थियोसोफिकल सोसाइटी और वहाबी आंदोलन - सामाजिक एवं सांस्कृतिक जागरण, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : थियोसोफिकल सोसाइटी और वहाबी आंदोलन - सामाजिक एवं सांस्कृतिक जागरण, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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थियोसोफिकल सोसाइटी और वहाबी आंदोलन

थियोसोफिकल सोसाइटी
 ¯ थियोसोफिकल सोसाइटी उन पश्चिमी विद्वानों द्वारा आरम्भ की गई थी जो भारतीय संस्कृति और विचारों से बहुत प्रभावित थे। 
 ¯ 1875 में मैडम एच. पी. ब्लावेत्स्की (1831-91), एक जर्मन-रूसी रक्त की महिला, ने इस सोसाइटी की नींव अमेरिका में रखी। 
 ¯ बाद में कर्नल एम. एस. ओलकाॅट (1832-97) भी इसमें शामिल हो गए। 1882 में उन्होंने अपनी सोसाइटी का मुख्य कार्यालय मद्रास नगर के समीप एक बस्ती अडयार में स्थापित कर लिया। 
 ¯ इस समाज के अनुयायी ईश्वरीय ज्ञान, आत्मिक हर्षोन्माद और अन्तज्र्ञान द्वारा प्राप्त करने का प्रयत्न करते थे। 
 ¯ ये लोग पुनर्जन्म तथा कर्म में विश्वास करते थे और सांख्य तथा उपनिषदों के दर्शन द्वारा प्रेरणा प्राप्त करते थे, इनका विश्वास आध्यात्मिक भ्रातृभाव में था। यह आंदोलन भी हिन्दू पुनर्जागरण का भाग बन गया।
 ¯ 1897 में कर्नल ओलकाॅट की मृत्यु के बाद श्रीमती एनीबेसेन्ट (1847-1933) इसकी अध्यक्ष बनी और फिर यह आंदोलन काफी लोकप्रिय बना। 
 ¯ अपने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में श्रीमती बेसेन्ट का ईसाई मत से विश्वास उठ गया। 
 ¯ उनके पति जो पादरी थे, उन्होंने तलाक ले लिया और फिर 1882 में वह थियोसोफिकल सोसाइटी के सम्पर्क में आई। 
 ¯ 1889 मंे वह इसमें औपचारिक रूप से शामिल हो गई। 
 ¯ 1891 में मैडम ब्लावेत्स्की की मृत्यु पर वे भारत आई। 
 ¯ वह भारतीय विचार और संस्कृति से रू-बरू थी, ऐसा उनके गीता के अनुवाद से दृष्टिगोचर होता है। 
 ¯ वह वेदान्त में विश्वास रखती थी। 
 ¯ मैडम ब्लावेत्स्की का मुख्य बल अलौकिकवाद पर था आध्यात्मिकता पर नहीं। 
 ¯ श्रीमती बेसेन्ट को मन और प्रकृति को जोड़नेवाला एक पुल मिल गया। धीरे-धीरे वह हिन्दू हो गई - न केवल विचारों से अपितु, वस्त्र, भोजन, मेल-मिलाप और सामाजिक शिष्टाचार से भी। 
 ¯ भारत में थियोसोफिकल सोसाइटी उनकी देख-रेख में हिन्दू पुनर्जागरण का आंदोलन बन गई। 
 ¯ उन्हें भारत के प्राचीन धर्म में अगाध विश्वास था जिसके फलस्वरूप लोगों में एक आत्म-विश्वास और राष्ट्र निर्माण की भावना जागी। 
 ¯ उन्होंने 1898 में बनारस में सेन्ट्रल हिन्दू काॅलेज की स्थापना की जहाँ हिन्दू धर्म और पाश्चात्य वैज्ञानिक विषय की शिक्षा दी जाती थी। आगे चलकर इसी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का रूप ग्रहण कर लिया। 
 ¯ उन्होंने आयरलैंड की स्वराज लीग के नमूने पर भारतीय स्वराज लींग बनाई। 

वहाबी आंदोलन
 ¯ मुसलमानों की पाश्चात्य प्रभावों के विरुद्ध सर्वप्रथम प्रतिक्रिया जो हुई उसे वहाबी आंदोलन अथवा वलीउल्लाह आंदोलन के नाम से जाना जाता है। वास्तव में यह पुनर्जागरण आंदोलन था। 
 ¯ शाह वलीउल्लाह (1702-62) अठारहवीं शताब्दी में भारतीय मुसलमानों के वह प्रथम नेता थे जिन्होंन भारतीय मुसलमानों में पाश्चात्य प्रभावों के कारण आई गिरावट पर चिन्ता प्रकट की थी। उन्हांेने भारतीय मुसलमानों के रीति-रिवाजों तथा मान्यताओं में आई कुरीतियों की ओर ध्यान दिलाया। 
 ¯ उनके योगदान के मुख्य दो अंग थे -
 (1) उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस्लाम धर्म के चार प्रमुख न्यायशाóोंü में सामंजस्य होना चाहिए जिसके कारण भारतीय आपस में विभक्त हैं । 
 (2) उन्होंने धर्म में वैयक्तिक अन्तश्चेतना पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि जहाँ कुरान और हदीस के शब्दों की कभी-कभी विरोधात्मक व्याख्या हो सकती है, व्यक्ति को अपनी विवेक शक्ति के अनुसार फैसला करना चाहिए।
 ¯ बाद में शाह अब्दुल अजीज तथा सैयद अहमद बरेलवी (1786-1831) ने वली उल्लाह के विचारों को लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया। 
 ¯ उन्होंने इसे राजनीतिक रंग भी दिया। 
 ¯ इस विचार का प्रारंभ तब हुआ जब एक मौलवी अब्दुल अजीज ने यह फतवा दिया कि भारत दार-उल-हर्ष (काफिरों का देश) है और इसे दार-उल-इस्लाम बनाने की आवश्यकता है। 
 ¯ शुरू में यह पंजाब के सिख सरकार के विरुद्ध था। परन्तु 1849 में अंगेजों द्वारा पंजाब के विलयोपरांत यह अभियान अंग्रेजों के विरुद्ध बदल गया। 
 ¯ यह आंदोलन 1870 तक चलता रहा जबकि इसे वरिष्ट सैनिक बल द्वारा समाप्त न कर दिया गया।

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