आर्थिक अवस्था और सांस्कृतिक विकास - मुगल साम्राज्य, इतिहास, युपीएससी UPSC Notes | EduRev

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UPSC : आर्थिक अवस्था और सांस्कृतिक विकास - मुगल साम्राज्य, इतिहास, युपीएससी UPSC Notes | EduRev

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आर्थिक अवस्था और सांस्कृतिक विकास

आर्थिक अवस्था
    मुगल समय में भारत की आर्थिक दशा की जानकारी कराने में अबुल फजल की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘आईने-अकबरी’ के अतिरिक्त बहुत से यूरोपीय इतिहासकार हमारी बड़ी सहायता करते हैं। उनसे हमें भारतीय कृषि, उद्योग, व्यापार, खुशहाल शहरों, वस्तुओं के मूल्य तथा औरंगजेब के पश्चात् भारत की आर्थिक स्थिति बिगड़ जाने आदि के विषय में बहुत कुछ पता चलता है।

कृषि
¯ कृषि लोगों का मुख्य व्यवसाय था। 
¯ अकबर ने अपने राजस्व-प्रबंध अथवा भूमि-प्रबंध से किसानों की दशा सुधारने का काफी प्रत्यन किया। 
¯ सिंचाई-व्यवस्था ठीक करने के लिए कई नहरें, तालाब तथा नदियों पर बांध लगाए गए, परन्तु फिर भी कृषकों की अवस्था इतनी अच्छी न हो सकी। 
¯ लगातार युद्धों तथा फौजों के इधर-उधर जाने से उनकी फसलों की काफी हानि होती थी। 
¯ 1556-57 में अकबर के काल में आगरा और बयाना के आसपास के भागों में, 1573-74 में (अकबर के समय में) गुजरात में, 1595-98 में (अकबर के समय में) लगभग सारे देश में और इन सबसे बढ़-चढ़कर 1630 ई. में (शाहजहाँ के समय में) मध्य भारत आदि में कई अकाल पड़े। 
¯ इन अकालों में और विशेषकर 1630 ई. के अकाल में लोगों ने मनुष्य का मांस तक खाना प्रारम्भ कर दिया। 

उद्योग
¯ भारत उन दिनों अपने सूती कपड़े के लिए जिसमें ढाका की मलमल भी सम्मिलित थी, संसार भर में प्रसिद्ध था। 
¯ सूती कपड़े के अतिरिक्त रेशमी और गर्म कपड़े बुनना, भिन्न-भिन्न रंगों में रंगाई और छपाई का काम करना, शाल-दुशाले तथा गलीचे बनाना, हाथी दाँत का काम करना, नक्काशी करना भारतीय लोगों के कुछ अन्य मुख्य धन्धे थे। 
¯ मुगल शासकों ने लाहौर, आगरा, फतेहपुर सीकरी और अहमदाबाद में सरकारी कारखाने खोल रखे थे जहाँ शाही घराने के लिए बढ़िया से बढ़िया माल तैयार होता था। 
¯ औरंगजेब के समय उद्योग की अवनति प्रारम्भ हो गई थी।

आन्तरिक व्यापार
¯ देश के विभिन्न स्थानों को आपस में जोड़ने के लिए सड़कें थी जिनके द्वारा खूब व्यापार होता था। 
¯ इसके अलावा नदियों द्वारा, नावों तथा जहाजों से भी व्यापारी लोग माल ले जाया और लाया करते थे। 
¯ इस काल में वैश्य, गुजराती और मारवाड़ी व्यापार करते थे। 
¯ थोक व्यापारियों को सेठ या बोहरा और परचून व्यापारियों को ‘व्यापारी’ या ‘वणिक’ कहा जाता था। 
¯ दक्षिण भारत में जो व्यापार करते थे उन्हें ‘चेटि’ कहा जाता था। 
¯ राजस्थान में बनजारे एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल ले जाते थे। 
¯ विदेशी मुसलमान हुंडियों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर धन ले जाया करते थे।
¯ भारत में कई विश्व-स्तर के व्यापारी थे जिनके पास कई बड़े-बड़े जहाज थे, जिनमें मुख्य थे सूरत के विरजी बोहरा, कोरोमण्डल तट के मलय चेट्टि आदि। 

विदेशी व्यापार
¯ उस समय के बन्दरगाहों के नाम हैं, मछलीपट्टम, कोचीन, कालीकट, गोआ, सूरत, काम्बे, चटगाँव, सोनार गाँव आदि। 
¯ विदेशी व्यापार प्रायः समुद्री मार्ग से ही होता था परन्तु स्थल मार्ग का भी प्रयोग कहीं-कहीं होता था। 
¯ मुगलकाल में पुर्तगाली, डच, अंग्रेज और फ्रांसीसी व्यापारियों के भारत आने से यहाँ का विदेशी व्यापार बहुत चमका। 
¯ भारत से अन्य देशों में सूती और रेशमी कपड़े, मशाले, अफीम, हींग, नील, काली मिर्च, जीरा, लौंग, दालचीनी आदि वस्तुएं भेजी जाती थीं। विदेशी बाजारों में इन वस्तुओं की बहुत मांग थी।
¯ अन्य देशों से भारत में आने वाली प्रमुख वस्तुओं में से मुख्य थी सैनिक साज-सामान जिसमें अच्छी नस्ल के घोड़े, बन्दूक और बारूद था। अन्य वस्तुओं में इत्र, चीनी के बर्तन, साज-शिंगार  की वस्तुएं, मखमल, रेशम आदि वस्तुएं तथा विदेशी शराब भी आयात की जाती थी।

सांस्कृतिक विकास
 वास्तुकला

¯ बाबर के भवन:  बाबर स्वयं अपनी जीवन-कथा में लिखता है कि उसने सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर आदि स्थानों पर भवन बनवाने के लिए अनेक कारीगरों को लगाया। 
¯ पानीपत के काबुली बाग में बनी हुई विशाल मस्जिद, सम्भल (रुहेलखण्ड) की जामा मस्जिद और आगरा के पुराने लोधी के किले में बनी हुई मस्जिद आज भी हमें बाबर के युग की याद दिलाती है।
    हुमायूँ के भवन: उसके बनाए दो भवन आगरा और फतेहावाद (हिसार जिले) में बनी हुई मस्जिदें हैं जो ईरानी ढंग पर बनी हुई हैं।
    अकबर के भवन: अकबर द्वारा दिल्ली में बनाया गया हुमायूँ का मकबरा अकबर की कुछ प्रारम्भिक इमारतों में से है। इसलिए इस पर ईरानी प्रभाव कुछ अधिक है। इसमें लाल पत्थर का प्रयोग किया गया है, परन्तु सजावट के लिए संगमरमर को भी प्रयोग में लाया गया है। 
¯ अकबर ने आगरा का किला अपने निरीक्षण में बनवाया और उसे बहुत-से भवनों द्वारा सजाया। 
¯ इन भवनों में दिवाने-आम, दीवाने-खास, जहाँगीर महल और अकबरी महल अधिक प्रसिद्ध हैं। 
¯ लाहौर का किला भी अकबर ने बनवाया और आगरे के किले की भाँति उसे भी अनेक भवनों से सजाया। 
¯ इसी प्रकार का एक अन्य किला अकबर ने अटक में भी बनवाया था। 
¯ अकबर की सबसे प्रसिद्ध रचना फतेहपुर सीकरी है, जिसमें 1569 से 1584 ई. तक सारी शाही शक्ति लगा दी गई। 
¯ इस नगर में बने हुए बहुत-से भवन हम आज भी देख सकते हैं, जिनमें बुलन्द दरवाजा, जामा मस्जिद, दिवाने-आम, दीवाने-खास, पंच महल, जोधाबाई का महल आदि अधिक प्रसिद्ध हैं। 
¯ इसी स्थान पर शेख सलीम चिश्ती की दरगाह भी अकबर द्वारा बनवाई हुई है। 
¯ इलाहाबाद में चालीस स्तम्भों का महल अकबर के प्रसिद्ध भवनों में से एक है। 
¯ सिकन्दरा के स्थान पर अकबर द्वारा बनवाया गया उसका अपना मकबरा कला का एक अन्य सुन्दर नमूना है। 
    जहाँगीर के भवन: जहाँगीर की रुचि चित्रकला और बागों के निर्माण की ओर अधिक थी, परन्तु उसकी यह कमी नूरजहाँ ने काफी हद तक पूरी कर दी। 
¯ नूरजहाँ ने अपने पिता की स्मृति में आगरा में इतमाद-उल-दौला के नाम से एक अति सुन्दर मकबरा बनवाया। 
¯ यह सफेद संगमरमर का बना हुआ है और इस पर रंग-बिरंगे कीमती पत्थरों से फूल, बेल, पौधे और गुलदस्ते इत्यादि बने हुए हंै। 
¯ जहाँगीर के समय का दूसरा भवन सिकन्दरा में अकबर का मकबरा है जिसे उसने पूरा करवाया था। 
    शाहजहाँ के भवन: उसका राज्यकाल मुगलकाल की वास्तुकला का स्वर्णयुग था। 
¯ उसके विभिन्न भवनों में ताजमहल, मोती मस्जिद, मुसम्मन बुर्ज, लाल किला, जामा मस्जिद, जहाँगीर का मकबरा आदि के नाम विशेषकर उल्लेखनीय है।
¯ उनमें लाल पत्थर के स्थान पर सफेद संगमरमर का अधिक प्रयोग किया गया है। 
    औरंगजेब के भवन: औरंगजेब के साथ ही भवन-निर्माण-कला का भी पतन होना आरंभ हो गया, क्योंकि वह इस कला के विरुद्ध था। 
¯ उसके समय की प्रसिद्ध विशाल इमारत लाहौर की बादशाही मस्जिद है जो बिलकुल सादा है। 

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