कॉम संचालन की विफलताएँ स्पष्ट रूप से दिखती हैं।

वित्तीय समस्या की स्थिति से सम्बद्ध मुद्दे आंकड़ों के सुझाव से अधिक गंभीर हैं

  • भारत ने बिजली की मात्रा और गुणवत्ता तक पहुंच बढ़ाने और नवीकरणीय क्षमता के विस्तार में प्रभावशाली प्रगति की है, जिसके लिए सरकार श्रेय की पात्र है।
  • परन्तु यह भी सत्य है कि विद्युत् क्षेत्र की वित्तीय स्थिति में तीव्र गिरावट हो रही है एक गंभीर समस्या का कारक बन रही है।
  • अनुमानों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए, डिस्कॉम का संयुक्त घाटा (बिना सब्सिडी और अनुदान के ) 2.1 लाख करोड़ रुपये है जो पूर्व की बकाया राशि को जोड़ने पर लगभग 3.0 लाख करोड़ रुपये हो जाता है। यह लगभग 78,000 करोड़ रुपये का हेडलाइन हानि को दिखाता है।
  • यह आकड़े समस्या की गम्भीरता को पूर्ण रूप से प्रदर्शित नहीं करते। इन अनुदानों में उदय के अंतर्गत दिए जा रहे अनुदानों को सम्मिलित नहीं किया गया है। इसके साथ ही इन आकड़ो में मात्र विद्युत् उत्पादन करने वाली कंपनियों (जेनको) के डिस्कॉम देयता को सम्मिलित किया गया, अन्य कंपनियों की नहीं । इन्हे सम्मिलित करने पर कुल देयता 2.4 लाख करोड रुपये हो जाएगी।
  • वास्तविक ऋण की स्थिति इस तथ्य पर निर्भर करेगी कि डिस्कॉम्स को उनकी प्राप्य राशियों के भुगतान के परिमाण, निश्चितता और समय के सन्दर्भ में क्या कदम उठाने होंगे। चुकि इसमें अधिकांश देयता सरकारी अभिकर्ताओं पर है इसीलिए वास्तविक हानि अनुमान अधिक हो सकती है।
  • इस क्षेत्रक से राज्य सरकारों को जीडीपी के लगभग 1.5 प्रतिशत की हानि होती है।
  • चित्र-1 से स्पष्ट होता है कि , एक दशक से अधिक समय से ( 2010 में हेडलाइन हानि की एक संक्षिप्त आवधिक स्थिरता के अतिरिक्त ) वास्तविक हानि निरंतर बढ़ रही है।

सरकारों द्वारा समर्थित पोंजी योजना

  • गुजरात तथा कुछ शहरी महानगरों के अपवाद के अतिरिक्त संपूर्ण डिस्कॉम ऑपरेशन एक विशाल पोंजी योजना है, जिसे राज्य सरकारों द्वारा प्रायोजित और बैक-स्टॉप किया गया है।
  • पिछले 50 वर्ष से अधिक समय से निरंतर लागत को राजस्व से कवर करने में असफलता बनी रही ,जो इस क्षेत्र में स्थायी हानि कि एक विशेषता बन गई
  • राज्य सरकारो ने कई बार पूरी लागत राजस्व से प्राप्त करने का दिखावा किया है।
  • अनुकरणीय लोकलुभावनवाद पुरानी अंडर-रिकवरी को भी एक वास्तविकता बना देता है। परन्तु इन पोंजी योजनाओ का दबाव समूहों के कारण पुनर्मूल्यांकन नहीं किया जा रहा है।
  • कुछ सरकारी अभिकर्ता (आम तौर पर राज्य सरकारें ,सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक या केंद्र सरकार ) हमेशा एक पूर्ण संकट को टालते हुए दिखते हैं।
  • कुछ सार्वजनिक क्षेत्र की बैलेंस शीट डिस्कॉम को बैक-स्टॉप करती है और अंततः पोंजी फॉलआउट को रोकती है।

राज्य सरकार के अधीन डिस्कॉम संचालन में सुधार 

  • उदय योजना के प्रयास की भावना में, डिस्कॉम घाटे (बकाया सहित) के संचालन को राज्य सरकार के वित्त में प्रवाह और स्टॉक दोनों पक्षों में शामिल किया जाना चाहिए।
  • डिस्कॉम घाटे को राज्य सरकार के घाटे में जोड़ा जाना चाहिए, तर्क और अंकगणितीय स्थिरता के साथ, यह मांग करते हुए कि डिस्कॉम ऋण को राज्य सरकार के ऋण में शामिल किया जाना चाहिए (बेशक, यह सिद्धांत राज्य सरकारों की अन्य "आकस्मिक" देनदारियों पर लागू होना चाहिए)।

अधिक अनिश्चित राज्य वित्त


  • वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए, चित्र 2 में प्रवाह और स्टॉक दोनों के लिए (पैनल ए) और (पैनल बी) डिस्कॉम नुकसान (और बकाया) को शामिल करने के लिए राज्य सरकार के वित्त को दर्शाया गया है।
  • डिस्कॉम घाटे को नज़रअंदाज करने से पता चलता है कि छह राज्य एफएफसी द्वारा निर्धारित दोनों राजकोषीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रहे तथा अन्य छह ने इन्हे प्राप्त कर लिया था।
  • वास्तविक लेखांकन से यह पता चलता है कि 11 राज्य एफएफसी द्वारा निर्धारित वित्तीय लक्ष्यों से दूर हैं । दाईं ओर (उच्च घाटा) और ऊपर की ओर (उच्च ऋण) एक सामान्य बदलाव है।
  • वित्त वर्ष 2011 में, "वास्तविक " घाटे, में डिस्कॉम घाटे को शामिल करने पर राज्य सरकार का घाटा राज्य जीएसडीपी के 4.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.5 प्रतिशत हो गया। तथा उनका "वास्तविक ऋण 31.0 प्रतिशत से बढ़कर 34.5 प्रतिशत हो जाता है।
  • वास्तव में कुछ चिंताजनक मामलेन केवल पंजाब और राजस्थान हैं बल्कि हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और कुछ हद तक तमिलनाडु और केरल में भीस्थिति चिंताजनक है ।
  • यह लगभग निश्चित है कि वास्तविक घाटे और ऋण अधिक होने के कारण, राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिरता और अधिक अनिश्चित दिखाई देगी।

कौन इस पोंजी योजना को वित्तपोषित या सक्षम कर रहा है?

  • बिजली क्षेत्र का वित्त पोषण पीएसबी द्वारा नहीं बल्कि दो गैर-बैंक वित्तीय कंपनियों, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन (पीएफसी) और ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (आरईसी) द्वारा किया जा रहा है, जिनका हाल ही में विलय किया गया है।
  • 2014 के बाद से, पीएफसी/आरईसी ने पीएसबी की तुलना में बिजली क्षेत्र को अधिक उधार दिया है।
  • 2021-22 तक, पीएसबीज ने जहाँ लगभग रु. 6 लाख करोड़ (2014 से स्थिर) का ऋण दिया है वहीँ जबकि पीएफसी/आरईसी ने 4 वर्षो में लगभग रु. 7.6 लाख करोड़,का ऋण दिया है
  • एक तिहाई से अधिक पीएफसी/आरईसी ऋण वितरण कंपनियों को दिया जाता है। दूसरे शब्दों में, बिजली क्षेत्र से संबंधित वित्तीय प्रणाली में अगली भेद्यता पीएफसी/आरईसी है।

निष्कर्ष

  • भारत में विद्युत् क्षेत्र के इतिहास से एक महत्वपूर्ण सीख यह है कि देश एक आकार-सभी के लिए उपयुक्त दृष्टिकोण के लिए बहुत बड़ा और विविध है।
  • सुधार के लिए एक लचीला और घरेलू दृष्टिकोण स्वीकारना होगा। जो राज्य और केंद्रीय राजनीतिक इच्छाशक्ति द्वारा समर्थित हो और 'आओ करके सीखे ' के सिद्धांत पर हो।
  • बढ़ते डिस्कॉम घाटे के कारण राज्यों को राजनीतिक अर्थव्यवस्था के विचारों पर सुधार को प्राथमिकता देने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जो समान रूप से केंद्रीय समर्थन के अनुरूप हैं।
  • विद्युत क्षेत्र को वित्तीय स्थिरता और परिचालन दक्षता के एक नए युग में ले जाने के लिए संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है।
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FAQs on The Hindi Editorial Analysis - 02 September 2022 - Current Affairs (Hindi): Daily, Weekly & Monthly - UPSC

1. विद्युत् क्षेत्र का वास्तविक मूल्यांकन क्या होता है?
उत्तर: विद्युत् क्षेत्र का वास्तविक मूल्यांकन उसके उपयोग, उत्पादन, आपूर्ति, और दर को मापने की प्रक्रिया है। इसमें विद्युत् क्षेत्र के संबंधित उद्योग, विद्युत् सामग्री, उपभोक्ता डेमांड और आपूर्ति के आधार पर मूल्य निर्धारण किया जाता है।
2. विद्युत् क्षेत्र में प्रमुख उत्पादन क्षेत्र कौन-कौन से हैं?
उत्तर: विद्युत् क्षेत्र में प्रमुख उत्पादन क्षेत्र निम्न हो सकते हैं: - बिजली उत्पादन संयंत्र: जैसे थर्मल, हाइड्रो, नभः-छानवी, विद्युत् ऊर्जा आपूर्ति संयंत्र, सौर, आदि। - विद्युत् ऊर्जा संचार लाइन: जैसे उच्च वोल्टेज लाइन, ट्रांसफार्मर, और अन्य संचार उपकरण। - विद्युत् उपकरण निर्माण: जैसे ट्रांसफार्मर, टर्बाइन, जनरेटर, स्विचगियर, आदि।
3. विद्युत् क्षेत्र में उपयोग की जाने वाली विद्युत् सामग्री कौन-कौन सी होती है?
उत्तर: विद्युत् क्षेत्र में उपयोग की जाने वाली प्रमुख विद्युत् सामग्री निम्न हो सकती हैं: - विद्युत् ऊर्जा: जैसे बिजली, बैटरी, और ऊर्जा संगठनों द्वारा उत्पन्न की जाने वाली ऊर्जा। - विद्युत् उपकरण: जैसे ट्रांसफार्मर, जनरेटर, बिजली मीटर, और स्विचगियर। - विद्युत् इलेक्ट्रॉनिक्स: जैसे मोबाइल चार्जर, कंप्यूटर, टेलीविजन, और औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स सामग्री।
4. विद्युत् क्षेत्र में उपभोक्ता डेमांड क्या होती है?
उत्तर: विद्युत् क्षेत्र में उपभोक्ता डेमांड वह मात्रा होती है जिसमें उपभोक्ताओं द्वारा मांग की जाने वाली विद्युत् की जरूरत को पूरा करने के लिए आवश्यकता होती है। यह डेमांड विद्युत् कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं को विद्युत् सप्लाई करने के लिए उपयोग की जाने वाली ऊर्जा के आधार पर निर्धारित की जाती है। यह डेमांड वर्ष के विभिन्न समयों पर भिन्न हो सकती है और विद्युत् कंपनियों को बिजली की आपूर्ति को इसके अनुसार नियोजित करनी होती है।
5. विद्युत् क्षेत्र में विद्युत् का मूल्यांकन कैसे होता है?
उत्तर: विद्युत् क्षेत्र में विद्युत् का मूल्यांकन विद्युत् कंपनियों द्वारा किया जाता है और इसमें उपयोगकर्ताओं की मांग, विद्युत् सामग्री की कीमत, उपभोक्ता डेमांड, और विद्युत् कंपनियों की लागतों को मापने का ध्यान रखा जाता है। मूल्यांकन विद्युत् की उत्पादन, आपूर्ति, और उपयोग को ध्यान में रखकर किया जाता है ताकि सही मूल्य के आधार पर विद्युत् सप्लाई की जा सके।
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