चंपारण आंदोलन और खेड़ा आंदोलन - 1857 का विद्रोह एवं अन्य आंदोलन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : चंपारण आंदोलन और खेड़ा आंदोलन - 1857 का विद्रोह एवं अन्य आंदोलन, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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चंपारण आंदोलन और खेड़ा आंदोलन

 चंपारण आंदोलन
 ¯ 1917 ई. में महात्मा गांधी ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया। बिहार के चम्पारण जिले में नील की खेती करने वाले किसानों को उनके यूरोपीय मालिकों द्वारा प्रताड़ित किया गया था। 
 ¯ 1917 ई. में चंपारण के एक जमींदार राजकुमार शुक्ल ने गाँधी को चंपारण बुलाने का फैसला किया। 
 ¯ गाँधी के चंपारण पहुँचतेे ही वहाँ के कमिश्नर ने गाँधी जी को वहाँ से तुरंत चले जाने का आदेश दिया। 
 ¯ गाँधीजी ने इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया और इसके लिए किसी भी दंड को भुगतने का फैसला कर लिया। 
 ¯ गाँधीजी अपने सहयोगी ब्रज किशोर, राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई, नरहरि पारेख, जे. बी. कृपलानी इत्यादि लोगों के साथ सबेरे निकल जाते और दिन भर घूम-घूमकर किसानों के बयान दर्ज करते। 
 ¯ इस समस्या के समाधान के लिए सरकार ने एक आयोग गठित किया, जिसमें गाँधीजी को भी सदस्य बनाया गया। 
 ¯ गाँधीजी ने आयोग को यह समझा दिया कि तिनकठिया प्रणाली खत्म होनी चाहिए। उन्होंने आयोग को यह भी समझाया कि किसानों से जो पैसा अवैध रूप से वसूला गया है उसके लिए उन्हें हरजाना दिया जाए। 
 ¯ बागान मालिक किसी तरह अवैध वसूली का 25ः वापस करने पर राजी हुए। 
 ¯ एक दशक के भीतर ही बागान मालिकों ने चंपारण छोड़ दिया।

अहमदाबाद के मिल मजदूरों का आंदोलन
 ¯ अहमदाबाद में मिल मालिकों और मजदूरों में प्लेग-बोनस को लेकर विवाद हुआ था। 
 ¯ प्लेग का प्रकोप खत्म होने के बाद मालिक इसे समाप्त करना चाहते थे; जबकि मजदूर इसे बरकरार रखने की माँग कर रहे थे। 
 ¯ ब्रिटिश कलक्टर ने इस समस्या को सुलझाने के लिए गाँधीजी को कहा। 
 ¯ मिल मालिकों में से एक अंबालाल साराभाई थे जो गाँधीजी के दोस्त थे और हाल ही में उन्होंने साबरमती आश्रम के लिए काफी पैसा दिया था। 
 ¯ अंबालाल साराभाई की बहन अनुसूइया बेन इस संघर्ष में गाँधी जी के साथ थी। 
 ¯ गाँधीजी ने मजदूरों की माँग पूरी करने के लिए खुद अनशन पर बैठने का फैसला किया। 
 ¯ गाँधीजी के अनशन का मालिकों पर असर पड़ा और वे सारे मामले को ट्रिब्यूनल को सौंपने पर राजी हो गए। 
 ¯ हड़ताल समाप्त हुई और ट्रिब्यूनल ने 35 फीसदी बोनस देने का फैसला किया। 
 ¯ यह घटना 1918 की है।

खेड़ा आंदोलन
 ¯ खेड़ा जिला के किसान बहुत मुसीबत में थे। समस्या का कारण था फसल बरबाद होने के बाद भी सरकार किसानों से मालगुजारी वसूल करती थी। 
 ¯ किसानों की माँग थी मालगुजारी माफ की जाए, पर सरकार मान नहीं रही थी। 
 ¯ खेड़ा जिला के युवा वकील वध्भभाई पटेल, इंदुलाल याज्ञिक तथा अन्य अनेक युवाओं ने गाँधीजी के साथ गाँवों का दौरा किया। 
 ¯ सरकार लगान न देने वाले किसानों की संपत्ति कुर्क कर रही थी। 
 ¯ गाँधीजी ने किसानों को लगान नहीं देने की शपथ दिलाई। 
 ¯ गाँधीजी ने कहा यदि सरकार गरीब किसानों से लगान नहीं लेती है, तो जो लोग लगान दे सकते ह®, वे स्वेच्छा से पूरा लगान दे सकते हैं।
 ¯ इसी बीच गाँधीजी को पता चला कि सरकार ने अधिकारियों को गुप्त निर्देश दिया है कि लगान उन्हीं से वसूला जाए जो देने की स्थिति में है। इस तरह गाँधीजी द्वारा संचालित खेड़ा आंदोलन सफल हुआ।
 बारदोली सत्याग्रह (गुजरात)
 ¯ सूरत जिले के बारदोली तालुके में 1928 में लगान न देने का आह्नान किया गया। 
 ¯ यह आंदोलन भी असहयोग आंदोलन की ही देन था। 
 ¯ बारदोली के स्थानीय नेता कल्याण जी और कुंअर जी महंत (दो भाई) और दयालजी देसाई ने इस आंदोलन को नई दिशा दी। 
 ¯ इस क्षेत्र के कालिपराज (अश्वेतजन) तथा उजलीपराज (सवर्ण) ने इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
 ¯ 1922 के बाद हर साल कालिपराज सम्मेलन होता। कालिपराजों के वार्षिक सम्मेलन की अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की। 
 ¯ गाँधीजी ने कालिपराज का नाम बदलकर रानीपराज रख दिया। इसका अर्थ था - जंगल के वासी।
 ¯ 1926 में जब यह पता चला कि लगान पुनरीक्षण अधिकारियों ने लगान में 30ः बढ़ोत्तरी की सिफारिश की है तो कांग्रेस नेताओं ने इसका विरोध किया और इस मामले की जाँच के लिए बारदोली जाँच समिति का गठन किया। 
 ¯ बारदोली जाँच समिति ने जुलाई 1926 में अपनी रिपोर्ट दी जिसमें लगान बढ़ोत्तरी को अनुचित बताया गया। 
 ¯ मार्च 1927 में भीमभाई नाईक और शिवदाससानी के नेतृत्व में किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल बंबई सरकार के राजस्व विभाग के प्रमुख अधिकारियों से मिला। 
 ¯ जुलाई 1927 में सरकार ने 30ः लगान बढ़ोत्तरी को घटाकर 21.97ः कर दिया। परंतु इससे लोग संतुष्ट नहीं हुए।
 ¯ इसी बीच कादगि संभाग के बाभनों गाँव में 60 गाँवों के प्रतिनिधियों की बैठक हुई जिसमें बल्लभभाई पटेल को आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए कहा गया (1928)। 
 ¯ बल्लभभाई ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया और 5 फरवरी, 1928 से पहले बारदोली आने का आश्वासन दिया। 5 फरवरी, 1928 से ही लगान सरकार को देना था।
 ¯ 4 फरवरी, 1928 को पटेल बारदोली पहुँच गए। 
 ¯ किसानों ने प्रभु और खुदा नामों पर शपथ ली कि वे लगान नहीं देंगे। 
 ¯ बारदोली सत्याग्रह में उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि दी गई। उन्हें यह खिताब बारदोली की औरतों ने दिया। 
 ¯ सरदार पटेल ने पूरे तालुकों को 13 कार्यकर्ता शिविरों में बाँट दिया और प्रत्येक शिविर के लिए एक अनुभवी नेता की नियुक्ति की एवं बारदोली ‘सत्याग्रह पत्रिका’ का प्रकाशन शुरू किया (1928)। 
 ¯ इस आंदोलन में महिलाओं ने भी सक्रिय भूमिका निभाई, जिनमें पारसी महिला भीठूबेन पेटिट भक्तिबा, मनीबेन पटेल (सरदार पटेल की पुत्री), शारदाबेन, शाह और शारदा मेहता को वशेष रूप से लगाया गया। 
 ¯ जुलाई 1928 के आते-आते वाइसराय लार्ड इरविन को लगने लगा कि मामला ठीक नहीं है। उन्होंने गवर्नर विलसन पर दबाव डाला कि वह मामले को जल्द रफा- दफा करें। 
 ¯ 2 अगस्त, 1928 को गाँधीजी बारदोली पहुँच गए; इस आशय से कि यदि सरकार पटेल को गिरफ्तार करती है, तो वह खुद आंदोलन की बागडोर संभालेंगे।
 ¯ एक न्यायिक अधिकारी ब्रूमफील्ड और एक राजस्व अधिकारी मैक्स्र्वट ने सारे मामले की जाँच की और अपनी रपट में लिखा कि 30ः लगान बढ़ोतरी गलत थी।   इसे घटाकर 6.03ः कर दिया गया।

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