उद्योग (भाग - 2) - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

भूगोल (Geography) for UPSC Prelims in Hindi

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UPSC : उद्योग (भाग - 2) - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

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VI. सीमेंट उद्योग
• सीमेंट की उत्पादन क्षमता 42 करोड़ टन प्रति वर्ष हो चुकी है और अब यह दुनिया की दुसरा बड़ा उद्योग बन चुका है। घरेलू और  निर्यात बाजार की बढ़ती मांग पूरा करने के लिए यह उद्योग निरतंर विकास कर रहा है। देश में सीमेंट का 85 प्रतिशत उत्पादन निजी क्षेत्र में हो रहा है। उत्पाद गुणवत्ता और श्रेणी  के संदर्भ में भारत आज विश्व मानकों की बराबरी कर रहा है और सीमेंट निर्माण में इस्तेमाल की जा रही नवीनतम प्रौद्योगिकी को भी अपना रहा है। भारत में इस समय 129 बड़े सीमेंट संयंत्रा हैं जिनकी संस्थापित क्षमता लगभग 42 करोड़ टन है। इसके अलावा देश में लगभग 200 लघु सीमेंट संयंत्रा भी हैं जिनकी अनुमानित क्षमता एक करोड़ 11 लाख टन है।
• सीमेंट उद्योग की क्षमता और उत्पादन में वांछित बढ़ोतरी के लिए निवेश, मूलभूत ढांचे को प्रोत्साहन आदि जरूरी है। सीमेंट उद्योग ने अब तक अपनी क्षमता एवं वास्तविक उत्पादन में आश्चर्यजनक प्रगति की है किंतु ढांचागत और वास्तविक सम्पदा परियोजनाओं के क्षेत्रों में कुछ धीमापन रहा है। अतः सीमेंट उद्योग में मंदी है। चूंकि अर्थव्यवस्था का विकास बुनियादी सुविधाओं और आवास क्षेत्र में निवेश पर निर्भर है। तथा सीमेंट उद्योग के विकास को अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ा जाता है अतः सीमेंट कम्पनियां विस्तार, एकीकरण और विविधता संबंधी नीतियां अपनाने की योजनाएं बना रही हैं।
• काफी समय तक सीमेंट की उपलब्धता में कमी के बाद अब देश ने सीमेंट उत्पादन में न केवल आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है बल्कि इसका निर्यात भी किया जाने लगा है। आज भारतीय सीमेंट/क्लिन्कर की दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशो तथा मध्य-पूर्व और अफ्रीका के पूर्वी तटवर्ती देशों में काफी मांग हैं।
• भारतीय सीमेंट में मुख्य रूप से आर्डिनरी पोर्टलैंड सीमेंट (ओ.पी.सी) शामिल है, जिसका राष्ट्रीय उत्पादन में करीब 70 प्रतिशत योगदान है। ओ.पी.सी. में क्लिन्कर (पिसा हुआ चूना पत्थर) और जिप्सम (खड़िया मिट्टी) का मिश्रण होता है जबकि ब्लेंडिड (मिश्रित) सीमेंट में प्राकृतिक या कृत्रिम अकार्बनिक पदार्थ होते हैं इन पदार्थों को जब पोर्टलैंड सीमेंट के क्लिन्कर में मिलाकर बारीक पीसा जाता है, तो सीमेंट को सजीव गुण होते हैं, जिसमें विभिन्न कार्यों के लिए उसकी उपयुक्तता बढ़ जाती है।
• भारत में दो तरह का ब्लेंडिड सीमेंट मिलता है: पोर्टलैंड पोजोलोना सीमेंट (पीपीसी) और पोर्टलैंड स्लैग सीमेंट (पीएससी)।
• वितरण और निर्माण पद्धतियों में भारत काफी पीछे है। अमेरिका और जापान जैसे विकसित देशों में सीमेंट की बल्क सप्लाई यानी वृहद आपूर्ति क्रमशः 90 प्रतिशत और 70 प्रतिशत होती है जबकि भारत में सीमेंट का बल्क वितरण मात्रा एक प्रतिशत होता है। अधिकतर सीमेंट अभी बोरों में निर्माण स्थलों पर पहुंचाया जाता है। मुम्बई और आसपास के क्षेत्रों में सीमेंट की बल्क सप्लाई को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख सीमेंट कम्पनी और भारत सरकार के बीच संयुक्त उपक्रम के रूप में बल्क सप्लाई को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख सीमेंट कम्पनी और भारत सरकार के बीच संयुक्त उपक्रम  के रूप में बल्क सीमेंट कार्पोरेशन आफ इंडिया (बीसीसीआई) की स्थापना की गई थी। इसमें विश्व बैंक और डानिडा से वित्तीय सहायता ली गई। बीसीसीआई ने कालमबोई, नेवी मुम्बई में एक आधुनिक बल्क टर्मिनल की स्थापना की है। बल्क सप्लाई टर्मिनल यह सुनिश्चित करता है कि उपभोक्ता को उचित समय के भीतर सीमेंट की आपूर्ति हो सके। साथ ही बल्क सप्लाई पर्यावरण के भी अनुकूल है क्योंकि इसमें धूल से प्रदूषण बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता जो बोरों में सीमेंट भरने और उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने तथा क्षतिग्रस्त बोरों से होता है। उद्योग ने जलमार्ग से सीमेंट की बल्क सप्लाई की दिशा में कदम उठाए हैं। हमारे देश में सीमेंट की बल्क सप्लाई को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
• बल्क सीमेंट के एक प्रमुख उपभोक्ता रेडी मिक्सड कंकरीट (आरएमसी) प्रोड्यूसर्स हैं। रेडी मिक्सड (पहले से मिश्रित) कंकरीट उद्योग सत्तर वर्षों से लगातार विकास की प्रक्रिया से गुजर रहा है ताकि दुनिया के अधिकतर देशो में निर्माण उद्योग का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सके। इस उद्योग के परिपक्व होने  की संभावना है। आर.एस.सी. ने भारत में एक शुरूआत भर की है। स्थल पर कंकरीट को मिलाने की तुलना में आर एम सी के कई फायदों को देखते हुए इसकी लोकप्रियता में बढ़ोतरी होगी।
• सीमेंट उद्योग में 88  प्रतिशत चूना पत्थर की खपत होती है, जिसका आज खनन किया जा रहा है (चूना पत्थर का खनन पूरी तरह खुली खदानों में होता है। चूना पत्थर के भंडारों और पैमाने के अनुरूप भारत में जो प्रौद्योगिकी अपनाई जा रही है, वह आमतौर पर विदेशों में अपनाई जा रही प्रौद्योगिकी के समान है। चूना पत्थर के विशेष खनन संबंधी महत्वपूर्ण पर्यावरण क्षेत्र इस प्रकार हैः भूमि अवक्रमण, ऊपरी मिट्टी को हटाना, जल व्यवस्था और गंदे पानी की निकासी, वायु गुणवत्ता, ध्वनि प्रदूषण, भूमि कम्पन आदि। चूना पत्थर खनन से पर्यावरण को जो क्षति होती है, उस पर नियंत्राण करने के लिए निम्नांकित उपाय किए जाते है।
• खनन की गई भूमि का परिष्कार करने के लिए भू-परिदृश्य अथवा स्थल तैयारी, मिट्टी में सुधार लाने और फिर से वनस्पति उगाने जैसे उपाय किए जाते हैं। खनन से खाली हुए क्षेत्र में कूड़ा-कचरा आदि डाल कर उसका पुनर्भरण किया जाता है ताकि भूमि का परिष्कार किया जा सके। वायु प्रदूषण रोकने के लिए जल छिड़क कर धूल को दबाना उन उपायों में से एक है जो आमतौर पर भारतीय खनन क्षेत्र में किए जाते हैं-यह धूल चाहे ड्रिलिंग में उठी हो, ब्लास्टिंग में हो या मार्ग कर्षण से पैदा हुई हो। अधिक व्यास की यंत्राीकृत मुक्त खदानों में धूल निष्कर्षक इस्तेमाल किए जाते हैं। जल प्रदूषण पर नियंत्राण निकासी नालों और रोकबांधों पर सजावटी वनस्पति से किया जा सकता है। ध्वनि प्रदूषण के निम्नांकित उपाय हैं - 

1. ध्वनि को उसके स्रोत पर कम करना         
2. ध्वनि के मार्ग में बाधा डालना 
3. जमीन के कम्पन को कम करना आदि।
 

• सीमेंट उद्योग पर्यावरण संरक्षण के बारे में सचेत है और उसने पर्यावरण प्रदूषण कम करने के उपाय किए हैं। भारतीय सीमेंट प्लांटों (संयंत्रों) को लेकर पर्यावरण संबंधी प्रमुख चिंता वातावरण में फैलने वाली धूल से है जो सीमेंट के ढेरों और चिमनियों तथा अस्थाई (फ्यूजिटिव) स्रोतों से निस्सरित होती है। भारतीय सीमेंट उद्योग ने विभिन्न कणों के निस्सरण पर नियंत्राण के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। सातवें और आठवें दशक में भट्ठियों, मिलों आदि में वायु प्रदूषण रोकने के लिए साइक्लोन डस्ट कलेक्टर इस्तेमाल किए गए, जिनसे निस्सरण के स्तर पर नियंत्राण किया गया। उसके बाद सीमेंट संयंत्रों के विभिन्न अनुभागों में इलैक्ट्रोस्टेटिक प्रिसिपिटेटर्स (ईएसवी) और फैबरिक फिल्टर्स लगाने के काम में काफी प्रगति हुई है। 1981 और 1986 में बनाए गए कानून से इस काम में और तेजी आई। पर्यावरण और वन मंत्रालय ने अप्रैल, 1993 से सीमेंट सभी प्रमुख उद्योगों के लिए यह अनिवार्य कर दिया है। कि वे हर साल 30 सितम्बर तक पिछले वित्त वर्ष के बारे में पर्यावरण रिपोर्ट ( सम्बद्ध राज्य प्रदूषण बोर्ड की आॅडिट रिपोर्ट) प्रस्तुत करेंगे। किसी सीमेंट प्लांट की पर्यावरण जांच के अंतर्गत वैधानिक अपेक्षाओं के अनुपालन के  अलावा प्राथमिक आवश्यकता यह पता लगाने की होती है कि इन कुछ सामग्रियों का कारगर उपयोग हुआ है या नहीं और कचरे में कितनी कमी है। 
• सीमेंट उद्योग द्वारा निस्सरण कानूनों का पालन किए जाने के मार्ग में अनेक कठिनाइयों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे कोयले और बिजली की गुणवत्ता में कमी, संयंत्रों में स्थानाभाव की वजह से धूल एकत्रा करने वाले उपकरण लगाने संबंधी समस्याएं आदि। घटिया कोयले और बार-बार बिजली जाने से इलेक्ट्रोस्टेटिक प्रिसिपिटेटर्स (ईएसपी) की कार्य प्रणाली पर प्रभाव पड़ता है। आजकल भारत में  जो ईएसपी डिजाइन किए जा रहे हैं वे नए सीमेंट प्लांटों के लिए निस्सरण स्तर (50 मि/एन एम3) को पूरा नहीं करते। प्रदूषण नियंत्राण के क्षेत्र में अधिकतर सीमेंट प्लांटों द्वारा बहुत कुछ किया जा चुका है, फिर भी वर्तमान स्थितियों के लिए और प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
• देश में आधुनिकीकरण, उदारीकरण एवं खगोलीकरण के त्रिसूत्राीय नियमों, अधिकाधिक छोटे उद्योगों की स्थापना तथा औद्योगिक व सामाजिक क्रांति की दर में वृद्धि के परिणामस्वरूप सीमेंट उत्पादन तीव्र गति से बढ़ा है। इसी का परिणाम है कि हमारा देश सीमेंट निर्यातक देशों में गिना जाने लगा है। विश्व के सीमेंट उत्पादक देशों में भारत का स्थान आठवें से ऊपर उठकर अब तीसरा हो गया है। 

समस्याएं

  1. विगत कुछ वर्षों से सरकारी क्षेत्रों में सीमेंट का उठाव कम होने के कारण मूल्यवृद्धि कर आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने में कठिनाई।
  2. उत्पादन एवं वितरण लागत में वृद्धि के प्रमुख कारण - 

(अ)     महंगी एवं अपर्याप्त विद्युत आपूर्ति, 
(ब)     अच्छे किस्म के कोयले की अपर्याप्त आपूर्ति के कारण इन उद्योगों को बाह्य बाजार से ऊंची कीमत पर माल क्रय करना पड़ता है 
(स)     बढ़ती हुई महंगाई के कारण प्रशासनिक एवं प्रबंधकीय व्यय तथा सरकार को भुगतान की जाने वाली करों की दरों में वृद्धि 
(द)     ट्रांसपोर्ट संघ द्वारा ट्रकों में कम माल का लदान तथा परिवहन व्ययों में वृद्धि 
(इ)     कोल जिप्सम, चूने के पत्थर से कारखानों की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है।
 

• सरकार की नीति के स्पष्ट न होने के कारण इन उद्योगों को पूंजी की समस्या का सामना करना पड़ रहा है जिससे आधुनिकीकरण की नव-तकनीकी को अपनाने में कठिनाई हो रही है। इस समस्या का सामना मुख्यतः सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को करना पड़ रहा है। उपरोक्त समस्याओं के अतिरिक्त अन्य समस्याएं निम्न हैं - श्रम एवं प्रबंध में सामंजस्य की कमी, स्थापित क्षमता का पूर्ण उपयोग न होना, आपसी एवं विदेशी प्रतिस्पर्धा की प्रबल संभावना तथा अनुसंधान एवं तकनीकी विकास की कमी।
1. पैकिंग व्यवस्था दोषपूर्ण होने के कारण ग्राहकों को उचित मात्रा में सामग्री नहीं मिल पाती 
2. एक ही स्थान पर मिलने वाले सीमेंट  की दरों में असमानता होने से ग्राहकों को हानि उठानी पड़ती है 
3. निजी क्षेत्र के उद्योगों में आधुनिकीकरण के परिणामस्वरूप रोजगार के अवसरों में कमी    
4. इस उद्योग से निकलने वाली धूल एवं धुएं तथा अनुपयोगी तत्वों के जमाव के कारण क्षेत्र  के लोगों में अनेक प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों का फैलना।

• सीमेंट संयंत्रों की समस्याओं का निराकरण निम्नानुसार किया जा सकता हैः
-    भारत सरकार द्वारा बड़ी-बड़ी योजनाओं को स्वीकृति देकर सीमेंट की खपत बढ़ाई जानी चाहिए जिसकी पूर्ति हेतु नए संयंत्रा एवं अतिरिक्त उत्पादन क्षमता स्थापित होगी तथा स्थापित क्षमता का पूर्ण विदोहन किया जा सकेगा।
-    पावर कट की समस्या के निवारण के लिए इन उद्योगों को विद्युत उत्पादन संयंत्रा लगाने के लिए प्रेरित कर वित्त की व्यवस्था उद्योग विभाग द्वारा की जानी चाहिए क्योंकि आज विद्युत संयंत्रों की स्थिति को देखते हुए हम यह नहीं कह सकते कि देश के वर्तमान विद्युत संयंत्रा  भावी विद्युत की मांग की पूर्ति कर सकेंगे।
-    आपसी प्रतिस्पर्धा को समाप्त करने के लिए अखिल भारतीय सीमेंट विक्रय एवं वितरण परिषद तथा कोयला विद्युत वैगनों की आपूर्ति हेतु सीमेंट की कच्ची सामग्री पूर्ति परिषद का गठन किया जाना चाहिए।
-    वैगनों की पूर्ति रेल विभाग द्वारा मांग के अनुरूप की जानी चाहिए जिससे माल लाने-ले जाने में कठिनाई नहीं होगी और उत्पादन तथा उत्पादन लागत भी विशेष रूप से प्रभावित नहीं होगी। 
• विदेशी प्रतिस्पर्धा से मुकाबला करने हेतु भारतीय उद्योगों को सीमेंट की गुणवत्ता एवं मूल्य नियंत्राण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है इसके लिए उन्नत एवं नई तकनीक को लागू करने की जरूरत है जिसके लिए पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता है। पूंजी की पर्याप्तता देश की राजनीतिक गतिविधियों एवं स्पष्ट नीतियों पर आधारित होती है। कुछ वर्षों से हमारे देश में यह आधार कमजोर रहा है। स्थायी सरकार बनने पर ही राष्ट्रीय नीति भी स्पष्ट हो सकेगी और विदेशी विनियोगकर्ता अपनी राशि निसंकोच इस क्षेत्र में लगा कर पूंजी की कमी को दूर कर सकेंगे।

VII स्वर्ण उद्योग
• हमारे देश के विद्यमान स्वर्ण भण्डारों को तीन श्रेणियों यथा-प्रमाणित, अनुमानित और सम्भावित आदि में विभाजित किया गया है 1अप्रैल, 2005 के आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल 4.53 करोड़ टन के स्वर्ण भण्डार उपलब्ध हैं, जिनमें कुल 491 टन सोना होने का अनुमान है। भू-गर्भशास्त्रिायों के अनुसार वर्तमान समय में हमारे देश में प्रमाणित श्रेणी, और सम्भावित श्रेणी के स्वर्ण खनिज भण्डार क्रमशः 82.5 लाख टन, 1.02 करोड़ टन और 2.62 करोड़ टन हैं। इन तीनों श्रेणियों के खनिज भण्डारों में 1.84 करोड़ टन स्वर्ण खनिज हैं, जिनमें 78 टन सोना विद्यमान है। कर्नाटक में 1.75 करोड़ टन स्वर्ण खनिज भण्डारों में 65 लाख टन सोना है तथा आन्ध्र प्रदेश में 69 लाख टन खनिज भण्डारों में 32 टन सोना उपलब्ध है ओर केरल में 2.47 करोड़ टन स्वर्ण खनिज भण्डारों में अनुमानित और सम्भावित श्रेणी का क्रमशः 25.5 लाख टन तथा 2.20 करोड़ टन खनिज उपलब्ध है, दोनों श्रेणियों के खनिज भण्डारों में केवल 5 टन सोना अनुमानित है।
• भू-गर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार सर्वाधिक पुरानी आर्कीयन युग की हरे रंग की चट्टानों में सोना मिलने की अत्यधिक सम्भावना होती है। ऐसी चट्टानें कनार्टक में बहुतायत में उपलब्ध हैं। यहां की कोलार, रामगिरी, चित्रा दुर्ग, शिमोगा, नुग्गीहाली आदि चट्टानों की भूगर्भिक संरचना आस्ट्रेलिया के मिलगार्न क्षेत्र से काफी मिलती-जुलती है।

भारत में स्वर्ण उत्पादन 
• आज हमारे देश में प्रतिवर्ष संगठित क्षेत्र में लगभग 3.5 टन सोने का उत्पादन होता है। संगठित क्षेत्र में स्वर्ण का उत्पादन मुख्य रूप से ‘भारत गोल्ड माइन्स लिमिटेड’ द्वारा और ‘हट्टी गोल्ड माइन्स लिमिटेड’ द्वारा किया जाता है। ये दोनों कम्पनियां प्रतिवर्ष लगभग 1.75 टन सोने का उत्पादन करती हैं। ‘भारत गोल्ड माईन्स लिमिटेड’ की खानें कर्नाटक के कोलार और आन्ध्र प्रदेश में येष्पामाना के आसपास है। ‘हट्टी गोल्ड माइन्स लिमिटेड’ की केवल एक ही खान कर्नाटक में हट्टी में  स्थित है। इन दोनों स्वर्ण उत्पादन कम्पनियों के साथ-साथ हिन्दुस्तान काॅपर लिमिटेड और हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड के द्वारा भी सहउत्पाद के रूप में स्वर्ण उत्पादन किया जाता है।
• हमारे देश में असंगठित क्षेत्र में भी न्यूनाधिक सोना हिमालय पर्वत के तलहटी क्षेत्र तथा असम में स्वर्णसिरी, बिहार-उड़ीसा की स्वर्णरेखा, उत्तर प्रदेश की सोन, रामगंगा, शारदा आदि नदियों के तटों पर बालू के कणों से सोना निकाला जाता है। किन्तु इस प्रकार सोना प्राप्त होने वाले सोने का राष्ट्रीय उत्पादन में नगण्य स्थान है।

भारत के स्वर्ण उद्योग के समक्ष चुनौतियां
• हालांकि स्वर्ण आयात नीति को और अधिक उदार बनाने के कारण देश में स्वर्ण-आपूर्ति व्यवस्थित हो जायेगी, किन्तु स्वर्ण का बढ़ता आयात देश के आर्थिक संकट को और अधिक भयावह बना सकता है। भारत में प्रतिवर्ष आयातित स्वर्ण के बदले में बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा का भुगतान करना पड़ता है। आगामी वर्षों में भी बढ़ते हुए स्वर्ण आयात का सबसे बुरा प्रभाव देश की विदेशी विनिमय व्यवस्था पर पड़ने की सम्भावना है।
• भारत में जहां एक ओर अच्छी किस्म के स्वर्ण खनिजों को भण्डार लगभग समाप्ति की ओर है वहीं दूसरी ओर देश का स्वर्ण खनिजों का विदोहन होने के कारण उत्पादन लागत भी निरन्तर बढ़ती जा रही है अर्थात् भारत में स्वर्ण उत्पादन अब फायदे का सौदा नहीं रहा। स्वर्ण आयात में छूट देने के कारण देश में काले धन में वृद्धि की सम्भावनाएं और अधिक प्रबल बनती जा रही हैं। काले धन की यह समानान्तर अर्थव्यवस्था देश के सामने गम्भीर संकट उत्पन्न कर सकती है।
• उद्योग के असंगठित क्षेत्र में स्वर्ण उत्पादन आज भी सैकड़ों वर्ष पुरानी पद्धतियों से ही किया जाता है, जिससे समय और श्रम का अपव्यय होता है। आर्थिक संसाधनों की कमी और अनुसंधान एवं शोध प्रयासों के अभाव के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में विद्यमान किन्तु अछूते स्वर्ण भण्डारों का विदोहन नहीं हो पा रहा है। स्वर्ण खनिज भण्डारों का बिखराव, सरकारी, निजी और विदेशी पूंजी निवेश में पर्याप्त एवं प्रभावी समन्वय का न होना, स्वर्ण खनिजों की चोरी, सोने की बढ़ती हुई मांग, पर्याप्त पूंजी का अभाव, कर्मचारियों का अप्रशिक्षित होना आदि अन्य प्रमुख समस्याओं में भी यह उद्योग जूझ रहा है।

VIII सार्वजनिक उपक्रम में बढ़ता घाटा
• सार्वजनिक उपक्रम में बढ़ते हुए घाटे पर नियंत्राण के लिए निम्न सुझाव सहायक सिद्ध हो सकते है-
    -    आर्थिक तथा संरचनात्मक सुधारों को राज्य-स्तर पर भी लागू किया जाना चाहिए ताकि राज्यों के अधीन लोक उपक्रमों की समस्याओं को अविलम्ब दूर किया जा सकेे।
    -    सरकारी खर्च तथा आय के अन्तर को दूर करके वित्तीय संकट को दूर किया जा सकता है।
    -    वित्तीय घाटे को कम करने के लिए राजस्व खाते में बचत करके उसका उपयोग पूंजीगत निवेश के लिए करना चाहिए।
    -    सरकारी उपक्रमों के शेयर बेचने से होने वाली आय से विदेशी कर्ज चुकाया जा सकता है।
    -    घाटे वाली इकाइयों को बन्द करने के स्थान पर लाभ वाली शाखाओं में विलय किया जा सकता है।
    -    प्रति वर्ष बजट में पूंजीगत खर्च और राष्ट्रीय नवीकृत कोष के लिए बड़ी धनराशि रखी जानी चाहिए।
    -    निवेशकों के हितों की सुरक्षा के लिए देश में निवेशक सुरक्षा कोष बनाया जाना चाहिए।
    -    सार्वजनिक क्षेत्र के बीमार प्रतिष्ठानों के भविष्य के बारे में त्रिपक्षीय (मजदूर संगठनों, मालिकों और केन्द्र सरकार) समितियों की अधिकाधिक स्थापना की जानी चाहिए।

IX सार्वजनिक क्षेत्र के लिए नई औद्योगिक नीति
• 24 जुलाई, 1991 को सरकार ने नई औद्योगिक नीति की घोषणा की जिसे आगामी वर्षों में भी जारी रखा गया है। वर्ष 1993-94 तक समय-समय पर किए गए सुधारों के उपरांत नई औद्योगिक नीति के निम्नलिखित रूप है-
• 26 मार्च, 1993 से उन 13 उद्योगों को जो पहले सरकारी क्षेत्र के लिए आरक्षित थे उन्हें निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया। इसके परिणामस्वरूप, सरकारी क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या घटकर अब सिर्फ 6 रह गई है।
• मोटरकार और फ्रिज, कपड़े धोने की मशीनें जैसे ह्नाइट गुड्स उद्योगों को 28 अप्रैल, 1993 से लाइसेंस मुक्त कर दिया गया है। कच्ची खालें और चमड़ियां, चमड़ा और अच्छी प्रकार से चिकनाए हुए चमड़े जिसमें सांभर चर्म शामिल नहीं है, को भी लाइसेंस मुक्त कर दिया गया है। इस प्रकार, जिन मुदो के संबंध में औद्योगिक लाइसेंस अनिवार्य है, उनकी संख्या अब घटकर 15 रह गई है।
• केवल अनुषंगी लघु औद्योगिक उपक्रमों द्वारा विनिर्माण के लिए आरक्षित मद-सिले सिलाए वस्त्रो का विनिर्माण अब 29 जुलाई, 1993 की अधिसूचना के मध्य से बड़े पैमाने के उपक्रमों के लिए भी खुला है, बशर्तें कि उस बड़ी इकाई की संयत्रा और मशीनरी जैसी अचल परिसम्पत्तियों में निवेश 3 करोड़ रुपए से अधिक न हो और इसमें 50 प्रतिशत का निर्यात अनिवार्य है।
• पूंजीगत वस्तुओं पर उत्पाद शुल्कों को युक्तियुक्त बनाया गया और पूंजी संबंधी लागतों को कम करने तथा निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए आयात शुल्कों में और भी कटौती की गई।
• भारतीय भंडारों में विदेशी निवेश के स्तरों में वृद्धि करने के लिए विदेशी संस्थागत निवेशकों के लिए अल्पकालिक पूंजी लाभों पर 30 प्रतिशत की रियायत कर की दर आरम्भ की गई।
• औद्योगिक रूप से पिछड़े हुए राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में नए उद्योगों के लिए और भारत में कहीं भी विद्युत उत्पादन करने के लिए पांच वर्ष तक कर की छूट लागू की गई।
• सहायता-संघ के लिए अनिवार्यतः उधार देने की सीमा 5 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 50 करोड़ रुपए कर दी गई। इससे निगमित निवेशकों को अपने बैंक का चयन करने में अत्यधिक लचीलापन मिलेगा और वे बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा का लाभ उठा सकेंगे।
• वाणिज्यिक क्षेत्रों को अधिक ऋण उपलब्ध कराने के लिए नकदी प्रारक्षित अनुपात और सांविधिक नकदी अनुपात को कम करके क्रमशः 14 प्रतिशत और 34.75 प्रतिशत कर दिया गया।
• उच्चतम ऋण स्लैब के लिए न्यूनतम उधार देने की दर को घटाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया।

औद्योगिक रुग्णता
• औद्योगिक रुग्णता और निगम पुनर्निर्माण सम्बंधी समिति की सिफारिश -

  •     रुग्णता की परिभाषा बदली जाए-

1. मियादी उधार देने वाले संस्थानों को पुनर्भुगतान पर 180 दिन और अधिक की छूट और
2. नकद ऋणों में अनियमितताएं या 180 दिन या अधिक के लिए कार्यशील पूंजी।
    - बी. आई. एफ. आर. का केवल परिचालनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण आधार कार्य को तेजी से सरल बनाने का और कभी-कभी निर्णायक का होना चाहिए।
    - परिसमापन में विलम्ब की समस्या को कम करना। ऐसे पांच व्यापार परिसमापन न्यायाधिकरण होने चाहिए।
• औद्योगिक विवाद अधिनियम आई डी निम्नलिखित में संशोधन किया जाये -
1. औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 (एन) और 25 (ओ) में इस प्रकार से संशोधन किये जाएं ताकि कर्मचारियों के ले-आॅफ और छंटनी तथा स्थायी बन्दी के लिए सरकार की पूर्वानुमति लेने की आवश्यकता न पड़े।
    औद्योगिक विवाद अधिनियम का अध्याय 5-ख, (जो ले-आॅफ, छंटनी तथा बन्दी को शासित करता है) 100 या अधिक कर्मचारियों वाले उपक्रम पर लागू होता है। इसे 300 या अधिक तक बढ़ाया जाए और
2. छंटनी और बन्दी के लिए मुआवजा में, पूरी हुई सेवा के लिए प्रतिवर्ष 15 दिन के वेतन को बढ़ाकर एक महीने का वेतन किया जाए।

XI रंगराजन समिति की रिपोर्ट
    सरकारी क्षेत्र के उद्यमों में शेयरों के अपनिवेश पर रंगराजन समिति की प्रमुख सिफारिशें:
• मध्यमवधि के लिए अपनिवेश के लक्ष्य स्तर औद्योगिक नीति के अनुरूप होने चाहिए। सामान्यतः सरकारी क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों में अपनिवेश की जाने वाली इक्विटी की प्रतिशतता 49 प्रतिशत और अन्य मामलों में 74 प्रतिशत होनी चाहिए।
• अपनिवेश के वर्ष-वार लक्ष्यों की अपेक्षा एक स्पष्ट कार्य योजना तैयार की जानी चाहिए।
• अनेक कदम उठाने की आवश्यकता है जिसमें सरकारी क्षेत्र के उद्यमों का निगमीकरण, एक उचित ऋण इक्विटी विन्यास के साथ वित्तीय साधनों की पुनर्संरचना और यदि आवश्यक हो तो सम्बद्ध क्षेत्र के लिए एक स्वतंत्रा विनियामक आयोग बनाया जाना शामिल है।
• किसी भी सरकारी क्षेत्र के उद्यम के शेयरों का मूल्यांकन करने की पद्धति का चयन करते समय उस सरकारी क्षेत्र के उद्यम के कार्य प्रचालनों को प्रभावित करने वाली विशेष परिस्थियों, जैसे कि केवल मात्रा वाणिज्यिक प्रतिफलों की अपेक्षा सामाजिक उत्तरदायित्वों पर उसके विगत के फोकस को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है।
• सरकारी क्षेत्र के उद्यमों के कारीगरों और कर्मचारियों को शेयरों की अधिमान्य पेशकश की स्कीम।
• सरकारी क्षेत्र के उद्यमों की विस्तारकारी और योक्तिकीकरण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रियायती दरों पर उन्हें उधार देने के लिए सरकार द्वारा अपनिवेश की प्राप्तियों का 10 प्रतिशत भाग अलग से रख लेना चाहिए।
• सरकारी उद्यमों के अपनिवेश पर सुधारों, पुनर्संरचना और अपनिवेश के साथ-साथ की गई प्रगति का परिवीक्षण और मूल्यांकन करने के लिए कार्य योजना का पर्यवेक्षण करने हेतु एक स्थायी समिति गठित की जाए।

XII लघु उद्योग
• एक औद्योगिक उपक्रम को लघु उद्योग उपक्रमों के रूप में होने के लिए निम्न मानदण्ड को पूरा करना चाहिएः-
(क)    सरकार ने हाल ही में माइक्रो, लघु तथा मंझोले उद्योग विकास अधिनियम, 2006 बनाया।
(ख) लघु उद्योग, आनुषंगिक इकाइयों और निर्यात उन्मुखी इकाइयां जिनका संयंत्रा और मशीनरी के निवेश पांच लाख रुपए है (उनकी स्थिति को ध्यान न देते हुए) अति लघु उद्यम के रूप में परिभाषित किया गया है।
(ग)    छोटे उद्योगों के लिए पाँच करोड़ रुपए तथा मंझोले के लिए 10 करोड़ रुपए तय किया गया है।
(घ)    सालाना उत्पादन के 50 प्रतिशत का निर्यात दायित्वों का पालन करना होगा।
इस समय लघु उद्योग के लिए 114 वस्तुएं सुरक्षित है।
• प्रायः लघु व कुटीर उद्योग एक ही अर्थ में प्रयोग किए जाते है। लेकिन भारतीय परिस्थिति में इन दोनों के बीच अन्तर है। कुटीर उद्योग से आशय ऐसे उद्योग से है जो मुख्यतया परिवार के सदस्यों द्वारा पूर्णकालीन अथवा अंशकालीन धन्धे के रूप में चलाया जाता है। इन उद्योगों में पूंजी का विनियोजन नाममात्रा का होता है तथा उत्पादन प्रायः हाथों से किया जाता है। शक्ति चालित यंत्रों का उपयोग अपेक्षाकृत कम होता है। लघु व कुटीर उद्योग गांव में भी चलाये जाते है और शहर में भी। जब ये गांवों में स्थापित होते हैं तब इन्हें ग्रामीण उद्योग कहते है। प्रायः कुटीर उद्योगों का सम्बन्ध ग्रामीण क्षेत्रों से होता है।

लघु उद्योग क्षेत्र के लिए ऋण की सुविधाएं
• लघु औद्योगिक क्षेत्र अपनी आवधिक ऋण और कार्यशील पूंजी आवश्यकता को वाणिज्यिक बैंको, सहकारी बैंको, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको और राज्य वित्तीय निगमों द्वारा पूरा करता है।
• बैंकिंग व्यवस्था मुख्यतः कार्यशील पूंजी प्रदान करती है और जहां व्यवहार्य हो आवधिक ऋण भी।
• राज्य वित्तीय निगम सामान्यतः निवेश पूंजी प्रदान करते है किन्तु कभी-कभी ऋण पैकेज के भाग के रूप में कार्यशील पूंजी को भी शामिल करते है।
• लघु औद्योगिक क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (एन. एस. आई. सी.) और राज्य स्तर पर राज्य लघु उद्योग विकास निगमों (एस. एस. आई. डी. सीज) जो भाड़ा क्रय आधार पर मशीनरी की आपूर्ति करते है, से सहायता भी उपलब्ध है।
• नव स्थापित भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक द्वारा इन संस्थानों को वित्त पोषण प्रदान किया जाता है।
• लघु उद्योग इकाइयों को बैंको द्वारा प्रदत्त ऋण ”प्राथमिक क्षेत्र ऋण“ के रूप में माना जाता है।
• लघु उद्योग को पर्याप्त ऋण सुनिश्चित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर मार्गदर्शी सिद्धान्त जारी करता है।
• सिडबी के कार्य को व्यापक रूप से प्रत्यक्ष सहायता और अप्रत्यक्ष सहायता दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। लाभार्थियों के लिए प्रत्यक्ष सहायता को परियोजना वित्त, उपस्कर वित्त, अद्यः संरचना वित्त और बिल बट्टा स्कीमों के अधीन विशेष अधिकल्लित स्कीम के माध्यम से सारणीबद्ध किया गया है जबकि प्रत्यक्ष सहायता को पुनः वित्त पोषण और बिल पुनः बट्टा स्कीमों के माध्यम से बैंको और राज्य स्तरीय वित्तीय संस्थानों द्वारा सारणीबद्ध किया गया है।
• ”एकल खिड़की योजना“ के संचालन और आधार को व्यापक करने के लिए मुख्य आयोजन लागू किए गए है।

XIV नायक समिति की अनुशंसा
• नायक समिति की अनुशंसाओं के आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक ने लघु उद्यम क्षेत्र को पर्याप्त और समय पर ऋण प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए उपायों के एक पैकेज की घोषणा की है-
(1)  बैंको को सलाह दी गई है कि लघु उद्योग इकाइयों को उनकी प्रक्षेपित वार्षिक बिक्री न्यूनतम 20ः के आधार पर परिकलित कार्यशील पूंजी ऋण सीमा प्रदान करे जिसकी व्यक्तिगत मामलों मेंऋणसीमा एक करोड़ से अधिक नहीं है।
(2)  इस क्षेत्र की ऋण आवश्यकता को पूरा करते समय ग्रामीण उद्योग, अति लघु उद्योग और अन्य लघु इकाइयों के क्रम में वरीयता दी जानी चाहिए।
(3)  आठवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान लघु उद्योगों की युक्तियुक्त आवश्यकता को पूरा करने के लिए बैंको को समग्र आधार पर वार्षिक ऋण बजट तैयार करना चाहिए।
(4)  सिडबी की ”एकल खिड़की योजना“ का विस्तार सभी जिलों में किया जाना चाहिए। प्रारम्भ में 85 जिलों में से 62 को जिनमें पंजीकृत लघु इकाइयों की संख्या 2,000 से अधिक वाणिज्यिक बैंको और शेष 23 को राज्य वित्तीय निगमों को आवंटित गया है। जिलों को आवंटित करने का उद्देश्य लघु उद्योगों के वित्त पोषण हेतु वाणिज्यिक बैंको/राज्य वित्त निगमों को विशिष्ट उत्तरदायित्व सौंपना है न कि वाणिज्यिक बैंको और प्रतिरूप से आवंटित जिलों लघु उद्योगों को वित्त प्रदान करने से राज्य वित्त निगमों को रोकना है।
(5)  लघु उद्योग क्षेत्र को ऋण की मंजूरी और वितरण में कोई विलम्ब नहीं होना चाहिए। ऋण सीमा के निरस्त/रोकने के मामले में आवेदन को स्वीकृत अधिकारी का निर्णय सूचित करने से पूर्व एक हवाला कर्ज प्रस्ताव के उच्चतर अधिकारी को भेजा जाना चाहिए।
(6)  ऋण सीमा की स्वीकृति के लिए बैंको को विनिमय के रूप में अनिवार्य जमा पर जोर नहीं देना चाहिए।
(7)  बैंको को विशेष लघु उद्योग शाखाएं खोलनी चाहिए या उन शाखाओं को जिनसे लघु उद्योग ऋण लेने वालों की संख्या बहुत बढ़ी है को विशेष शाखा में बदलना चाहिए।
(8)  जीवन क्षम रुग्ण इकाइयों की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें पोषण कार्यक्रम में रखने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए।
(9)  राज्य वित्त निगमों, लघु उद्योग विकास निगमों और बैंको से 1 करोड़ रुपये तक कर्ज हेतु आवेदन करने के लिए लघु उद्योग इकाइयों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले मानक कर्ज आवेदन प्रपत्रा को और भी सरल कर दिया गया है। 2 लाख रुपये तक की सहायता हेतु उधार लेने वाले द्वारा भरा जाने वाला आवेदन प्रपत्रा साधारण प्रपत्रा है जिसका लघु उद्योगों के कुल ऋण में लगभग 90ः का योगदान है।
(10) लघु उद्योगों के वित्त पोषण हेतु सही रुझान, कौशल और अभिन्यास विकसित करने के लिए बैंककर्मियों को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
(11) बैंको को विशेष लघु उद्योग शाखाएं खोलनी चाहिए या उन शाखाओं को जिनमें लघु उद्योग ऋण लेने वालों की संख्या बहुत है, विशेष शाखा में बदलना चाहिए।
    
XV उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में चीनी उद्योग के विकास के कारण
•  देश में चीनी उद्योग धीरे-धीरे दक्षिण भारत की ओर पलायन कर रहा है। पहले उत्तर भारत के कारखाने देश की 90ः चीनी तैयार करते थे, किन्तु अब केवल 65ः चीनी तैयार करते है। दक्षिण भारत में इसके विकसित होने के कई कारण हैं-

  1. दक्षिण भारत में गन्ने का प्रति हैक्टेयर उत्पादन उत्तर भारत की अपेक्षा अधिक होता है तथा उसमें रस की मात्रा भी अधिक होती है। दक्षिण भारत में गन्ने से 12ः से 14ः चीनी प्राप्त होती है जबकि उत्तर भारत में 8ः से 10ः चीनी प्राप्त होती है।
  2. दक्षिण भारत में गन्ने का उत्पादन उत्तरी भारत की अपेक्षा अधिक अनुकूल (अंशतः समुद्र प्रभावित) जलवायु, अधिक मिश्रित सिंचाई के साधनों तथा कृषि करने के सुधरे तरीकों आदि की अनुकूल परिस्थितियों में होता है।
  3. दक्षिण भारत के कारखाने स्वयं गन्ना उत्पन्न करते हैं, अतः आवश्यकतानुसार गन्ना प्राप्त किया जा सकता है।
  4. अनेक कारखाने चीनी के मौसम के बाद मूंगफली का तेल निकालने का कार्य करते हैं।


XVI उत्तर भारत का चीनी उद्योग में वर्चस्व के कारण
• दक्षिण भारत में उपयुक्त सुविधाओं के बावजूद चीनी उद्योग में उत्तर भारत का आज भी वर्चस्व कायम है। इसके अनेक कारण है-
1. गंगा नदी की घाटी में नदियों द्वारा बहाकर लायी गई मिट्टी में उर्वरा शक्ति अधिक है जिससे यहाँ कम व्यय में उत्पादन बहुत होता है।
2. जल की आवश्यकता नहरों व नलकूपों से पूरी हो जाती है।
3. कोयले की जगह तराई क्षेत्रों से लकड़ी प्राप्त की जाती है। इसके अलावा गन्ना पेरने के बाद जो खाई (bagasse) बची रहती है, वह ईंधन का बहुत अच्छा काम करती है।
4. गन्ना उत्पादक क्षेत्र रेल व सड़क मार्गों की सुविधा से युक्त है।
5. उत्तर भारत में गन्ना ही प्रमुख व्यापारिक फसल है जबकि दक्षिण भारत में गन्ने को व्यापारिक फसलों-मूंगफली, तम्बाकू और कपास से प्रतिस्पद्र्धा करनी पड़ती है।
6. उपभोग के लिए विस्तृत बाजार भी पास ही है, अतः कारखानों से उपभोग के केन्द्रों तक चीनी पहुँचाने में अधिक व्यय नहीं होता।
7. उत्तर भारत की जनसंख्या अधिक होने के कारण मौसमी श्रमिक पर्याप्त संख्या में मिल जाते है।
8. गन्ने के उत्पादन के लिए यहाँ पर बड़े-बड़े चैरस मैदान उपलब्ध है जबकि दक्षिण भारत में गन्ने के लिए उत्पादन भूमि एक ही स्थान पर नहीं पायी जाती।

XVII अधिकतर जूट उद्योग के हुगली नदी बेसिन में संकेन्द्रित होने के कारण।
•  भारत में कुल 69 पटसन के कारखाने है। जिनमें से 64 कारखाने  कलकत्ता के निकट है। ये कारखाने हुगली नदी के तट के साथ-साथ 64 किलोमीटर लम्बे व 2 किलोमीटर चौड़े क्षेत्र में स्थित है। अधिकतर कारखाने टीटागढ़, काकीनाड़ा, हावड़ा, बजबज, रिशरा, अगरपाड़ा, सौकरेल, साइकिया आदि केन्द्रों में स्थित है।
सुविधाएं- इस क्षेत्र में पटसन उद्योग को निम्नलिखित सुविधाएं प्राप्त है-
1ण् पटसन की प्राप्ति- गंगा-ब्रह्मपुत्रा डेल्टा पटसन का मुख्य उत्पादक क्षेत्र है तथा निकट है।
2. कोयले से निकटता- रानीगंज की कोयला खान निकट ही स्थित है।
3. स्वच्छ जल- पटसन धोने तथा रंगने के लिए हुगली नदी से स्वच्छ जल प्राप्त हो जाता है।
4. यातायात की सुविधा- ये कारखानें रेल व जलमार्गों से दूसरे प्रदेशों से जुड़े हुए है।
5. सस्ते श्रमिक- घनी जनसंख्या होने के कारण सस्ते श्रमिक पर्याप्त संख्या में मिल जाते है।
6. पूर्व आरम्भ- यह उद्योग यहां पहले ही कुटीर उद्योग के रूप में प्रचलित था। इसलिए यहां श्रमिक कुशल भी है और कारगर भी।
7. बन्दरगाह- कलकत्ता बन्दरगाह से मशीनें मंगवाने तथा माल निर्यात करने की सुविधा प्राप्त है।
8. पूंजी तथा बैंकों की सुविधा- कलकत्ता में इस उद्योग के लिए पूंजी उपलब्ध है तथा लेन-देन के लिए बैंक सुविधा भी प्राप्त है।
9. नम जलवायु- समुद्री नम जलवायु इस उद्योग के अनुकूल है।

XVIII जूट उद्योग की प्रमुख समस्याएं
•  आधुनिक पटसन उद्योग को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है-
1. ड्डकृत्रिम पैकिंग पदार्थ से उत्पन्न कड़ी प्रतियोगिता जिससे पटसन सामग्री का बाजार बहुत घट गया है।
2. पटसन उद्योग को कच्चे माल की कमी
3. विदेशों में पटसन निर्मित वस्तुओं की मांग कम होना
4. पटसन मिलों में आधुनिक मशीनें और नवीन तकनीक का अभाव

XIX भारत में रेशम उद्योग का वितरण और समस्याएं
•  भारत में चार प्रकार का रेशम होता है- मलबरी, तसर, एरी तथा मूंगा।
•  कर्नाटक देश का सबसे बड़ा रेशम उत्पादक राज्य है। यहां देश के कुल रेशम उत्पादन का लगभग 70ः रेशम उत्पन्न होता है। रेशम उत्पादन के अन्य मुख्य केन्द्र श्रीनगर (कश्मीर), अमृतसर, जालन्धर (पंजाब), वाराणसी, शाहजहाँपुर तथा मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश), भागलपुर (बिहार), विष्णुपुर तथा बाँकुरा (प. बंगाल), नागपुर, शोलापुर या पूना (महाराष्ट्र), अहमदाबाद (गुजरात), बंगलौर (कर्नाटक), झेलम तथा तंजौर (तमिलनाडु) है। भारतीय रेशम की माँग यूरोपीय तथा एशिया के देशों में काफी अधिक है।
समस्या- इस उद्योग की निम्नलिखित समस्याएं है:
1. जापान तथा इटली के उद्योगों से कड़ी प्रतियोगिता।
2. संश्लिष्ट रेशे तथा कृत्रिम रेशम ने असली रेशम की लोकप्रियता को घटा दिया है।

XX भारत में चीनी उद्योग की समस्याएँ
1. खांडसारी और गुड़ उद्योग में गन्ने का अधिक प्रयोग
2. भारत में प्रति हैक्टेयर गन्ने का कम उत्पादन
3. चीनी उद्योगों के कार्यशील दिनों की संख्या कम होना
4. भारतीय गन्ने में रस की मात्रा कम होना
5. चीनी मिलों में पुरानी तकनीक और पुरानी मशीनों का प्रयोग
6. अधिकांश चीनी मिलों का बीमार होना आदि।

XXI भारत में मुम्बई तथा अहमदाबाद में सूती वस्त्र उद्योग के संकेन्द्रण के कारण
1. आद्र्र जलवायु
2. कपास उत्पादन का क्षेत्र
3. पश्चिमी घाट में स्थापित विद्युत केन्द्र से शक्ति की सुविधा
4. यातायात में रेल और जल की सुविधा
5. कुशल श्रम की उपलब्धता
6. बन्दरगाहों की सुविधा जिससे मशीनरी तथा कच्चे पदार्थों का आयात तथा उत्पादित माल का निर्यात किया जाता है
7. बाजार और पूँजी की उपलब्धता

XXII जमशेदपुर में लौह-इस्पात उद्योग की  अवस्थिति के कारण
•  जमशेदपुर में टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी की अवस्थिति के निम्नलिखित कारण है-
1. कच्चा मालहेमेटाइट लौह अयस्क उड़ीसा में मयूरभंज की गुरमहिसानी खानों तथा बिहार में सिंहभूमि जिले के नोआरमंडी खानों से तथा मैंगनीज उड़ीसा के केंदुझार जिले के जोड़ा खानों से और कोयला झरिया खानों से प्राप्त होता है।
2. कलकत्ता उद्योग के लिए बाजार एवम् निर्यात की सुविधा प्रदान करता है।
3. झारखण्ड और उड़ीसा के अत्यन्त सघन बसे हुए क्षेत्र से श्रम की सुविधा प्राप्त है।
4. जमशेदपुर सुवर्णरेखा नदी के किनारे पर बसा हुआ है। इसलिए शीतल कार्यों के लिए जल की सुविधा प्राप्त है।

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