अकाली आंदोलन और वायकोम सत्याग्रह - 1857 का विद्रोह एवं अन्य आंदोलन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : अकाली आंदोलन और वायकोम सत्याग्रह - 1857 का विद्रोह एवं अन्य आंदोलन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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अकाली आंदोलन और वायकोम सत्याग्रह

 अकाली आंदोलन
 ¯ इसकी शुरुआत धार्मिक युद्धों को लेकर हुई। 1920 से 25 के बीच हजारों व्यक्ति जेल गए एवं 400 के लगभग मारे गए। 
 ¯ इस आंदोलन का मूल मकसद गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतों के चंगुल से मुक्त कराना था। सरकार द्वारा भी भ्रष्ट महंतों को पूर्ण समर्थन प्राप्त था।
 ¯ दो घटनाओं से आंदोलनकारियों को जबरदस्त धक्का लगा था। पहला, जब स्वर्णमंदिर के ग्रंथियों ने गदर आंदोलनकारियों के खिलाफ हुक्मनामा जारी किया और उन्हें विधर्मी घोषित किया। 
 ¯ दूसरे, जब इन ग्रंथियों ने जालियांवाला बाग के हत्यारे  जनरल डायर को सरोपा भेंट किया और उसे सिक्ख घोषित किया।
 ¯ आंदोलनकारियों की माँग थी कि गुरुद्वारों का प्रबंध स्थानीय भक्तों को सौंपा जाए। सुधारवादियों को शुरू में ही सफलता मिल गई। 
 ¯ इस सफलता के बाद सुधारवादी आंदोलनकारियों ने स्वर्ण मंदिर और अकाल तख्त का मुद्दा उठाया। उनकी माँग थी कि सिक्खों के इस सबसे पवित्र धर्मस्थल का प्रबंध सिक्ख प्रतिनिधियों को सौंपा जाए। 
 ¯ इस माँग के समर्थन में जनसभाएँ आयोजित की गई। सरकार सुधारवादियों से धार्मिक आधार पर झगड़ा नहीं मोल लेना चाहती थी। 
 ¯ सरकार ने गुरुद्वारे के सरकारी प्रबंधक से इस्तीफा देने को कहा और स्वर्ण मंदिर प्रबंध सुधारवादियों के हाथ में आ गया।
 ¯ नवंबर 1920 में लगभग 10 हजार सुधारवादियों की एक बैठक हुई और एक समिति (कमेटी) चुनी गई जिसे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति नाम दिया गया। 
 ¯ इसी समय (1920) अन्य माँगों के लिए क्रमबद्ध आंदोलन चलाने के लिए एक केन्द्रीय संगठन की जरूरत महसूस की गई। इस केन्द्रीय संगठन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए दिसंबर में ”शिरोमणि अकाली दल“ का गठन किया गया। 
 ¯ अकाली जत्थों की पूरी जिम्मेदारी इसी संगठन पर थी। अकाली दल और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने अहिंसा का मार्ग अपनाया, क्योंकि इसके प्रमुख नेता असहयोग आंदोलन से भी जुड़े हुए थे।
 ¯ फरवरी 1921 में गुरु नानक के जन्मस्थान ननकाना में पहली बार अकाली आंदोलन को रक्तपात से गुजरना पड़ा। कारण था ननकाना गुरुद्वारे का महंत नारायणदास गुरुद्वारे पर अपना नियंत्रण खत्म करने को तैयार नहीं था। अपने नियंत्रण को बरकरार रखने के लिए महंत ने हिंसा का मार्ग अपनाया। 
 ¯ परंतु कुछ रक्तपात के बाद करतार सिंह झब्बर के नेतृत्व में अकालियों ने इस गुरुद्वारे पर कब्जा कर लिया। 
 ¯ इस कांड के बाद महात्मा गाँधी, मौलाना शौकत अली, लाला लाजपत राय व अन्य राष्ट्रीय नेताओं ने ननकाना का दौरा किया एवं अकालियों का समर्थन किया।
 ¯ 1921 में ही तोशाखानों की चाबी को लेकर छिड़े विवाद में अकालियों की शानदार जीत हुई। 
 ¯ शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने प्रिंस आॅफ वेल्स के भारत आगमन के दिन सिक्खों से हड़ताल मनाने को कहा। 
 ¯ सरकार ने कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जिनमें बाबा खड़ग सिंह एवं मास्टर तारासिंह थे। 
 ¯ परंतु सरकार ने कुछ दिन के बाद चाभी बाबा खड़ग सिंह को सौंप दी। खड़ग सिंह उस समय शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के अध्यक्ष थे। 
 ¯ महात्मा गाँधी ने फौरन बाबा खड़ग सिंह के नाम एक तार भेजा और कहा - ”हिंदुस्तान की आजादी की पहली लड़ाई जीत ली गई है। बधाई।“
 ¯ गुरुद्वारा मुक्ति आंदोलन का चरमोत्कर्ष था ”गुरु का बाग संघर्ष“। यह गुरु का बाग अमृतसर से 20 किमी. की दूरी पर था। 
 ¯ यहाँ गुरु का बाग गुरुद्वारे के महंत ने 1921 में गुरुद्वारे को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति को सौंप दिया था, पर उसके पास की जमीन पर अपना कब्जा जमाए हुए था। 
 ¯ अकालियों ने खाना पकाने के लिए इस जमीन से एक सूखा पेड़ काट लिया था। महंत ने थाने में चोरी की रिपोर्ट दर्ज करा दी। 9 अगस्त, 1922 को पाँच अकालियों को गिरफ्तार कर लिया गया। 
 ¯ इसके बाद कई हजार अकाली नेता इसके विरोध में गिरफ्तार हुए। 
 ¯ 10 सितंबर को अमृतसर में अकालियों ने बहुत बड़ी सभा की जिसमें स्वामी श्रद्धानंद, हकीम अजमल खां व अन्य नेताओं ने भाग लिया। 
 ¯ कांग्रेस कार्य समिति ने सारे मामले की जाँच के लिए एक समिति गठित की। 
 ¯ समिति ने एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी के माध्यम से महंत से विवादस्पद जमीन को पट्टे पर ले लिया और फिर इसे अकालियों को सौंप दिया गया। इस प्रकार अकालियों की फिर जीत हुई। 
 ¯ सितंबर, 1923 में अकालियों ने नाभा के महाराज का मामला उठाया जिन्हें सरकार ने जबरदस्ती बेदखल कर दिया था। 
 ¯ मशहूर जैतू (नामा) मोरपा इसी सिलसिले में निकला था। इस आंदोलन में अकालियों को कोई विशेष सफलता नहीं मिली।
 ¯ अकाली आंदोलन बाद में तीन धाराओं में विभक्त हो गया, क्योंकि इसमेें तीन तरह की राजनीतिक विचारधाराएँ घर कर गई थीं:
     (i) अकाली दल के एक धारा वे थे जो नरमपंथी थे और सरकार समर्थक थे।
     (ii) दूसरी धारा राष्ट्रवादियों की थी, जो राष्ट्रीय आंदोलन में शरीक हो गए।
     (iii) तीसरी धारा में वे लोग आते थे जो अकाली आंदोलन के पूरी तरह उत्तराधिकारी तो नहीं थे पर उन्होंने ”अकाली दल“ को बनाए रखा।

वायकोम सत्याग्रह
 ¯ केरल में यह सत्याग्रह छुआछूत के विरोध में हुआ। 
 ¯ इस तरह के सत्याग्रह के नेतृत्व करने में नारायण गुरु, एन. कुमारन और टी. के. माधवन के नाम उल्लेखनीय हैं। 
 ¯ त्रावणकोर के एक गाँव वायकोम से इस आंदोलन की शुरुआत हुई। यहाँ के मंदिर के आस-पास की सड़कों पर अवर्ण नहीं आ सकते थे। 
 ¯ 30 मार्च, 1924 को कांग्रेसियों के नेतृत्व में सवर्णों और अवर्णों का एक जुलूस छुआछूत कानून की अवहेलना करते हुए मंदिर पहुँच गया। 
 ¯ नंबुदरी ब्राह्मणों के सबसे बड़े संगठन योगर्जम सभा ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया। 
 ¯ इसके समर्थन में मदुरै से ई. वी. रामास्वामी नायका, जो पेरियार नाम से भी मशहूर हुए, ने एक जत्थे का नेतृत्व किया।
 ¯ मार्च 1925 में महात्मा गाँधी ने केरल का दौरा किया तथा महारानी व अन्य अधिकारियों से मुलाकात की। 
 ¯ मंदिर से बाहर की सड़कें तो अवर्णों के लिए खोल दी गई परंतु मंदिर में उनका प्रवेश वर्जित था। गाँधीजी अपने केरल दौरे के दौरान किसी भी मंदिर में नहीं गए।

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