उद्योग (भाग - 1) - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

भूगोल (Geography) for UPSC Prelims in Hindi

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UPSC : उद्योग (भाग - 1) - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

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उद्योग
लौह तथा इस्पात उद्योग
• सबसे मुख्य समस्या सरकारी क्षेत्र की इकाइयों की स्थापना के पश्चात् इनकी अकुशलता की है। ये इकाइयाँ अधिकतर घाटे में चल रही है। इसके मुख्य कारण है-सामाजिक ऊपरी व्यय (Social overheads) पर भारी विनियोग, दोषपूर्ण श्रम सम्बन्ध, दोषपूर्ण एवं अकुशल उच्च प्रबन्ध, क्षमता का अल्प-प्रयोग आदि।
• सरकार प्रशासित कीमतों की प्रणाली का अनुकरण करती रही है और उपभोक्ताओं के लिए इस्पात की नियंत्रित वितरण प्रणाली चला रही है। इस्पात की विभिन्न मदों की भारी माँग के कारण, इस्पात के कीमत-नियन्त्राण और वितरण के कारण भारी काला बाजार कायम हो गया और इस्पात का भारी अभाव हो गया। इससे केवल गैर-सरकारी वितरकों को लाभ होता था, प्रधान उत्पादकों को उपभोक्ताओं द्वारा की गई ऊँची कीमत के लाभ से वंचित रखा जाता था और चूँकि वितरकों की आय कर-जाल (Tax net) में नहीं आती थी, इस कारण सरकार को भारी राजस्व-हानि होती थी।
• सरकार द्वारा नियुक्त संयुक्त प्लान्ट समिति (Joint Plant Committee) ने इस्पात की विभिन्न मदों की अलग- अलग कीमतें निश्चित कीं ताकि लागत-धक्य कारण तत्वों (Cost push factors) द्वारा स्फीति कुन्तल को ऊपर चढ़ने से रोका जा सके। इस प्रकार प्रधान उत्पादकों को उचित प्रत्याय (Return) प्राप्त हो सकती है। इस्पात की कीमतों में समय- समय पर वृद्धि के कारण आन्तरिक संसाधनों के जनन में सहायता मिलती है और उनका प्रयोग आधुनिकीकरण, विशाखन और विस्तार में किया जा सकता है।
• लौह और इस्पात उद्योग अपनी पूर्ण क्षमता से कहीं नीचे स्तर पर कार्य कर रहा है। 1970.71 में, सभी संयंत्रों (Plants) का क्षमता-उपयोग 67 प्रतिशत था, TISCO में यह सबसे अधिक था अर्थात् कुल क्षमता का 86 प्रतिशत और दुर्गापुर में सबसे कम अर्थात् कुल क्षमता का 40 प्रतिशत। 1984.85 में क्षमता-उपयोग बढ़कर 84 प्रतिशत हो गया। भिलाई में क्षमता-उपयोग 94 प्रतिशत और TISCO में 98 प्रतिशत तक पहुँच गया। जो कारणतत्व इस्पात उद्योग के अकुशल निष्पादन के लिए जिम्मेदार थे, उनमें उल्लेखनीय है-क्षमता का अल्प-प्रयोग जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन की लागत बढ़ जाती है और घाटे होने लगते है, कोयले और संचालन शक्ति का अपर्याप्त संभरण एवं परिवहन सम्बन्धी बाधाएँ, उचित परिपोषण का अभाव, घटिया प्रबन्ध, विशेषकर सरकारी क्षेत्र के इस्पात कारखानों के उच्च पदों पर प्रबन्धकों की बार-बार तब्दीलियाँ और बड़े पैमाने पर श्रम-संघर्ष। लौह तथा इस्पात उद्योग में भारी विनियोग के बावजूद, क्षमता का अल्प-प्रयोग देश में लौह तथा इस्पात के भारी आयात के लिए जिम्मेदार है। इसके अतिरिक्त इंजीनियरिंग, वैगन-निर्माण जैसे उद्योगों पर भी इस्पात के अभाव का गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है और इस्पात के निर्यात को सीमित करना पड़ रहा है।
• मिनी स्टील प्लान्टों के घटिया निष्पादन (Performance)  के मुख्य कारण थे-बड़े इस्पात कारखानों के उत्पादन में वृद्धि के कारण मण्डी में इस्पात मदों की अति-पूर्ति के कारण इनके उत्पादन की मांग की अपर्याप्तता, निर्माण क्रिया में गिरावट, संचालन शक्ति में लगाई गई कई कटौतियों के साथ कुछ राज्यों में संचालन शक्ति की दरों में वृद्धि और वर्ष के अधिकतर भाग में इस्पात की सिलों पर सापेक्षतः उत्पादन शुल्कों की ऊँची दरें। बहुत से उपायों और राजकोषीय प्रोत्साहनों (Fiscal incentives) के परिणामस्वरूप मिनी- स्टील प्लान्टों का पुनरुत्थान होने लगा है और उनके निष्पादन में सुधार हुआ है।
• भारत में कोक बनाने के लिए उच्चस्तरीय कोयले की कमी है। लौह तथा इस्पात उद्योग के विस्तार के साथ कोकिंग कोल (Coking coal) की मांग में भी वृद्धि हुई। इसके लिए एक नई नीति निर्माण करनी होगी ताकि उच्चस्तरीय कोयले के भण्डारों का संरक्षण किया जा सके और देशीय उत्पादन की सहायता के लिए कोयले का आयात किया जा सके।
• लौह तथा इस्पात उद्योग के क्षेत्र में सुधार किए जा रहे है। इनमें मुख्य है-इस्पात सामग्री के आयात एवं निर्यात का उदारीकरण, कीमत और वितरण-नियंत्रणो (Distribution controls) का उन्मूलन, लौह तथा इस्पात वस्तुओं पर आयात-शुल्कों की क्रमित कटौती। देश में लौह तथा इस्पात की वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि हुई है किन्तु उद्योग को प्रतिरक्षा, रेलवे, लघु-स्तर के उद्योगो, इंजीनियरिंग वस्तुओं आदि की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देने के लिए कहा जा रहा है।
• लौह तथा इस्पात उद्योग को अब एक प्रतिस्पर्धी परिवेश का सामना करना पड़ रहा है। व्यापार नीति में और उदारीकरण के साथ प्रतिस्पर्धी दबावों में वृद्धि हुई। सरकार का विश्वास है कि चूँकि भारतीय इस्पात उद्योग को देशीय खानों में सर्वोत्तम किस्म का कच्चामाल और कोकिंग कोयले का महत्वपूर्ण अनुपात उपलब्ध है, इसलिए वह अपनी कुशलता उन्नत कर सकता है और सफलतापूर्वक विदेशी प्रतिस्पर्धा का सामना कर सकता है।

कागज उद्योग
• सन् 1962 में भारत में कागज का प्रकट उपभोग 4 लाख टन होने का अनुमान लगाया गया था। इसमें 3ण्5 लाख टन का उत्पादन भारत में होता था और 0ण्5 लाख मीट्रिक टन विदेशों से मंगाया जाता था। आयातित कागज में अधिकांश पैकिंग का कागज, विशेषतया क्राफ्ट कागज (Craft Paper) था। देश में बनाए गए कागज में अधिकांश छपाई का कागज है।
• गैर-सरकारी क्षेत्र में कागज और गत्ता बनाने वाली 334 इकाइयाँ है जिनकी स्थापित क्षमता 95 लाख टन है। वस्तुतः कागज उद्योग के क्षेत्र में बहुविध आकार, प्रकार और परिमाण की इकाइयाँ मौजूद है। एक ओर टीटागढ़ कागज मिल जैसी सुसंगठित और सुसज्जित मिल है, तो दूसरी ओर गुजरात की पेंजी मिल जैसी अत्यन्त छोटी और साधारण साज-सामान वाली इकाई है। इन दो छोरों के बीच अलग-अलग आकार की अनेक इकाइयाँ है जिनमें बहुसंख्यक की उत्पादन क्षमता 6 से 15 हजार टन तक है।
• 1973 के औद्योगिक नीति प्रस्ताव द्वारा सरकार ने बड़े औद्योगिक घरानों को अतिरिक्त उत्पादन बढ़ाने की इजाजत दे दी और कागज उद्योग आन्तरिक क्षेत्र (Core sector) में समाविष्ट कर लिया है। इस समय देश में 270 छोटी तथा मध्यम इकाइयाँ और 30 बड़ी इकाइयाँ है। छोटी तथा मध्यम इकाइयों द्वारा कुल उत्पादन में लगभग 50 प्रतिशत योगदान किया जाता है।
• भारत में कागज का प्रति व्यक्ति उपभोग 2 किलोग्राम था किन्तु जैसे ही भारत में साक्षरता का स्तर उन्नत होने लगा, कागज का उपभोग बढ़  कर 13 किलोग्राम प्रति व्यक्ति हो गया। कागज के प्रति व्यक्ति उपभोग सम्बन्धी कुछ आँकड़े 2016 में इस प्रकार है-यू. एस. ए. 221 किलोग्राम, जापान 209 किलोग्राम, मलेशिया 155 किलोग्राम, ब्राजील 27 किलोग्राम और टर्की 13 किलोग्राम।
• भारत में अखबारी कागज की भारी कमी है और हमारी आवश्यकता का 40 प्रतिशत आयात किया जाता है। हमें अखबारी कागज उपलब्ध कराने वाले मुख्य देश कनाडा, फिनलैण्ड, नार्वे, स्वीडन, पोल®ड और रूस है।
• भारत नेशनल न्यूजप्रिंट एण्ड पेपर मिल्ज लि., जो अकेला सरकारी क्षेत्र का उद्यम है, द्वारा 2010-11 में 12 लाख टन कागज तैयार किया गया। हिन्दुस्तान पेपर कार्पोरेशन-एक सरकारी उद्यम की स्थापना एक और अभिनन्दनीय उपाय है। देश में 700 से अधिक लुगदी और कागज मिलें हैं। जिनमें करीब 58 लाख टन कागज और गत्ते तथा 9ण्10 लाख टन अखबारी कागज का निर्माण होता है। इसके द्वारा असम, केरल और नागालैंड में तीन कागज के कारखाने लगाए गए। इसके अतिरिक्त, सरकार पेपर एण्ड पल्प डिवेलपमेंट कार्पोरेशन के अधीन दो कारखाने लगाना चाहती है।
• इसके अलावा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र म 1.65 लाख टन की क्षमता की तीन और इकाइयाँ स्थापित की गई है।
• हाल ही में सरकार ने उद्योग की कठिनाइयों को देखते हुए कागज की कीमतें बढ़ा दी है। इसके साथ-साथ रियायती कागज (Concessional paper) और खुले बाजार में कागज की कीमत में अन्तर कम हो गया है। सरकार आशा करती है कि इसके परिणामस्वरूप कागज का उत्पादन तेजी से बढ़ जाएगा।

विश्व में कोयला उत्पादन 
• कोयला विश्व के बहुत से देशों में पाया जाता है। कोयला के कुल भण्डार का लगभग आधा भाग एशिया महादेश में स्थित है। विश्व के कुल भण्डार का एक-तिहाई संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित है। भारत के पड़ोसी देश चीन में कोयला का विशाल भण्डार है पूर्व-सोवियत रूस में विश्व का एक-चैथाई भाग कोयला स्थित था। भू-गर्भ विशेषज्ञों के अनुसार विश्व में कोयला का कुल भण्डार 8.69.362.6 करोड़ मीट्रिक टन है तक है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, यूक्रेन, चीन, पोलैण्ड, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका, भारत और आस्ट्रेलिया का वार्षिक कोयला उत्पादन 720 करोड़ टन है।

विश्व के प्रमुख कोयला उत्पादक देश
• विश्व में कोयले का उत्पादन करने वाले अनेक देश हैं। अतः कोयला हर देश में सुलभ से सस्ता उपलब्ध हो जाता है। कोयला की बढ़ती उपयोगिता और मांग के कारण इसके संरक्षण करने की ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए। अन्यथा जैसी स्थिति अब ग्रेट ब्रिटेन की है, वैसी ही सभी देशों की हो सकती है क्योँकि ग्रेट ब्रिटेन में पहले बहुत-सा कोयला-भण्डार था, जो संरक्षण के अभाव में  अब समाप्त होने के कगार पर है, इसलिए सभी देशों को कोयला-संरक्षण की ओर ध्यान देना चाहिए।
• विश्व में कोयला उत्पादन करने वाले प्रमुख देश और उनके क्षेत्र निम्नलिखित हैं -

A संयुक्त राज्य अमेेरिका
•  विश्व के कुल कोयला भण्डार का 22.1 प्रतिशत भाग संयुक्त राज्य अमेरिका में है। यहां कोयले के विशाल भण्डार हैं। सं.रा. अमेरिका कोयला के कुल भण्डार और उत्पादन दोनों ही दृष्टियों से प्रथम स्थान पर है।
• संयुक्त राज्य अमेरिका में कोयला उत्पादन के प्रमुख आठ क्षेत्र हैं, जो इस प्रकार हैं-
(i) एन्थ्रासाइट कोयला क्षेत्र - एन्थ्रासाइट कोयला जो उच्चस्तरीय कोयला होता है। इस कोटि के कोयला का विशाल भण्डार इस क्षेत्र के पूर्वी पेन्सिलवानिया, न्यू जर्सी तथा न्यूयार्क में स्थित है।
(ii) अपलेशियन कोयला क्षेत्र - यह पेन्सिलवानिया से अलाबामा तक विस्तृत है। इस कोयला क्षेत्र में उत्तम कोटि वाला एन्थ्रासाइट व बिटूमिनस कोयला प्राप्त होता है। उत्तर अपलेशियन में पिट्सवर्ग के निकट कोयला का विशाल भण्डार हैै।
(iii) पूर्वी आन्तरिक कोयला-क्षेत्र - पूर्वी आन्तरिक कोयला क्षेत्र में बिटुमिनस किस्म को कोयला पाया जाता है।
(iv) पश्चिमी आन्तरिक कोयला क्षेत्र - पश्चिमी आन्तरिक कोयला क्षेत्रों में संयुक्त राज्य अमेरिका के कोयला के कुल भण्डार का दो-तिहाई भाग स्थित है, परन्तु उत्पादन मात्रा 8 प्रतिशत भाग से ही होता है।
(v) उत्तरी आन्तरिक कोयला-क्षेत्र - संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तरी मिशिगन में कोयला का विशाल भण्डार है (विश्व प्रसिद्ध ‘सुपीरियर झील’ के किनारे शिकागो नगर तथा गारी में स्थित ‘लोहा-इस्पात’ के कारखाने इसी क्षेत्र के कोयला खदानों पर निर्भर हैं)।
(vi) दक्षिणी आन्तरिक कोयला क्षेत्र - संयुक्त राज्य अमेरिका के इस क्षेत्र से बहुत ही कम कोयला का उत्पादन होता है तथा उत्पादित कोयला निम्नस्तरीय होता है।
(vii) राॅकी पर्वतमाला कोयला-क्षेत्र - इस पर्वतमाला क्षेत्र में अधिकतर लिग्नाइट कोयला मिलता है। यहां बिटुमिनस कोयला का भी बृहद भण्डार है, परन्तु इसका उत्पादन बहुत ही कम होता है।
(viii) प्रशान्ततटीय कोयला-क्षेत्र - यह कोयला राॅकी पर्वतमाला के पश्चिम में प्रशान्त महासागर के तटीय क्षेत्र में स्थित है। यहां का कोयला निम्नस्तरीय होता है, जिसका विशाल भण्डार इस क्षेत्र में स्थित है।
• संयुक्त राज्य अमेरिका प्रतिवर्ष 39 अरब टन से अधिक कोयले का उत्पादन करता है।

B कनाडा
•  इस देश के अल्वर्टा, सस्केचवान तथा ब्रिटिश कोलम्बिया कोयला उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र हैं। कनाडा में 90 प्रतिशत कोयला इसके पश्चिमी भाग से मिलता है। इसके अलावा पूर्वी तटीय भाग में भी कोयले की खानें हैं।
•  यहां उच्च स्तरीय कोयले का अभाव है। कनाडा इस कमी को पूरा करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका आदि देशों से कोयले का आयात करता है।

C दक्षिणी अमेरिका
•  कोयला के क्षेत्र में दक्षिणी अमेरिका अत्यन्त निर्धन महाद्वीप है। संसार के कुल कोयला भण्डार का केवल 0.4 प्रतिशत भाग दक्षिणी  अमेरिका में स्थित है।
तयहां कोयला की खानें कोलम्बिया, चिली, पेरु और ब्राजील राज्यों में स्थित हैं। यहां का उत्पादित कोयला निम्न स्तर का होता है। इसे अपने कल-कारखानों के लिए अच्छा कोयला संयुक्त राज्य अमेरिका व अन्य देशों से आयात करना पड़ता है।

D फ्रांस
•  शक्ति के साधनों में से कोयला उत्पादन के क्षेत्र में फ्रांस आत्मनिर्भर देश नहीं है। यहां अवस्थित कोयले की खानें बहुत ही छोटी-छोटी हैं तथा उत्पादित कोयला भी उत्तम किस्म का नहीं होता है। फ्रांस के प्रमुख क्षेत्र इस प्रकार हैं-
1. लारेन
2.  सेंट एटिन, और
3. रोन का डेल्टाई क्षेत्र।
•  देश की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए फ्रांस को कोयले को आयात करना पड़ता है। फ्रांस प्रतिवर्ष ग्रेट ब्रिटेन, बेल्जियम, जर्मनी आदि देशों से कोयले का आयात करता है।

E पूर्व सोवियत संघ
•  विघटन से पूर्व सोवियत रूस कोयला के कुल भण्डारण तथा उत्पादन दोनों ही दृष्टियों से विश्व में द्वितीय स्थान पर था। विश्व के कोयला के कुल भण्डार का लगभग एक-चैथाई भाग पूर्व सोवियत संघ में स्थित था। वर्तमान समय में केवल ‘रूस’ में 20 प्रतिशत कोयला भण्डार स्थित है।
•  कोयला के भण्डार यहां के कई भागों में स्थित हैं। यहां 80 से भी अधिक कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं, जो पश्चिमी मास्को से पूर्वी सखालीन तक तथा उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी में अजीब सागर तक फैला हुआ है। इन क्षेत्रों में सभी तरह का कोयला मिलता है। पूर्व सोवियत संघ के प्रमुख कोयला-क्षेत्र निम्नलिखित हैं-
1. डोनेत्स बेसिन कोयला क्षेत्र - यह कोयला क्षेत्र वर्तमान काल में सोवियत संघ से स्वाधीन हुए देश ‘यूक्रेन’ में स्थित है। कोयले की भण्डार की दृष्टि से यह क्षेत्र सबसे बड़ा है। यह कोयला क्षेत्र इस कारण भी प्रमुख है कि यूक्रेन का विशाल व्यावसायिक क्षेत्र इसी भाग में स्थित है। डोनेत्स बेसिन कोयला क्षेत्र का कोयला उच्चस्तरीय होता है। यहां से उत्पादति कोयले का उपयोग ताप-विद्युत, रेल इंजनों, कल-कारखानों तथा घरेलू कार्यों के लिए किया जाता है।
2. कुजनेटस्क या कुजवास कोयला - यह कोयला क्षेत्र नदी की घाटी में स्थित है। इस क्षेत्र का कोयला भण्डार डोनेत्स बेसिन कोयला क्षेत्र से बड़ा है। यहां भी उत्तम किस्म का कोयला मिलता है।
3. कारागण्डा कोयला क्षेत्र - कारागण्डा कोयला क्षेत्र साइबेरिया में स्थित है। यह क्षेत्र यूराल-औद्योगिक क्षेत्र के समीप होने के कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्यांेकि इस क्षेत्र का कोयला दक्षिणी यूराल के औद्योगिक के काम आता है। कारागण्डा कोयला क्षेत्र रूस का तीसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक क्षेत्र है।
4. मास्को तथा टुला कोयला क्षेत्र - रूस के इस कोयला क्षेत्र मेें लिग्नाइट कोयला मिलता है।
5. यूराल कोयला क्षेत्र - यहां बिटुमिनस कोयला पाया जाता है। इस क्षेत्र में कोयला का विशाल भण्डार।
6. इर्कुटस्क कोयला क्षेत्र 
7. किरगीज कोयला क्षेत्र
 8. तुर्कमेनिस्तान कोयला क्षेत्र

9. काकेसस कोयला क्षेत्र
10. सुदूर पूर्व (साइबेरिया) का कोयला क्षेत्र

F जर्मनी
•  खनिज-सम्पदा में धनी देश जर्मनी कोयला उत्पादन में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां बिटुमिनस और लिग्नाइट दोनों तरह का कोयला प्राप्त होता है। जर्मनी उच्च कोटि के कोयला का आयात रूस से करता है। जर्मनी में विश्व का तीन-चैथाई भाग लिग्नाइट कोयला उत्खनित किया जाता है। जर्मनी के प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र निम्नलिखित हैं-
1. बेस्टफैलिया बेसिन कोयला क्षेत्र - इस क्षेत्र में कोयला प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। बेस्टफैलिया बेसिन का रूर बेसिन का कोयला सबसे उत्तम किस्म का है। यूरोप महादेश का लगभग आधा कोयला इसी भाग में स्थित है। यह क्षेत्र विश्व के बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है।
2. सार बेसिन कोयला क्षेत्र - इस क्षेत्र में बहुत से कल-कारखाने स्थित हैं, जो इसी कोयला क्षेत्र पर निर्भर हैं।
3. सैक्सनी कोयला क्षेत्र - सैक्सनी कोयला क्षेत्र में कोयला के अतिरिक्त अन्य भी बहुत से खनिज सम्पदाएं पाई जाती हैं।
4. बवैरिया कोयला क्षेत्र - यह कोयला क्षेत्र ऊपरी राइन नदी तथा बवैरिया पठार पर स्थित है।
5. साइलेशिया कोयला क्षेत्र - यह कोयला क्षेत्र ‘पोलैण्ड’ देश के समीप स्थित है।

G ग्रेट ब्रिटेन
•  विश्व के कुल भण्डार का लगभग 3 प्रतिशत कोयला ग्रेट ब्रिटेन में पाया जाता है। खनन उद्योग यहां के निवासियों का पुराना तथा प्रमुख व्यवसाय रहा है। प्राचीनकाल से ही खनन उद्योग शुरू होने की वजह से यहां कोयले का उत्पादन भी बहुत पहले ही शुरू हो गया था। इसलिए कोयला उत्खनन की दृष्टि से ग्रेट ब्रिटेन का इतिहास बहुत ही पुराना है। कुछ वर्ष पूर्व तक यह देश विश्व का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक देश था, परन्तु वह स्थिति अब नहीं रही। प्राचीन समय से कोयले का उत्पादन करने की वजह से अब कोयले का भण्डार बहुत ही कम रह गया है। इसलिए अब ग्रेट ब्रिटेन में कोयला के उपयेाग पर सावधानी बरती जा रही है तथा इसके संरक्षण के उपाय किए जा रहे हैं।
•  ग्रेट ब्रिटेन में कोयला खानें अधिकतर समुद्र तट के निकट हैं कोयले के मामले में गे्रट ब्रिटेन आत्मनिर्भर है। कोयले की खानें समुद्र तट के निकट होने से ग्रेट ब्रिटेन को कोयला निर्यात करने में भी सुविधा होती है। ग्रेट ब्रिटेन द्वारा डेनमार्क, स्वीडन, जर्मनी, इटली तथा आयरलैण्ड आदि देशों को कोयला निर्यात किया जाता है।
•  ग्रेट ब्रिटेन के प्रमुख कोयला क्षेत्र इस प्रकार हैं-
1. स्काॅटलैंड की मिडलैंड घाटी तथा क्लाइड घाटी कोयला क्षेत्र।
2. वेल्स के उत्तरी तथा दक्षिणी भाग कोयला क्षेत्र, तथा
3. पे नाइन पहाड़ की दोनों ढाल पर या लेक डिस्ट्रिक्ट तथा मिडलैंड मैदान के कोयला क्षेत्र।
•  यह कोयला क्षेत्र विस्तृत क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसमें कई अन्य कोयला क्षेत्र सम्मिलित हैं, जो निम्नलिखित हैं -
1. नार्दम्बरलैंड, डरहम कोयला क्षेत्र
2. कम्बरलैंड कोयला क्षेत्र
3. यार्कशायर-नाटींघमशायर-डर्बीशायर कोयला क्षेत्र
4. दक्षिणी लंकाशायर कोयला क्षेत्र
5. उत्तरी स्टैफोर्डशायर कोयला क्षेत्र
6. दक्षिणी स्टैफोर्डशायर कोयला क्षेत्र
7. वार्विकशायर कोयला क्षेत्र
8. लिस्टर कोयला क्षेत्र
9. दक्षिणी लंकाशायर कोयला क्षेत्र और
10. दक्षिणी वेल्स कोयला क्षेत्र
•  उपर्युक्त सभी क्षेत्रों के अतिरिक्त ग्रेट ब्रिटेन के बर्नले, चेशायर, ब्रिस्टल, डोलर तथा किल्केन्नी एवं डुगानन में भी कोयले की छोटी-छोटी खानें हैं।

H पोलैण्ड
•  इस देश के वालवूग क्षेत्र में एन्थ्रासाइट कोयला मिलता है। पोलैण्ड में भी अनेक स्थानों पर कोयले का उत्पादन हो रहा है। इस देश में कोेयला उत्पादक प्रमुख दो क्षेत्र है। जो निम्नवत् हैं-
1. साइलिसियन कोयला क्षेत्र - इस क्षेत्र में स्टीम कोयला तथा कोक-कोयला उत्खनित किया जाता है।
2. पश्चिम तटीय कोयला क्षेत्र - इस कोयला क्षेत्र में लिग्नाइट कोयला अधिक मात्रा में पाया जाता है।
 I यूगोस्लाविया
•  यूगोस्लाविया में सर्बिया कोयला क्षेत्र में उच्चकोटि का कोयला पाया जाता है। इस देश में लिग्नाइट कोयले की कई खदानें स्थित हैं।

J आस्ट्रेलिया
•  संसार के कुल कोयला भण्डार का मात्रा 1 प्रतिशत भाग इस महाद्वीप में अवस्थित है। न्यू साउथ वेल्स कोयला उत्पादन में सम्पूर्ण आस्ट्रेलिया में सबसे आगे है। इस महादेश के कुल कोयला उत्पादन का तीन-चैथाई भाग यहां से प्राप्त होता है। हण्टर घाटी में न्यू कैसल, लिथगो तथा केम्बा इस महाद्वीप का प्रसिद्ध कोयला उत्पादन क्षेत्र है। विक्टोरिया में लिग्नाइट कोयले का विशाल भण्डार है। यहां से प्राप्त कोयले से कई ताप बिजलीघरों में विद्युत तैयार की जाती है न्यूसाउथवेल्स की हण्टर घाटी खनिज सम्पत्ति व औद्योगिक विकास की दृष्टि से आस्ट्रेलिया की रूर घाटी (जर्मनी में स्थित है) कहा जाता हैै।
•  उपर्युक्त क्षेत्रों के अलावा विक्टोरिया, क्वीन्सलैण्ड, दक्षिण आस्ट्रेलिया तथा पश्चिम आस्ट्रेलिया में भी कोयला पाया जाता है।

K स्वीडन
तस्वीडन कोयला के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है। स्वीडन के उत्तरी-पश्चिमी भाग में कोयला का छोटा-सा भण्डार है। इस भण्डार में निम्नस्तरीय कोयला का उत्पादन होता है, जिसका उपयोग घरेलू कार्यों के लिए किया जाता है।
•  स्वीडन लौह अयस्क के मामले में धनी देश है। इसलिए अपने लौह-इस्पात उद्योग के लिए अच्छी किस्म का कोयला आयात करना पड़ता है। स्वीडन को अपने देश की आवश्यकता पूर्ति करने के लिए ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी, रूस आदि देशों से कोयला आयात करना पड़ता है।

L जापान
•  जापान कोयले के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है, फिर भी कुछ मात्रा में उत्पादन कर लेता है। जापान में विश्व के कुल भण्डार का केवल 0.2 प्रतिशत भाग कोयला उत्पादक प्रदेश हैं-
1. क्यूशू
2. होन्शू और
3. होकैडो
•  क्यूशू प्रदेश के कोयला क्षेत्र में जापान के दो-तिहाई भाग कोयले का उत्पादन होता है। जापान खनिज-सम्पदा के मामले में निर्धन देश है। यहां के बहुत से कल-कारखाने आयातित कोयले पर ही चलते हैं। अतः इसे अपनी औद्योगिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य देशों से कोयला आयात करना पड़ता है।

M अफ्रीका
•  संसार के कुल कोयला भण्डार का केवल 1.5 प्रतिशत भाग इस महाद्वीप में स्थित है। अफ्रीका महाद्वीप में कोयले की बहुत खानें हैं, जिनका पता अभी तक नहीं हो पाया, क्यांेकि अफ्रीका महाद्वीप विकास के मामले पिछड़ा हुआ है, इसलिए प्रकृति में छुपे कोयले की खोज ठीक तरह से नहीं हो पाई है।
•  अफ्रीका महाद्वीप का कोयला भण्डार दक्षिणी अफ्रीका में स्थित है। दक्षिणी अफ्रीका के ट्रान्सवाल, नेटाल तथा उत्तमाशा अन्तरीप  के प्रान्तों में कोयला खदानों से खनन किया जा रहा है। दक्षिणी अफ्रीका कोयला का निर्यात भी करता है।

N चीन
•  चीन में विश्व के कुल कोयला भण्डार का 21.4 प्रतिशत भाग स्थित है। चीन में दो सौ से भी अधिक कोयला क्षेत्र हैं। चीनी कोयला भण्डार का लगभग 70 प्रतिशत भाग लोएस पहाड़ी के निकटवर्ती शान्सी तथा शेन्सी प्रदेशों से प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त होनान, कांशु, मंचूरिया, शान्तुंग, होपे तथा अन्हवें राज्यों में भी कोयले के भण्डार हैं।
•  कोयला उत्पादन की दृष्टि से चीन के पांच कोयला क्षेत्र हैं। जो इस प्रकार हैं-
1. उत्तरी-पूर्वी कोयला क्षेत्र - इस क्षेत्र में भी कोयला दो उपक्षेत्र हैं-
(क) मंचूरिया कोयला क्षेत्र - मंचुरिया की राजधानी मूकडेन के निकट फुशुन के निकट बिटुमिनस कोयला का भण्डार है।
(ख) फुश्सीन कोयला क्षेत्र ।
2. उत्तरी कोयला क्षेत्र - शान्सी राज्य के दक्षिण और होनान के उत्तर भाग में अच्छी किस्म का कोयला प्राप्त होता है।
3. दक्षिणी चीन का कोयला क्षेत्र - इस क्षेत्र के हुनान-कियांशी प्रदेशों में अधिकतर लिग्नाइट कोयला पाया जाता है। युआन प्रदेश में भी कोयला उत्पादन होता है।
4. मध्य चीन को कोयला क्षेत्र - यांगटिसी की निचली घाटी तथा लाल घाटी में एन्थ्रासाइट कोयला और लिग्नाइट कोयला पाया जाता है।
5. शान-तुंग कोयला क्षेत्र - शान-तुंग प्रायद्वीप के लुटा तथा चुंगसिंग में कोयले की अनेक बड़ी-बड़ी खानें हैं।
•  चीन में कोयला का विशाल भण्डार है। अनुमानतः प्रतिवर्ष लगभग 100 करोड़ मीट्रिक टन से भी अधिक कोयला का उत्पादन हो रहा है।

IV जूट उद्योग
•  विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में देश में जूट के उत्पादन में निरन्तर वृद्धि की प्रवृति रही है। पहली योजना के अंतिम वर्ष में भारत में जूट का उत्पादन 42 लाख गांठें था, जो 2011.12 में बढ़कर1.02  करोड़ गांठें हो गया।
•  यद्यपि नियोजन काल में जूट की पैदावार में हमें पर्याप्त सफलता मिली, लेकिन घरेलू एवं  विदेशी मांग के अभाव में जूट निर्मित माल के उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पाई है। अन्य प्राकृतिक तथा कृत्रिम रेशों के कारण इनका उपभोग क्षेत्रा घटता जा रहा है जोकि इस उद्योग के लिए एक चिंताजनक पहलू है।
•  भारतीय जूट उद्योग परम्परागत रूप से निर्यात प्रधान रहा है। अविभाजित भारत का तो इस क्षेत्रा में एकाधिकार था लेकिन धीरे-धीरे निर्यात व्यापार में गिरावट आती गई। 1964.65 में समस्त जूट उत्पादन का 72 प्रतिशत भाग निर्यात कर दिया जाता था जो घटकर 2004.05  में 22 प्रतिशत रह गया। पिछले कई वर्षों से अमेरिका, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया एवं यूरोपीय देशों में मांग स्थिर बनी हुई है। 
•  देश के विभाजन से भारतीय जूट उद्योग को झटका उस समय लगा जब जूट उत्पादन क्षेत्रा का 72 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान  (बंगलादेश) के हिस्से में आया तथा लगभग सभी कारखाने भारत के हिस्से में आये। इस समस्या का समाधान संरक्षण एवं प्रोत्साहन द्वारा जूट का बुवाई क्षेत्रा बढ़ाकर कुछ ही वर्षों में कर लिया गया। लेकिन जूट उद्योगों को 60 व 70 के दशक में उस समय भारी झटका लगा जब विश्व में जूट के मुकाबले में सिंथेटिक फाइबर (पाॅलिप्रोपलीन) का उपयोग किया जाने लगा। अमेरिका, कनाडा तथा यूरोपीय देशों में जूट की वैकल्पिक वस्तुओं का प्रयोग बढ़ने के कारण मांग में कमी आई है। विश्व के विभिन्न देशों में जैसे केनप, टिनेक्स, वरलम इत्यादि सस्ती पैकिंग सामग्री के कारण विदेशी मांग प्रतिशत बाजार खो दिया है। विदेशी बाजार के साथ-साथ घरेलू बाजार में भी जूट उत्पादों की खपत में निरंतर गिरावट आ रही है। 
•  यही कारण है कि पिछले कई वर्षों से जूट का सामान बनाने की कोई नई इकाई स्थापित नहीं की गई है। मांग की कमी होने के कारण जूट उद्योग अपनी उत्पादन क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहा है। मशीनें पुरानी होने के कारण उत्पादन की किस्म निम्न है जबकि लागत ऊंची है। जूट उद्योग में विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए मिलों में आधुनिकीकरण की अत्यन्त आवश्यकता हैं।
•  सिंथेेटिक फाइबर की तुलना में जूट उत्पादों की कीमतें बहुत अधिक है जिसके फलस्वरूप जूट उद्योग का परम्परागत बाजार भी हाथ से निकल गया है। लाखों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़े इस उद्योग को सहयोग व संरक्षण जारी रखने में अब सरकार भी पीछे हट रही है।
•  अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जूट उत्पादों की मांग बनाए रखने के लिए सरकार ने भारतीय केंद्रीय जूट समिति एवं जूट जांच आयोग की स्थापना की। इधर, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम का उद्देश्य जूट से संबंधित विविध पक्षों जैसे अनुसंधान एवं विकास, रोजगार वृद्धि, विविध प्रयोग, उन्नत खेती इत्यादि को प्रोत्साहित करना है। जूट के पंरपरागत बाजार पर पालिप्रोपलीन उद्योेग का कब्जा शुरू होने से उत्पन्न समस्याओं से निजात दिलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अंतर्गत जूट उद्योग को 2 करोड़ डाॅलर दिए गए हैं तथा उसमें भारत सरकार की हिस्सेदारी भी बराबर की है। 
•  अनुसंधान के क्षेत्रा में इस कार्यक्रम को काफी सफलता मिली है। अब उन्नत टेक्नोलोजी को खेतों एवं कारखानों में लाने का प्रयास किया जा रहा है। जूट उन्नत खेती के लिए अच्छे बीज का अनुसंधान तथा जूट के रेटिंग की नई विधि से गुणवत्ता नियंत्राण प्रभावी होगा और इस मामले में बांग्लादेश के जूट से तुलना हो सकेगी। इस कार्यक्रम से स्पीनिंग, वीविंग, यार्न मिक्सिंग, जियो टेक्सटाइल एवं कागज बनाने में महत्वपूर्ण सफलता मिली है।
 

दलहन
    देश में दलहन का उत्पादन 1989.90 में 128.6 लाख टन से बढ़कर 2013.14 में 192.25 लाख टन हो गया।

  •  दलहन को प्रौद्योगिकी मिशन के अंतर्गत लाया गया।
  •  दलहन को कीट नियंत्राण व्यवस्था के अंतर्गत लाया गया है।

तदेश में दालों की मांग और आपूर्ति के अन्तर को पाटने के लिए सरकार को इसके आयात पर करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं जबकि देश में दलहनों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाने की काफी गुंजाइश है। दलहन के आयात को रोकने एवं देश में प्रति व्यक्ति दालों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए उत्पादकता के साथ-साथ उत्पादन बढ़ाना नितान्त आवश्यक है और इसके लिए निम्न सुझावों पर ध्यान देना जरूरी है।

  • कृषि को उद्योग दर्जा दिया जाना चाहिए  लेकिन किसानों पर करों का बोझ तथा उद्योग संबंधी अन्य पाबंदियों नहीं थोपी जानी चाहिए।
  • फसल बीमा योजना का विस्तार कर उसे और व्यापक स्वरूप प्रदान किया जाना चाहिए तथा ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, बिजली तथा पानी जैसी बुनियादी (आधारभूत) सुविधाओं पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
  • दलहन फसलों के लिए उपलब्ध कृषि क्षेत्रा में लगातार हो रही गिरावट को रोकने के प्रयास किए जाने चाहिए।
  • दलहन फसलों के प्रति एकड़ उत्पादकता में वृद्धि हेतु युद्ध स्तर पर प्रयास किए जाने चाहिए। इसके लिए नवीनतम तकनीकों का प्रयोग तथा उच्च श्रेणी के एच.आई.बी. बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  • वर्षा एवं सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त बीजों हेतु गहन शोध किए जाने की आवश्यकता है जिससे शुष्क खेती के लिए सूखा प्रतिरोधक तथा उच्च उत्पादकता वाले बीजों की किस्म विकसित की जा सके जिससे भिन्न-भिन्न कृषि मौसमों वाले क्षेत्रों में दलहन का उत्पादन सम्भव हो सके। इसमें कृषि वैज्ञानिक महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
  • दलहन उद्योग की विभिन्न समस्याओं जैसे जेनेटिक, कीट, बीमारी पर नियंत्राण, भू उत्पादन, मौसम के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा आदि के लिए विशेष प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। अन्य लागतों जैसे रासायनिक खाद एवं सिंचाई को आवश्यकतानुसार उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  • दलहन के उत्पादन में वृद्धि हेतु सरकार को विशेष प्रोत्साहन कार्यक्रम चलाने चाहिए। गेहूं तथा धान ही तरह की दलहन की फसलों के लिए भी सरकारी मूल्य निर्धारण प्रोत्साहन कार्यक्रम शुरू किए जाने की आवश्यकता है। इससे किसानों को अपनी दलहन फसलों का लाभदायक मूल्य मिल सकेगा।
  • दलहन फसलों में गन्धक या गन्धयुक्त उर्वरकों के प्रयोग के अधिकांश रोगों पर नियंत्राण पाया जा सकता है।
  • कृषि वैज्ञानिकों को अगले कुछ वर्षों में दालों का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने की दृष्टि से अनुसंधान प्रयास तेज करने  चाहिए।

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