तीनों महान साम्राज्यों के पश्चात् जन जीवन और समाज - राजनीतिक एवं सामाजिक स्थिति (800 - 1200 ई.) UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : तीनों महान साम्राज्यों के पश्चात् जन जीवन और समाज - राजनीतिक एवं सामाजिक स्थिति (800 - 1200 ई.) UPSC Notes | EduRev

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तीनों महान साम्राज्यों के पश्चात्
 

  • पाल वंश के पतन के बाद सेन वंश ने साम्राज्य निर्माण द्वारा बंगाल को राजनीतिक नेतृत्व प्रदान किया। संभवतः वे कर्नाटक (दक्षिण भारत) से आए थे। 
  • सामंत सेन ने राढ़ में एक राज्य स्थापित किया। 
  • विजय सेन (1095-1158 ई.) इस वंश का सबसे प्रतापी राजा माना जाता है। 
  • सेन शासकों के काल में बंगाल में संस्कृत का काफी विकास हुआ। 
  • अंतिम राष्ट्रकूट नरेश को पुराने चालुक्य वंश से संबंधित तैलप द्वितीय ने अपदस्थ करके 973 ई. में कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना की। 
  • प्रतिहार राज्य बहुत-से छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया जिनमें से कुछ का संबंध राजपूतों के उत्थान से था।
  • दूसरे छोटे शासक भी शक्तिशाली बन गए और धीरे-धीरे उन्होंने उत्तर भारत के विभिन्न भागों में अपने छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए। नेपाल, असम में कामरूप, कश्मीर और उड़ीसा में उत्कल इसी प्रकार के राज्य थे। 
  • इसी समय पंजाब के पर्वतीय राज्यों चंबक (चंबा), दुर्गरा (जम्मू) और कुलुत (कुलू) आदि की स्थापना हुई। ये राज्य या तो पहाड़ियों पर थे या राजपूत राज्यों से बहुत दूर थे और राजपूतों के इतिहास से कोई संबंध नहीं रखते थे। 
  • जो राज्य राजपूतों के इतिहास से संबंध रखते थे, वे मध्य भारत और राजस्थान के राजा थे, जैसे बुंदेलखंड के चंदेलों या चैहानों के दक्षिण में राज्य करने वाले मेवाड़ के गुहिल। 
  • चैहान राज्य के उत्तर-पूर्व में तोमर वंश का राज्य था और वे हरियाणा और दिल्ली के चारों ओर के क्षेत्र पर शासन करते थे। उन्होंने भी प्रतिहारों के संरक्षण में छोटे शासक के रूप में राज करना आरम्भ किया परन्तु जब प्रतिहार कमजोर हो गए तो वे स्वतंत्रा हो गए। 
  • तोमरों ने सन् 736 ई. में ढिल्लिका (दिल्ली) नगर का निर्माण कराया। 
  • बाद में चैहानों ने तोमरों को पराजित करके उनके राज्य को अपने राज्य में मिला लिया। 


नए राजपूत वंश

  • राजपूतों का एक लम्बा और मनोरंजक इतिहास है। वे कौन थे और कहां से आए, यह आज भी रहस्य है। इतिहासकारों का विचार है कि उनमें से कुछ मध्य एशिया की उन जातियों से संबंधित हैं जो हूणों के उत्तर भारत के आक्रमण के बाद भारत में बस गए। वे कुलों में विभाजित थे। 
  • राजपूत राजाओं ने अपने वंशों के इतिहास लिखवाए जिनमें उनका संबंध प्राचीन सूर्यवंशी या चंद्रवंशी राजाओं से जोड़ा गया। 
  • किन्तु चार ऐसे राजपूत वंश भी थे जो अपने को इन दो प्राचीन वंशों का उत्तराधिकारी नहीं कहते थे। वे अपने को अग्निकुल का बतलाते थे। ये चारों वंश इस काल के इतिहास में सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए। वे प्रतिहार (या परिहार), चैहान (या चहमान), सोलंकी (या चालुक्य) और पंवार (या परमार) थे।
  • अग्निकुल के इन चार राजपूत राज्यों ने पश्चिम भारत, राजपूताना और मध्य भारत के कुछ भागों में अपने शासन स्थापित किए। 
  • परिहार कन्नौज क्षेत्र पर शासन करते थे। 
  • राजपूतों के मध्य भाग में चैहानों का शक्तिशाली राज्य था। 
  • काठियावाड़ और उसके आसपास के क्षेत्र में सोलंकियों की शक्ति का उदय हुआ। 
  • पंवारों ने इंदौर के निकट धार को अपनी राजधानी बनाकर मालवा प्रदेश में अपना राज्य स्थापित किया। 
  • इनमें से बहुत से वंशों ने प्रतिहार और राष्ट्रकूट राजाओं के संरक्षण में अपना शासन प्रारम्भ किया, बाद में अपने संरक्षकों के विरुद्ध विद्रोह किया और अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया।


चैहान या चहमान

  • चौहान वंश की अनेक शाखाओं में से सातवीं शताब्दी में वासुदेव द्वारा स्थापित शाकम्भरी (अजमेर के निकट) के चैहान राज्य का इतिहास में विशेष स्थान है।
  • 12वीं शताब्दी में इस वंश में अजयराज नामक एक महत्वपूर्ण शासक हुआ। 
  • उसने अजमेर नगर बसाया और उसे राजप्रसादों व देवालयों से अलंकृत किया। 
  • विग्रहराज चतुर्थ अथवा बीसलदेव (लगभग 1153-63 ई.) भी इस वंश का एक कुशल शासक था। 
  • वह कवि और लेखक भी था। उसने ‘हरिकेल’ और ‘ललित विग्रहराज’ नामक दो नाटकों की रचना की।
  • पृथ्वीराज तृतीय (1178-92) चैहान वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। 
प्रमुख राजवंश
 (प्राचीन पूर्व-मध्यकालीन)

     राजवंश    संस्थापक    राजधानी
     हर्यंक वंश    बिम्बिसार    राजगृह, पाटलिपुत्रा
     शिशुनागवंश    शिशुनाग    राजगृह
     नन्द वंश    महापद्म नन्द    पाटलिपुत्र
     मौर्य वंश    चन्द्रगुप्त मौर्य    पाटलिपुत्र
     शंुग वंश    पुष्यमित्र शंुग    पाटलिपुत्र
     कण्व वंश    वसुदेव    पाटलिपुत्र
     सातवाहन वंश    सिमुक    प्रतिष्ठान
     इक्ष्वाकु वंश    वशिष्टपुत्र श्री सन्तूमल    नागार्जुनी कोण्डा
     कुषाण वंश    कडफिसस    पुरुषपुर (पेशावर)
     गुप्त वंश    श्री गुप्त    पाटलिपुत्र
     हूण वंश    तोरमाण    शाकल (स्यालकोट)
     पुष्यभूति वंश    नरवर्धन    थानेश्वर, कन्नौज
     पल्लव वंश    सिंहवर्मन चतुर्थ    कांचीपुरम
     चालुक्य वंश    जयसिंह    वातापि/बादामी
     चालुक्य वंश    तैलप द्वितीय    मान्यखेत/कल्याणी
     चालुक्य वंश    विष्णुवर्धन    वेंगी
     राष्ट्रकूट वंश    दन्तिवर्मन    मान्यखेत
     पालवंश    गोपाल    मुंगेर (बंगाल)
     गुर्जर-प्रतिहार वंश    हरिश्चन्द्र    गुजरात
     सेन वंश    सामंत सेन    राढ़
     गहड़वाल वंश    चन्द्रदेव    कन्नौज
     चैहान वंश    वासुदेव    अजमेर
     चंदेल वंश    नन्नुक    खजुराहो
     गंगवंश    वज्रहस्त पंचम    पुरी (उड़ीसा)
     उत्पल वंश    अवन्ति वर्मन    कश्मीर
     परमार वंश    उपेन्द्र या कृष्णराज    धार, बाद में उज्जैन
     सोलंकी वंश    मूलराज प्रथम    अन्हिलवाड़
     कलचुरी वंश    कोकल्ल    त्रिपुरी
     चोल वंश    विजयालय    तन्जावुर

 

  • किन्तु चार ऐसे राजपूत वंश भी थे जो अपने को इन दो प्राचीन वंशों का उत्तराधिकारी नहीं कहते थे। वे अपने को अग्निकुल का बतलाते थे। ये चारों वंश इस काल के इतिहास में सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए। वे प्रतिहार (या परिहार), चैहान (या चहमान), सोलंकी (या चालुक्य) और पंवार (या परमार) थे।
  • अग्निकुल के इन चार राजपूत राज्यों ने पश्चिम भारत, राजपूताना और मध्य भारत के कुछ भागों में अपने शासन स्थापित किए। 
  • परिहार कन्नौज क्षेत्र पर शासन करते थे। 
  • राजपूतों के मध्य भाग में चैहानों का शक्तिशाली राज्य था। 
  • काठियावाड़ और उसके आसपास के क्षेत्र में सोलंकियों की शक्ति का उदय हुआ। 
  • पंवारों ने इंदौर के निकट धार को अपनी राजधानी बनाकर मालवा प्रदेश में अपना राज्य स्थापित किया। 
  • इनमें से बहुत से वंशों ने प्रतिहार और राष्ट्रकूट राजाओं के संरक्षण में अपना शासन प्रारम्भ किया, बाद में अपने संरक्षकों के विरुद्ध विद्रोह किया और अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया।


चौहान या चहमान

  • चौहान वंश की अनेक शाखाओं में से सातवीं शताब्दी में वासुदेव द्वारा स्थापित शाकम्भरी (अजमेर के निकट) के चैहान राज्य का इतिहास में विशेष स्थान है। 
  • 12वीं शताब्दी में इस वंश में अजयराज नामक एक महत्वपूर्ण शासक हुआ। 
  • उसने अजमेर नगर बसाया और उसे राजप्रसादों व देवालयों से अलंकृत किया। 
  • विग्रहराज चतुर्थ अथवा बीसलदेव (लगभग 1153-63 ई.) भी इस वंश का एक कुशल शासक था। 
  • वह कवि और लेखक भी था। उसने ‘हरिकेल’ और ‘ललित विग्रहराज’ नामक दो नाटकों की रचना की।
  • पृथ्वीराज तृतीय (1178-92) चैहान वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। 
  • उसने बुंदेलखंड के चंदेल शासक पर्मादिदेव को महोवा के निकट एक युद्ध में पराजित किया। 
  • इसी युद्ध में आल्हा और ऊदल नामक दो प्रसिद्ध भाइयों ने महोवा की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहूति दे दी। 
  • 1186 में पृथ्वीराज तृतीय ने गुजरात के भीम तृतीय के विरुद्ध आक्रमण किया। 
  • 1191 ई. में उसने तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गोरी को पराजित किया लेकिन अगले ही वर्ष तराइन के द्वितीय युद्ध में वह मुहम्मद गोरी से हार गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई। 
  • उसकी जीवनी का वर्णन जयंक रचित संस्कृत कृति पृथ्वीराज विजय और हिन्दी के प्रसिद्ध महाकाव्य चन्द बरदाई रचित पृथ्वीराज रासो  में मिलता है। परन्तु चन्द बरदाई की कृति का ऐतिहासिक महत्व संदिग्ध है।


चंदेल

  • चंदेलों का प्रारम्भिक इतिहास अस्पष्ट है। नन्नुक इस वंश का पहला शासक था जिसकी चर्चा अभिलेखों में मिलती है। वह संभवतः नौवीं शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश में शासन किया। 
  • प्रारम्भ में चंदेलों की राजधानी मध्य प्रदेश में स्थित खजुराहो थी। 
  • वे कन्नौज के प्रतिहार सम्राटों के सामंत थे। 
  • यशोवर्मन (925-50 ई.) के समय चंदेल राज्य ने पर्याप्त शक्ति अर्जित कर ली थी। उसने कालिंजर, चेदि व मालवा पर विजय प्राप्त की। 
  • यशोवर्मन ने विष्णु की मूर्ति की स्थापना के लिए खजुराहो के भव्य चतुर्भुज मंदिर का निर्माण कराया। 
  • धंगदेव (950-1007 ई.) इस वंश का प्रसिद्ध शासक था। 
  • उसने ‘महाधिराज’ की उपाधि धारण की तथा कालिंजर के अजेय दुर्ग का निर्माण करवाया। 
  • उसने कौशल के सोमवंशी नरेशों को पराजित किया व आंध्र के चालुक्यों से भयंकर युद्ध किया। 
  • उसके काल में खजुराहो में शम्भु के कलापूर्ण मंदिर व अन्य मंदिरों का निर्माण हुआ। 
  • धंगदेव के बाद उसका पुत्र गंडदेव राजा हुआ। 
  • उसने भी 1008 ई. में महमूद गजनवी का सामना करने के लिए जयपाल के पुत्र आनन्दपाल द्वारा बनाए गए संघ में भाग लिया। 
  • उसका पुत्र और उत्तराधिकारी विद्याधर (लगभग 1017-1029 ई.) ने प्रतिहार वंश के अंतिम शासक राज्यपाल को पराजित किया और उसकी हत्या कर दी। 
  • उसने भोज परमार और कलचुरि गांगेय की सहायता से तुर्कों को मध्य देश से निकालने का प्रयास किया। 
  • विद्याधर के कई उत्तराधिकारी निर्बल शासक साबित हुए। 
  • कीर्तिवर्मन (करीब 1070-1098 ई.) ने चंदेल शक्ति को पुनर्जीवित किया। उसका सेनापति गोपाल ने लक्ष्मीकण् को बुरी तरह पराजित किया। 
  • राजा परमर्दि या परमल (1162-1202 ई.) इस वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक था। 
  • उसके काल में अजमेर का चैहान राजा पृथ्वीराज ने आक्रमण किया। 
  • 1202 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कालिंजर पर आक्रमण किया और वहां पर तुर्कों का अधिकार हो गया। 
  • चंदेल शासक कला के महान संरक्षक थे। शैव, वैष्णव और जैन धर्म के 30 मंदिर खजुराहो में पाए जाते हैं।


परमार
 

  • दसवीं सदी के आरम्भ में जब प्रतिहारों का आधिपत्य मालवा से समाप्त हो गया, तब वहां परमार शक्ति का उदय हुआ। कुछ लोग इन्हें राष्ट्रकूटों का वंशज मानते हैं। 
  • इस वंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक सियक या श्रीहर्ष था। उसने मालखेद के राष्ट्रकूटों से संघर्ष किया। 
  • परमारों की वास्तविक शक्ति का उदय वाक्पतिराज (972-994 ई.) के काल में हुआ। 
  • इसने कल्याणी के चालुक्य राजा तैलप द्वितीय पर विजय पाई। 
  • इस वंश का सर्वाधिक लोकप्रिय राजा भोज परमार (1010-1055 ई.) था। 
  • वह ‘कविराज’ के नाम से विख्यात था। 
  • उसने अनेक ग्रंथों की रचना की। उसने कल्याणी के चालुक्य राजा विक्रमादित्य चतुर्थ और कलचुरी राजा गांगेयदेव को परास्त किया। ¯ भोज की महानता उसकी राजनीतिक और सैनिक सफलता से अधिक उसके द्वारा कला और साहित्य को दिए गए संरक्षण में निहित है। 
  • 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा को अपनी सल्तनत में मिला लिया।


चालुक्य (सोलंकी)
 

  • चालुक्यों या सोलंकियों का शासन गुजरात और काठियावाड़ में करीब साढ़े तीन शताब्दियों तक रहा। 
  • इस वंश की स्थापना मूलराज सोलंकी (974-95 ई.) ने की। उसने अन्हिलवाड़ को अपनी राजधानी बनाया। वह शैव धर्म का अनुयायी था और बहुत सारे मंदिरों का निर्माण करवाया। उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र चामुंडराज (995-1008 ई.) था। 
  • भीमदेव प्रथम (1022-64) इस वंश का प्रसिद्ध राजा था। 
  • इसके शासनकाल में 1025 ई. में महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर को नष्ट किए जाने की घटना का उल्लेख उपलब्ध अभिलेखों या जैन साहित्यों में नहीं मिलती। इसकी जानकारी सिर्फ मुस्लिम òोतों से प्राप्त होती है। 
  • भीम ने आबू के परमार राजा को हराया। 
  • उसका उत्तराधिकारी और पुत्र कर्ण प्रथम (1064-1094 ई.) का शासनकाल शांतिपूर्ण रहा। 
  • कर्ण का पुत्र जयसिंह (1094-1143 ई.) अपने युग का महान शासक था। 
  • उसने ‘सिंहराज’ की उपाधि धारण की। उसने शाकम्भरी के चैहान अर्णोराज को पराजित किया। 
  • उसने पटन में विशाल कृत्रिम झील सहòलिंग का निर्माण कराया। 
  • भीम द्वितीय (1178-1241 ई.) के शासनकाल में मुहम्मद गोरी ने गुजरात पर आक्रमण (1178 ई. में) किया। 
  • लेकिन भीम द्वितीय के हाथों आबू के निकट युद्ध में उसे बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी। 
  • इस वंश का अंतिम स्वतंत्र शासक कर्ण द्वितीय था, जिसने 1297 ई. में गद्दी संभाली। उसी के शासनकाल में अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात को अपने साम्राज्य में मिला लिया।


उड़ीसा
 

  • पांचवीं शताब्दी के अंत में कलिंग क्षेत्र में एक नए वंश की शक्ति का उदय हुआ जिसे पूर्वी गंग वंश कहते हैं। 
  • अनंतवर्मन चोडगंग (1078-1150 ई.) के साम्राज्य में समूचा उड़ीसा सम्मिलित था। उसका साम्राज्य गंगा से गोदावरी तक फैला था। 
  • उसी ने जगन्नाथपुरी मंदिर का निर्माण कराया। 
  • नरसिंह प्रथम (1238-64 ई.) ने कोणार्क के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। 
  • शिव को समर्पित लिंगराज मंदिर उड़ीसा के विकसित वास्तुकला का आदर्श नमूना है। 
  • ये सभी मंदिर नागर शैली में बने हैं।


जन जीवन
 व्यापार और वाणिज्य

 

  • इसे व्यापार और वाणिज्य में आए स्थिरता और अवनति का काल माना जाता है। परिणामस्वरूप नगरों और नागरिक जीवन में अवनति हुई। 
  • व्यापार और वाणिज्य में आए इस गतिरोध का मुख्य कारण पश्चिम में रोमन साम्राज्य का विध्वंश और इस्लाम के उदय होने से सासानी (ईरान) जैसे प्राचीन राज्यों का पतन था। 
  •  पुनः पश्चिम एशिया और उत्तर अफ्रीका में एक विस्तृत और शक्तिशाली अरब साम्राज्य के उदय के साथ व्यापारिक गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई। 
  • भारतीय वस्त्रों तथा मसालों की अमीर अरबी शासकों द्वारा मांग के कारण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापार बढ़ा। 
  • इस प्रकार दसवीं शताब्दी के पश्चात् उत्तर भारत में वैदेशिक व्यापार और वाणिज्य धीरे-धीरे पुनर्जीवित हुआ।
  • उस काल के चिंतन और विचारधाराओं में भी व्यापार और वाणिज्य के पतन की झलक मिलती है। इस अवधि में लिखे गए कुछ धर्मशास्त्री ने समुद्री यात्रा को अपवित्र माना। 
  • निःसंदेह इन प्रतिबंधों को सभी लोग गंभीरता से नहीं लेते थे। खासकर इस प्रतिबंध ने दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ भारत के सामुद्रिक व्यापार के विकास में बाधा नहीं पहुंचाई। यह व्यापार बारहवीं शताब्दी तक धीरे-धीरे बढ़ता ही गया।


समाज

  • वेतन की बजाय भूमि के लगान वसूल करने का अधिकार देकर वेतन देने की प्रणाली इस काल में बढ़ गई। 
  • कुछ स्थानीय सरदारों को भी अनुदान के रूप में भूमि पर अधिकार दिया गया था। 
  • अनुदानित व्यक्तियों का दूसरा बड़ा समुदाय ब्राह्मणों और विद्वानों का था। 
  • इस प्रकार राजा और किसानों के बीच में बहुत से मध्यवर्ती लोग आ गए जिन्हें सामंत कहा जाता था। 
  • ये सामंत लगान वसूल करते थे और उसका बड़ा भाग अपने उपयोग के लिए रखते थे। लगान का कुछ भाग राजा को भी मिलता था। 
  • सामंतों को राजा के लिए सैनिक भी रखना पड़ता था जिसे आवश्यकता पड़ने पर राजा मांग सकता था। 
  • सामंती व्यवस्था ने राजा की स्थिति को कमजोर बना दिया। 
  • शक्तिशाली सामंतों में आपस में समय-समय पर युद्ध भी होते थे। इस प्रकार लगान का अधिक भाग व्यर्थ ही युद्ध में व्यय होने लगा। 
  • इस परिस्थिति में सबसे अधिक कष्ट किसानों को होता था। उनको अपने सामंतों को न केवल लगान देना पड़ता था बल्कि उसके लिए बेगार भी करनी पड़ती थी। प्रायः सामंत किसानों से अतिरिक्त कर भी वसूल करते थे।
  • जाति व्यवस्था सामाजिक ढांचे का मूलाधार बन गई। 
  • निम्न जातियों की अयोग्यताओं में बढ़ोतरी हुई। 
  • अंतर्जातीय विवाह को भी हेय दृष्टि से देखा जाता था।
  • स्त्रियों की दशा में भी गिरावट आई। उन्हें वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित रखना जारी रहा। इसके अतिरिक्त लड़कियों की शादी की उम्र कम कर दी गई, जिसके कारण उनकी उच्च शिक्षा की सुविधा समाप्त हो गई। फिर भी घर में उनका आदर था। 
  • यदि किसी पुरुष की मृत्यु बिना पुत्र प्राप्ति के हो जाती थी तो कुछ मामलों को छोड़कर उसकी पत्नी को अपने पति की पूरी जायदाद का अधिकार मिल जाता था। 
  • कुछ लेखकों ने सती प्रथा को अनिवार्य बताया था लेकिन दूसरों ने इसकी भत्र्सना की।


शिक्षा और ज्ञान

  • ब्राह्मणों पर धार्मिक कर्मकांडों के अतिरिक्त शिक्षा देने का भी उत्तरदायित्व था। 
  • मंदिरों में स्कूल लगते थे और वहां ऊंची जातियों के बच्चों को शिक्षा दी जाती थी। उनमें से बहुत से संस्कृत और गणित का अध्ययन करते तथा धार्मिक पुस्तकें पढ़ते थे। 
  • विज्ञान के अध्ययन के प्रति रुचि कम हो गई थी। 
  • अब भी ज्ञान और साहित्य की भाषा संस्कृत थी। संस्कृत के अतिरिक्त दूसरी भाषाओं का भी विकास हो रहा था। इनका विकास सर्वसाधारण द्वारा बोली जानेवाली अपभ्रंश भाषाओं से हुआ। 
  • यह भारत का दुर्भाग्य था कि इस काल में जहां संसार के अन्य देशों, विशेषकर चीन और अरब देशों में वैज्ञानिक सोच का विकास हो रहा था, वहीं भारत इस मामले में पिछड़ा जा रहा था।


धर्म

  • इस काल में बौद्ध और जैन धर्मों का धीरे-धीरे ह्रा स हुआ और हिन्दू धर्म का पुनर्जागरण और विस्तार हुआ। 
  • बौद्ध धर्म के कुछ ऐसे रूप भी सामने आए जो हिन्दू धर्म से बहुत भिन्न नहीं थे। 
  • जैन धर्म विशेषकर व्यापारी वर्गों में लोकप्रिय था। गुजरात के चालुक्य राजाओं ने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया। दक्षिण भारत में नवीं एवं दसवीं शताब्दियों में जैन धर्म अपने विकास की चरम सीमा पर पहुंचा। 
  • इस काल में दक्षिण भारत में कई लोकप्रिय आंदोलनों का उदय हुआ जिसने शिव और विष्णु की उपासना को लोकप्रिय बनाया। यह भक्ति आंदोलन था। उनमें से लगभग सभी ने जाति-भेद की उपेक्षा की। 
  • भक्ति आंदोलन ने न केवल हिन्दू धर्म के विभिन्न पक्षों को ही जीता बल्कि बहुत बौद्धों और जैनियों को भी अपना अनुयायी बनाया। जनजातियों ने भी भक्ति आंदोलन को स्वीकार किया। 
  • दूसरा लोकप्रिय आंदोलन जिसका उदय बारहवीं शताब्दी में हुआ, वह था लिंगायत या वीरशैव आंदोलन। इसके संस्थापक बासव और उसका भतीजा चन्नाबासव कर्नाटक के कलचूरी राजाओं के दरबार में रहते थे। 
  • लिंगायत शिव के पुजारी थे। उन्होंने जाति व्यवस्था का कड़ा विरोध किया और उपावास, प्रीतिभोज, तीर्थयात्रा और बलिप्रथा को अस्वीकार किया। सामाजिक क्षेत्र में उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया और विधवा विवाह की अनुमति दी।
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