Long Questions Answers - पतझर में टूटी पत्तियाँ Class 10 Notes | EduRev

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Class 10 : Long Questions Answers - पतझर में टूटी पत्तियाँ Class 10 Notes | EduRev

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निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. शुद्ध सोने में ताँबे की मिलावट या ताँबे में सोना’ गाँधी जी के आदर्श और व्यवहार के संदर्भ में यह बात किस तरह झलकती है ? स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर: शुद्ध सोने में......में सोना’ गाँधी जी के आदर्श और व्यवहार के संदर्भ में यह बात झलकती है। लोग गाँधी जी को ‘व्यावहारिक और आदर्शवादी’ कहते और मानते थे। इसलिए वे अपने विलक्षण आदर्श चला सके। उनके व्यवहार और आदर्शों से प्रभावित होकर देशवासी उनके पीछे चले। उनके आग्रह पर स्वदेशी स्वाधीनतावाद को स्वीकार कर कार्य कर सके। उन्होंने आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर उतरने नहीं दिया बल्कि व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर पर चढ़ाया था। वे सोने में ताँबा नहीं बल्कि ताँबे में सोना मिलाकर उसकी कीमत बढ़ाते थे। आजादी की लड़ाई में उन्होंने साधारण व्यक्तियों को जोड़कर उनकी कीमत, प्रसिद्धि बढ़ाई। चाहे वे कृषक पुत्र राजेन्द्र प्रसाद हों, चाहे बल्लभ भाई पटेल हों, चाहे जवाहर लाल नेहरू हों ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। गाँधी जी के व्यक्तित्व, सिद्धांतों  और आदर्श से प्रभावित होकर ही लोग उनके निकट आए।

प्रश्न 2. लेखक ने व्यवहारवादी लोगों के बारे में क्या कहा है ? वे असली जीवन में आदर्शवादी लोगों से कैसे भिन्न हैं ? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) व्यवहारवादी लोग सफल व हमेशा सजग रहते हैं।
(ख) सोने में ताँबे की अपेक्षा ताँबे पर सोने का पानी चढ़ाकर कीमत बढ़ाते हैं।
(ग) आदर्शवादी लोग जीवन मूल्यों के अनुयायी तथा सामाजिक उत्थान में सहयोगी होते हैं।
(घ) स्वार्थ-सिद्धि की उपेक्षा करके वे सर्वस्व उत्थान के हिमायती होते हैं।

प्रश्न 3. ”गाँधी जी सच्चे आदर्शवादी थे और उनमें नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी।“ ‘पतझड़ में टूटी पत्तियाँ’ पाठ के आधार पर समझाइए। 
उत्तर: गाँधी जी में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी, उदाहरण सहित इस बात की पुष्टि इस प्रकार कर सकते हैं-
(1) सर्वप्रथम गाँधी जी ने नेतृत्व क्षमता का उदाहरण दक्षिण-अफ्रीका की यात्रा के दौरान प्रदर्शित किया। वहाँ रंग-भेद नीति के विरूद्ध आंदोलन खड़ा करके सरकार को भी अपने कानून बदलने के लिए मजबूर कर दिया था।
(2) भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव उन्होंने अहिंसा नीति के माध्यम से हिला कर रख दी थी। सन् 1942 के ”अंग्रेजो भारत छोड़ो“ आन्दोलन में गाँधी जी की नेतृत्व क्षमता का परिचय प्राप्त होता है।
(3) सत्याग्रह आन्दोलन, बहिष्कार कार्यक्रम, दाण्डी यात्रा आदि आंदोलन गाँधी जी के नेतृत्व में पूर्ण हुए जिसके परिणामस्वरूप अंत में हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई, जो प्रत्यक्ष रूप से गाँधी जी की नेतृत्व क्षमता का परिचायक है।

प्रश्न 4. आपके विचार से कौन-से ऐसे मूल्य हैं जो शाश्वत हैं? वर्तमान में इन मूल्यों की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हमारे विचार से आदर्श, व्यावहारिकता, सूझबूझ, सजगता, लाभ-हानि का हिसाब लगाकर कदम उठाना, नैतिकता, धैर्य, सत्यवादिता आदि ऐसे मूल्य हैं जो शाश्वत हैं। वर्तमान समय में इन मूल्यों की प्रासंगिकता न के बराबर दिखाई दे रही है। समाज का वातावरण बदल चुका है, लोगों की मानसिकता में गिरावट आ गई है। शाश्वत मूल्यों को हेय द्रष्टि से देखा जाने लगा है। आदर्शवादी, सीधे-साधे, नैतिकता का आचरण करने वाले लोगों को हेय और तुच्छ मानकर व्यवहार किया जाता है। लोगों का विश्वास मूल्यों पर से उठता जा रहा है। इसलिए हमारे विचार से वर्तमान समय में मूल्यों की प्रासंगिकता में गिरावट आती जा रही है।

प्रश्न 5. लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के क्या-क्या कारण बताए। आप इन कारणों से कहाँ तक सहमत हैं?
अथवा
‘झेन की देन’ पाठ में जापानी लोगों को मानसिक रोग होने के क्या-क्या कारण बताए गए हैं। आप इनसे कहाँ
तक सहमत हैं?
उत्तर: 

  • अमेरिका से प्रतिस्पर्धा।
  • एक माह का काम एक दिन में करने का प्रयत्न।
  • दिमाग में स्पीड का इंजन लगना।
  • एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़।
    (उपर्युक्त विस्तार सहित छात्रों द्वारा दिए गए तर्क संगत उत्तर अपेक्षित) 

व्याख्यात्मक हल:
‘झेन की देन’ पाठ में जापानी लोगों को मानसिक रोग होने के जो कारण बताए हैं उनमें सबसे प्रमुख कारण उनकी अमेरिका से प्रतिस्पर्धा की भावना है। वे बहुत गति से प्रगति करते हैं इसके लिए उनका प्रयत्न एक माह का काम एक दिन में पूरा करने का रहता है। लेखक ने इन्हीं कारणों की वजह से उनके दिमाग में स्पीड का इंजन लगाने की बात कही है जिसके कारण उनकी तनाव लेने की क्षमता बढ़ जाएगी। एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ मानसिक रोग होने का प्रमुख कारण है। इन कारणों से हम पूरी तरह सहमत हैं क्योंकि प्रतिस्पर्धा में अधिक पाने की चाह में तनावपूर्ण जीवन मानसिक रोगों की जड़ है।

प्रश्न 6. ‘हमारे जीवन की रफ़्तार बढ़ गई है। यहाँ कोई चलता नहीं बल्कि दौड़ता है।’ ‘झेन की देन’ पाठ के आधार पर आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: जापानी लोगों के जीवन की गति बहुत तेज हो गई है। वे सामान्य ढंग से गरिमापूर्वक चलने की बजाय, बेतहाशा भागते हैं ताकि अधिक से अधिक काम कर सकें। वे स्वाभाविक रूप से बोलने की बजाय आवेश में आकर बकते हैं। उनके पास स्वाभाविक रूप से बोलने का समय नहीं होता। वे लोग अकेले में भी शांत नहीं होते। उनके जीवन के तनाव, निराशाएँ और कुंठाएँ उन्हें हिलाकर रख देती हैं अतः वे एकांत में भी बड़बड़ाते रहते हैं। आशय यह है कि वे तनाव से भरपूर जीवन जीते हैं।

प्रश्न 7. टी सेरेमनी की तैयारी और उसके प्रभाव पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
तैयारी-शांत वातावरण, तातामी (चटाई) से युक्त पर्णकुटी, एक समय में दो या तीन व्यक्तियों का ही प्रवेश, चाजीन द्वारा स्वागत, अँगीठी सुलगाना, चायदानी रखना, बरतन लाकर तौलिए से साफ करना। प्रभाव-दिमाग की गति धीमी होना और फिर बंद हो जाना, तनावमुक्ति, वर्तमान से जुड़ाव।
(उपयुक्त विस्तार अपेक्षित)
व्याख्यात्मक हल:
तैयारी-झोपड़ी या फूस की बनी एक कुटी। दफ्ती की दीवारों वाली तातामी (चटाई) की जमीन वाली एक सुंदर पर्णकुटी थी। चाजीन ने दो-झो (आइए, तशरीफ लाइए) कहकर स्वागत किया। मिट्टी के बर्तन में पानी भरा हुआ था, जिसमें हाथ-पाँव धोकर ही अंदर प्रवेश कर सकते थे। अँगीठी सुलगाई गई। चाय चढ़ाई, बर्तन लाकर तौलिये से साफ किए। यह सभी क्रियाएँ उसने गरिमापूर्ण ढंग से पूरी की। ‘टी सेरेमनी’ में केवल तीन आदमियों को प्रवेश दिया जाता है। क्योंकि इस सेरेमनी में शांति का बहुत महत्त्व होता है, इसलिए वहाँ अधिक लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता। प्रभाव:चाय पीने के बाद दिमाग की रफ्तार धीमी पड़ती जाती है। इसमें मानसिक रोग का उपचार होता है, मानसिक सन्तुलन होता है तथा व्यक्ति भूत-भविष्य की चिंता नहीं करता है। ऐसा लगता है वह मानों अनंतकाल में जी रहा हो और वर्तमान से उसका जुड़ाव हो गया है।

प्रश्न 8. टी सेरेमनी किसे कहा जाता है? इसमें होने वाले अनुभवों पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
 
टी सेरेमनी-

  • चाय पीनी की एक विधि, जिसे जापानी में चा-नो-यू कहते हैं।
  • शांतिपूर्ण कक्ष में अधिकतम तीन व्यक्तियों को बिठाकर, प्याले में दो घूँट ही चाय दी जाती है।

अनुभव-

  • अतीत या भविष्य की उलझन से निकलते हुए दिमाग की रफ्तार कम होना और अंततः बंद होना।
  • वर्तमान में जीते हुए अत्यधिक संवेदनशील हो जाना, जीने का वास्तविक अर्थ मिलना।
    (उपर्युक्त विस्तार अपेक्षित) 

व्याख्यात्मक हल:
‘टी सेरेमनी’ चाय पीने की एक विधि को कहा जाता है। जापानी में इसे चा-नो-यू कहते हैं। इसके लिए एक शान्तिपूर्ण कमरे में अधिकतम तीन व्यक्तियों को बिठाकर प्याले में दो घूँट ही चाय दी जाती है। इसमें शान्ति का महत्त्व होने से अधिक लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता। चाय पीने के बाद लेखक ने स्वयं ही अनुभव किया कि अतीत की उलझन निकलते हुए दिमाग की रफ्तार कम होते हुए बंद हो जाती है और सन्नाटा सुनाई देने लगता है। इस प्रकार वर्तमान में जीते हुए व्यक्ति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है और उसे जीने का वास्तविक अर्थ मिल जाता है।

प्रश्न 9. ‘‘हमें सत्य में जीना चाहिए, सत्य केवल वर्तमान है।’’ ‘पतझड़ में टूटी पत्तियाँ’ के इस कथन को स्पष्ट करते हुए लिखिए कि लेखक ने ऐसा क्यों कहा है ?
अथवा
लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 

  • बीता समय वापस नहीं आता है।
  • बीते समय को याद करके दुःखी होना उचित नहीं है।
  • भविष्य को हमने देखा नहीं है।
  • उसकी कल्पनाओं में खोकर समय नष्ट करना व्यर्थ है।
  • वर्तमान ही सत्य है। 

व्याख्यात्मक हल:
लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा इसलिए कहा होगा, क्योंकि जब वह जापान में अपने मित्र के साथ ‘टी-सेरेमनी’ में गया तो चाय की चुस्कियों के मध्य दिमाग की रफ्तार धीरे-धीरे कम होने पर उसे ऐसा अनुभव हुआ। हम हमेशा बीते हुए दिनों की खट्टी-मीठी यादों में उलझे रहते हैं या भविष्य के रंगीन सपने देखते रहते हैं। हम या तो भूत काल में रहते हैं या भविष्य काल में। वास्तव में हमारे सामने जो वर्तमान है, वही सत्य है। हमें उसी में जीना चाहिए।

प्रश्न 10. निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए:
(क) समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा कुछ है तो वह आदर्शवादी लोगों का ही दिया हुआ है।
(ख) जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है तब प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट के आदर्श धीरे-धीरे पीछे हटने लगते हैं और उनकी व्यावहारिक सूझ-बूझ ही आगे आने लगती है।
(ग) सभी क्रियाएँ इतनी गरिमापूर्ण ढंग से कीं कि उनकी हर भंगिमा से लगता था मानो जयजयवंती के सुर गूँज रहे हों।
उत्तर: (क) समाज में अहिंसा, सत्य, समानता, बंधुता, त्याग जैसे कुछ शाश्वत मूल्य अभी भी बचे हुए हैं। ये मूल्य आदर्शवादी लोगों के कारण ही बचे हुए हैं। उन्होंने अपने व्यवहार से अहिंसा, सत्य, समानता, बंधुता और त्याग का सौंदर्य प्रकट करके दिखाया। तभी लोग आज भी इनका महत्त्व समझते हैं।
(ख) जब आदर्श और व्यवहार में से लोग आदर्शों की बात करना भूल जाते हैं और व्यावहारिक होने को महत्त्व देने लगते हैं तो उनका व्यवहार धीरे-धीरे पतन की ओर जाने लगता है। समझौतों की चर्चा अधिक होने लगती है। लोगों का ध्यान आदर्शों को छोड़ने की ओर लगा रहता है। इस प्रकार पतन के रास्ते खुल जाते हैं।
(ग) ‘टी-सेरेमनी’ में चाजीन ने लेखक और उसके मित्र के स्वागत में अँगीठी जलाना, चायदानी रखना, बर्तन लाना, उन्हें तौलिए से पोंछना आदि कार्य इतने गरिमापूर्ण ढंग से किए कि मानो उसके एक-एक काम से संगीत का कोई उल्लासपूर्ण स्वर निकल रहा हो। उसका एक-एक काम मनोहारी प्रतीत हुआ।

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