Table of contents |
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लेखक परिचय |
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मुख्य विषय |
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कहानी का सार |
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कहानी की मुख्य घटनाएं |
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कहानी से शिक्षा |
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शब्दार्थ |
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निष्कर्ष |
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मेजर ध्यानचंद का जन्म 1905 में उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्हें हॉकी का जादूगर कहा जाता है और वे भारतीय हॉकी टीम के सबसे महान खिलाड़ियों में से एक थे। उनके नेतृत्व में भारत ने ओलंपिक खेलों में कई स्वर्ण पदक जीते। ध्यानचंद की खेल भावना, टीम के प्रति समर्पण और अद्वितीय खेल कौशल ने उन्हें विश्व स्तर पर सम्मान दिलाया। उन्हें उनके खेल जीवन में कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए।
कहानी का मुख्य विषय खेल भावना, ईमानदारी और टीम भावना है। इसमें मेजर ध्यानचंद की खेल भावना को उजागर किया गया है और यह बताया गया है कि खेल में व्यक्तिगत उपलब्धि से ज्यादा टीम की सफलता महत्वपूर्ण होती है। यह कहानी खेल के प्रति अनुशासन, मेहनत और देशप्रेम का संदेश देती है।
मेजर ध्यानचंद के संस्मरण का यह अंश उनके हॉकी खेल के प्रति समर्पण को दर्शाता है। ‘गोल’ शब्द आमतौर पर गोलाकार वस्तुओं जैसे गेंद, रोटी, सूरज और चाँद को दर्शाता है, लेकिन इस पाठ में ध्यानचंद ने हॉकी में किए जाने वाले गोल की चर्चा की है।
उन्होंने अपने संस्मरण में 1933 की एक घटना का उल्लेख किया है, जब वे ‘पंजाब रेजिमेंट’ की ओर से खेल रहे थे। उस दिन उनका मुकाबला ‘सैंपर्स एंड माइनर्स’ टीम से था। खेल के दौरान माइनर्स टीम के खिलाड़ी बार-बार ध्यानचंद से गेंद छीनने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन असफल हो रहे थे। गुस्से में आकर एक खिलाड़ी ने हॉकी स्टिक से ध्यानचंद के सिर पर वार कर दिया।
चोट लगने के बावजूद ध्यानचंद ने खेल जारी रखा। पट्टी बंधवाने के बाद वे मैदान में लौटे और उस खिलाड़ी से कहा कि वे अपनी चोट का बदला जरूर लेंगे। इसके बाद उन्होंने जोश और उत्साह के साथ लगातार छह गोल कर ‘सैंपर्स एंड माइनर्स’ टीम को हरा दिया।
बर्लिन ओलंपिक में उनके अद्भुत खेल कौशल से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहना शुरू कर दिया। यह उपाधि उन्हें इसलिए भी मिली क्योंकि वे न केवल खुद आगे बढ़ते थे, बल्कि अपने साथियों को भी मौका देते थे। खेल के दौरान वे गेंद अपने साथियों को पास करते, ताकि उन्हें भी जीत का श्रेय मिल सके।
उन्होंने अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने का मूलमंत्र लगन, साधना और खेल भावना को बताया, जो किसी भी व्यक्ति को ऊँचाइयों तक ले जा सकते हैं।
मेजर ध्यानचंद का जन्म 1904 में प्रयाग के एक साधारण परिवार में हुआ था। बाद में उनका परिवार झाँसी चला गया। 16 वर्ष की आयु में वे ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट’ में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हुए। इस रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी उन्हें हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करते थे। रेजिमेंट के सिपाही किसी भी समय हॉकी खेलने के लिए तैयार रहते थे। ध्यानचंद ने भी शुरुआत में नौसिखिए की तरह खेलना शुरू किया, लेकिन धीरे-धीरे उनका खेल निखरता गया और वे उच्च स्तर के खिलाड़ियों में गिने जाने लगे। जल्द ही वे बर्लिन ओलंपिक टीम के कप्तान बने और सेना में ‘लांस नायक’ के पद तक पहुँच गए।
ध्यानचंद हॉकी के प्रति अत्यधिक प्रेम रखते थे, इसलिए उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम ‘गोल’ रखा। वे खेल जगत में अमर खिलाड़ी हैं। 1979 में वे इस दुनिया से विदा हो गए। उनका जन्मदिन 29 अगस्त को ‘राष्ट्रीय खेल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। भारत का सर्वोच्च खेल पुरस्कार ‘खेल रत्न’ उनके नाम पर दिया जाता है।
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Chapter Notes: गोल
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यह पाठ हमें यह सिखाता है कि सच्ची खेल भावना में न केवल व्यक्तिगत जीत बल्कि टीम की सफलता को प्राथमिकता दी जाती है। यह भी दर्शाता है कि कठिनाइयों और चुनौतियों के बावजूद अगर व्यक्ति में लगन और आत्मविश्वास हो, तो वह किसी भी स्थिति को चुनौती दे सकता है और सफलता प्राप्त कर सकता है।
मेजर ध्यानचंद का जीवन प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने अपने खेल जीवन में न केवल व्यक्तिगत उत्कृष्टता प्राप्त की, बल्कि उन्होंने भारतीय हॉकी को दुनिया में प्रतिष्ठित किया। उनका जीवन यह दर्शाता है कि सफलता का असली मंत्र अनुशासन, मेहनत और टीम भावना में निहित है। उनके योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता और उनकी याद हमेशा भारतीय खेल जगत में जीवित रहेगी।
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