गुप्तकालीन कला साहित्य - गुप्त-पूर्व एवं गुप्त काल में व्यापार और वाणिज्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : गुप्तकालीन कला साहित्य - गुप्त-पूर्व एवं गुप्त काल में व्यापार और वाणिज्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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गुप्तकालीन साहित्य

  • धर्मशास्त्रों का संशोधन और परिवर्तन इसी काल में हुआ।
  • अनेक स्मृतियों और सूत्रों पर भाष्य लिखे गए। अनेकों पुराणों तथा रामायण और महाभारत का अंतिम रूप इसी काल में तैयार हुआ। पुराणों का वर्तमान रूप इसी काल में निर्धारित हुआ। नारद, कात्यायन, पाराशर, बृहस्पति, याज्ञवल्क्य आदि स्मृति ग्रंथों की रचना इसी काल में हुई।
  • संस्कृत ही गुप्त सम्राटों के राजदरबार की भाषा थी। संस्कृत के उद्भट विद्वान, कवि एवं नाटककार कालिदास इसी युग में हुए। उनकी अमर कृति अभिज्ञानशाकुंतलम् विश्व की कुछेक अच्छी पुस्तकों में मानी जाती है। उनकी अन्य रचनाएँ मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम्, मेघदूतम्, ऋतुसंहारम्, कुमारसंभवम् और रघुवंशम् हैं। कालिदास ने अपनी ये पुस्तकें पाँचवी सदी ई. के पूर्वार्द्ध में लिखी जब मगध की गद्दी पर चन्द्रगुप्त द्वितीय और कुमारगुप्त आसीन थे।
  • विशाखदत्त इस युग के दूसरे महान् कवि और नाटककार हैं। इन्होंने दो नाटकों की रचना की - मुद्राराक्षस और देवीचन्द्रगुप्तम्। देवीचन्द्रगुप्तम् का कुछ अंश ही प्राप्य है।
  • किरातर्जुनिय के लेखक भारवि भी इसी युग के थे।
  • दांडिन, शूद्रक और हरिषेण इस युग के कुछ अन्य महान् कवि और रचनाकार हैं। दांडिन की उल्लेखनीय पुस्तक मृच्छकटिकम् अपने युग के अन्य पुस्तकों से विषय वस्तु के मामले में एकदम भिन्न है। इसमें एक गरीब ब्राह्मण सार्थवाह चारूदत और गणिका वसंत- सेना के प्रणयों की गाथा भरी-परी है।
  • पंचतंत्र की रचना इसी काल की मानी जाती है जिसके लेखक विष्णु शर्मा थे। आर्यभट्ट, वराहमिहिर और वाग्भट्ट इस युग के महान् वैज्ञानिक थे। आर्यभट्ट ने दो वैज्ञानिक ग्रंथों की रचना की - आर्यभट्टीय और सूर्यसिद्धांत। वराहमिहिर की रचनाएँ पंचसिद्धांतिक, वृहत्संहिता, वृहज्जातक, लघुजातक आदि थीं। छठी शताब्दी में बाग्भट्ट ने आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांग हृदय की रचना की।

 

गुप्त काल

  • सोने के प्रारंभिक गुप्त सिक्के उत्तरकालीन कुषाणों के सिक्कों से बहुत मिलते हैं जिसमें मुख भाग पर राजा खड़ा होता है और वेदि पर आहुति अर्पित कर रहा होता है। पृष्टभाग भी कुषाणों के सिक्कों के समान ऊँची पीठ वाले सिंहासन पर अर्दोक्षों को बैठा दिखलाया गया है। बाद में अर्दोक्षों का स्थान कमल पर बैठी लक्ष्मी ने ले लिया।
  • गुप्त शासकों ने नए कलात्मक ढंग के सिक्के जारी किए जिनमें धनुर्धर प्रकार, युद्ध-परशु प्रकार, चीता घातक प्रकार, शेर घातक प्रकार, छत्र प्रकार, घुड़सवार प्रकार, हाथी सवार प्रकार आदि प्रमुख थे। इनमें से अधिकांश भावों की दृष्टि से मौलिक हैं।
  • समुद्रगुप्त के अश्वमेध प्रकार के सिक्के और चन्द्रगुप्त द्वितीय के शेर-घातक प्रकार के सिक्के सर्वोत्तम हैं किन्तु कुमारगुप्त प्रथम के समय से सिक्का कला का पतन आरम्भ हो गया।
  • समुद्रगुप्त के वीणावादक प्रकार के सिक्के में राजा वीणा बजाते दिखाया गया है। इससे संगीत में राजा की रुचि और कला को संरक्षण प्रदान करने का प्रमाण मिलता है। इन सिक्कों पर लक्ष्मी बैठी दिखाई गई हैं।
  • चन्द्रगुप्त प्रथम के सिक्कों के मुख भाग पर राजा और उसकी रानी कुमारदेवी एक दूसरे के सामने खड़े हैं। राजा रानी को एक अंगूठी या कंगन दे रहा है। पृष्ट-भाग पर दुर्गा शेर पर बैठी दिखाई गई हैं।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय ने चाँदी के सिक्के पश्चिमी क्षत्रपांे के अधीन प्रदेशों में चलाये थे, परंतु कुमारगुप्त प्रथम के समय में चाँदी के सिक्के गुप्त साम्राज्य के गृह-प्रांतों के लिए भी चला दिए गए।
  • कभी-कभी कई श्रेणियों को मिलाकर एक केन्द्रीय श्रेणी बनाई जाती थी, जैसे श्रेष्ठी-कुलीक निगम अर्थात् साहूकारों और कारीगरों का निगम और श्रेष्ठी-सार्थवाह-कुलीक निगम साहूकारों, कारीगरों और व्यापारियों के निगम।
  • गुप्तकालीन गांधार अभिलेख में कुओं, तालाबों, भवनों वाले मन्दिरों, पीने वाले पानी के एकत्र करने, उद्यानों, झीलों, पुलों आदि नगर की सुविधाओं का उल्लेख किया गया है।
  • पुण्ड्र देश क्षूण कपड़े का उत्पादन करता था। सर्वोत्तम रेशमी कपड़े बनारस में बनाए जाते थे। अति उच्चकोटि का सूती वस्त्रा मदुरा में तैयार किया जाता था।
  • चरक संहिता में सोने, चाँदी, शीशे, तांबे और काँसे के बने औजारों का उल्लेख मिलता है।
  • बृहत् संहिता में उस समय के बीस विभिन्न प्रकार के आभूषणों का उल्लेख है।

 

 

गुप्त-पूर्व काल

  • रोम की स्त्रियाँ साँप की केंचुल की तरह बारीक बुनी भारतीय मलमल को पहनना बहुत पसंद करती थीं।
  • कश्मीर, कोशल, विदर्भ और कलिंग हीरों के लिए विख्यात थे। बंगाल मलमल के लिए मशहूर था।
  • सोपारा और कल्याण पश्चिमी तट पर प्रसिद्ध नगर थे। प्रतिष्ठान नगर भी व्यापार का केन्द्र था।
  • कहा जाता है कि राजगृह में लगभग 36 प्रकार के शिल्पी रहते थे। मिलिन्दपन्हो में 75 व्यवसायों का उल्लेख है और उनमें से 60 शिल्पों से संबंधित थे। उद्योगों के विकास से उनको भी प्रोत्साहन मिला। उनमें से 8 व्यवसाय सोना, चाँदी, ताँबा, टिन, सीसा, पीतल, लोहा आदि धातुओं से संबंधित थे।

 

  • एक अधिक दक्षिणाभिमुख मार्ग कंधार और हेरात से एकबतना (परवर्ती हमादान) तक जाता था और वहां से यह पूर्वी भूमध्यसागर के बंदरगाहों से जुड़ जाता था।
  • एक अन्य महत्वपूर्ण राजपथ कंधार को पर्सिपोलस और सूसा से जोड़ता था।
  • पश्चिमी बंदरगाहों को जाने वाले जलयान या तो फारस की खाड़ी से ऊपर बेबीलोन तक तटवर्ती मार्ग का अनुसरण करते थे या अरब सागर से होकर अदन अथवा सोकोट्रा तक जाते थे।
  • गर्मियों में अरब सागर पर उत्तर-पूर्व की ओर चलने वाली मानसूनी हवाओं का उपयोग सबसे पहले अरबों ने किया था। इन हवाओं के कारण सागर-मध्य की यात्रा तटीय मार्ग की तुलना में द्रुत गति से होने लगी।
  • मध्य-प्रथम शताब्दी ई. पू. में भूमध्यसागरीय संसार के अन्य व्यापारी भी इन हवाओं से परिचित हो गए और इनकी उपयोगिता को समझने लगे।
  • एक क्लासिकी अनुश्रुति है कि जहाजरानी के लिए इन हवाओं की उपयोगिता की खोज हिप्पेलस ने की थी।
  • लाल सागर के बंदरगाहों से चलनेवाले जहाज दक्षिण-पश्चिमी मानसून की प्रतीक्षा करते थे, और उसके आने पर यात्रा शुरू करते थे। सर्दी के मौसम में भारत से होकर लौटनेवाले मानसून इन जहाजों को वापस ले जाते थे।
  • अफगानिस्तान होते हुए मध्य एशिया को जानेवाला एक मार्ग ऐसा था जो बाद में ‘प्राचीन रेशम का मार्ग’ (old silk route) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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स्मरणीय तथ्य

  • सातवाहन वंश की नागरिका ने दो अल्पवयस्क पुत्रों की संरक्षिका के रूप में शासन किया।
  • समुद्रगुप्त ने 18 शासकों को परिचायक नियुक्त किया था।
  • समुद्रगुप्त की अनुमति से श्री लंका के शासक मेघवर्मन ने गया में ‘महाबोधि संघाराम’ नामक विहार का निर्माण कराया।
  • रुद्रसिंह तृतीय द्वारा शासित गुजरात व काठियावाड़ पर चन्द्रगुप्त ने अपना आधिपत्य स्थापित किया।
  • भारत और रोमन साम्राज्य के बीहोने वाले व्यापार का मुख्य केन्द्र या मिलान बिन्दु सिकन्दरिया था।
  • संगम साहित्य, रोम के सोने-चांदी के सिक्कों का दक्षिण भारत के तटीय प्रदेशों में पाया जाना, अरिकामेडु में खोजा गया रोमन बस्ती का अवशेष आदि स्रोतों से इस बात की पुष्टि होती है कि भारत और रोमन साम्राज्य के बीव्यापार काफी विकसित था।
  • पांण्ड्य वंश के शासक ने 20 ई. पू. में आगस्टस के दरबार एथेंस में एक दूतमंडल भेजा था।
  • भारत से रोम को निर्यात की जाने वाले वस्तुओं में प्रमुख थीं - मशाले, आभूषण, अच्छे वस्त्र।

 

  • कुषाण राजा एक प्रकार से भारत और चीन के बीकड़ी का काम करते थे तथा बौद्ध प्रचारकों के कार्यकलापों ने इन संबंधों को और घनिष्ट बना दिया। भारत में चीनी रेशम के आयात ने पहले ही इस घनिष्टता का शिलान्यास कर दिया था। 
  • रोमन व्यापारी कभी-कभी जोखिम उठाकर गोबी के रेगिस्तान तक बढ़ जाते थे, किंतु भारतीय व्यापारियों ने यह समझने में देर नहीं लगाई कि चीन तथा रोम के बीविलास वस्तुओं के व्यापार में मध्यस्थ होना लाभ का सौदा है।
  • दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापार में भारत की रुचि जागृत करने का श्रेय कुछ अंशों में रोम से होने वाले व्यापार को भी है। बर्मा और असम से होकर थल-मार्ग स्थापित करने के प्रयत्न किए गए किंतु जल-मार्ग अधिक सुविधाजनक पाया गया। जल-मार्ग में जोखिम काफी था मगर उसकी भरपाई रोम निवासियों को बेचे जाने वाले मसालों पर भारी मुनाफों से हो जाती थी।
  • मौर्यकाल से चली आ रही शिल्प-श्रेणियां उत्पादन को नियोजित करने और लोकमत का निर्माण करने - दोनों दृष्टियों से नागरिक जीवन में और अधिक महत्वपूर्ण बन गईं।
  • शिल्पी बहुत बड़ी संख्या में इन श्रेणियों के सदस्य बनते थे, क्योंकि व्यक्तिगत रूप में श्रेणियों से प्रतिस्पद्र्धा करना उनके लिए कठिन था। इसके अतिरिक्त श्रेणियां उन्हें सामाजिक मर्यादा और बहुत हद तक सामान्य सुरक्षा भी प्रदान करती थीं।
  • कुछ विशिष्ट वस्तुओं की बढ़ती हुई मांग और उसके फलस्वरूप उनका उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता अनुभव करके कुछ श्रेणियां किराए के श्रमिकों और दासों को काम पर लगाने लगीं।
  • जिस क्षेत्र में ये श्रेणियां कार्य करती थीं, उसमें उन्हें अपना पंजीकरण कराना पड़ता था और क्षेत्र परिवर्तन करने के लिए स्थानीय अधिकारियों से अनुमति प्राप्त करनी पड़ती थी।
  • किसी भी व्यवसाय के शिल्पी अपनी श्रेणी बना सकते थे, और लाभप्रद होने के कारण अधिकांश व्यवसायों के शिल्पियों ने अपनी-अपनी श्रेणियां बना ली थीं। प्रमुख श्रेणियां कुंभकारों, धातुकारों और काष्ठकारों की थीं।
  • ज्यों-ज्यों व्यापार बढ़ता गया, प्रमुख श्रेणियों का आकार भी बढ़ता गया।
  • ये श्रेणियां कार्य करने के नियम और तैयार माल की गुणवत्ता तथा उनके मूल्य का निर्धारण स्वयं करती थीं।
  • श्रेणि-सदस्यों के व्यवहार को एक श्रेणि- न्यायाधिकरण के माध्यम से नियंत्रित किया जाता था। श्रेणि-धर्म को कानून के सदृश मान्यता प्राप्त थी।
  • श्रेणी अपने सदस्यों के व्यक्तिगत जीवन में भी हस्तक्षेप करती थी, जो इस नियम से सिद्ध होता है कि यदि कोई विवाहित स्त्री भिक्षुणी बनकर बौद्ध संघ में सम्मिलित होना चाहती थी तो उसे न केवल अपने पति से बल्कि उस श्रेणी की भी अनुमति लेनी होती थी, जिसका वह (उसका पति) सदस्य है।
  • चूंकि बहुधा बच्चों को अपने पिता का व्यवसाय ही अपनाना पड़ता था, इसलिए श्रेणियों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सदस्यों की कमी नहीं रहती थी।
  • श्रेणी के अलावा कर्मचारियों की अन्य संस्थाएं भी थीं, जैसे - कर्मचारी सहकारी समितियां। इनमें साधारणतया किसी एक उद्यम से संबंधित विभिन्न कलाआंे और शिल्पियों का समावेश होता था।

स्मरणीय तथ्य

  • भारत में निर्मित विलास में वस्तुओं की अत्यधिक मांग, निर्यात के बदले भारत में सोने-चांदी का आगमन, रोमन सिक्के का भारत द्वारा आयात आदि तथ्य भारत के पक्ष में अनुकूल व्यापार संतुलन के लिए उत्तरदायी थे।
  • रोमन शासक नीरो की मृत्यु के उपरांत आर्थिक कठिनाइयों के कारण भारत और रोम के बी व्यापार मुख्यतः वस्तु-विनिमय प्रणाली द्वारा होने लगा।
  • ऐतरेय ब्राह्मण हमें आन्ध्र सातवाहन वंश की जानकारी देता है।
  • गुप्त काल में रचित पुस्तक ‘नवनीतकम’ चिकित्सा से संबंधित है।

 

  • श्रेणियों ने शिक्षा की भी व्यवस्था की, यद्यपि यह औपचारिक शिक्षा नहीं थी। औपचारिक शिक्षा ब्राह्मणों और भिक्षुओं के हाथ में थी। ये श्रेणियां तकनीकी शिक्षा का केंद्र बन गई थीं।
  • खुदाइयों में ऐसी बहुत-सी मुद्राएं मिली हैं जिन पर श्रेणियों और निगमों के प्रतीक-चिन्ह अंकित हैं।
  • उत्सव-समारोहों के अवसर पर श्रेणियों की पताकाएं और अधिकार-चिन्ह शोभा यात्रा में ले जाए जाते थे। अधिकार-चिन्ह श्रेणी को विज्ञापित करने के साधन भी थे।
  • श्रेणियों द्वारा अनेक धार्मिक संस्थाओं और दातव्य प्रयोजनों के लिए उदार दान दिए जाते थे। उदाहरणार्थ, अनाज-विक्रेताओं की एक श्रेणी ने एक अत्यंत कलात्मक ढंग से उत्कीर्ण गुफा बौद्धों को दान दी थी; शिल्पियों की एक श्रेणी ने सांची स्तूप के चारों ओर कठघरों तथा प्रवेश द्वारों पर पाषाण-शिल्प का उत्कीर्णन किया था।
  • नासिक के एक गुफा लेख में, जो किसी शक राजा के आदेश पर अंकित किया गया था, एक मंदिर के लिए वृत्तिदान का उल्लेख है, जिसके लिए विशाल धनराशि बुनकरों की एक श्रेणी में विनियोजित कर दी गई थी, और उस राशि के ब्याज से वृत्तिदान की व्यवस्था होती थी।

 

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