द्वितीय विश्व-युद्ध , भारत छोड़ो’ आन्दोलन और आजाद हिंद फौज - स्वतंत्रता संग्राम, इतिहास, यूपीएससी UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : द्वितीय विश्व-युद्ध , भारत छोड़ो’ आन्दोलन और आजाद हिंद फौज - स्वतंत्रता संग्राम, इतिहास, यूपीएससी UPSC Notes | EduRev

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द्वितीय विश्व-युद्ध , भारत छोड़ो’ आन्दोलन और आजाद हिंद फौज

 

द्वितीय विश्व-युद्ध

  • 3 सितम्बर, 1939 को वायसराय ने प्रांतीय मंत्रिमंडलों या किसी भारतीय नेता की सलाह लिए बिना एतकरफा तौर पर भारत को जर्मनी के साथ ब्रिटेन के युद्ध में झोंक दिया। 
  • 29.30 अक्टूबर, 1939 को इस कदम के विरोध में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया। 
  • फासीवादी आक्रमण के विरुद्ध भारत का वैमनस्य स्वयं ब्रिटेन की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट रहा था। फिर भी लिनलिथगो ने न्यूनतम शर्तों पर पूर्ण सहयोग के अनेक प्रस्तावों को ठुकराव दिया। 
  • ये शर्तें थींः स्वतंत्र भारत के राजनीतिक गठन को निर्धारित करने के लिए युद्ध के पश्चात् एक संविधान सभा का वादा, और केन्द्र में सचमुकी उत्तरदायी सरकार जैसी किसी चीज का तुरंत गठन।
  • अगस्त 1940 में जब एक अलग-थलग द्वीप में ब्रिटेन घमासान हवाई युद्ध कर रहा था, तब भारतीय समर्थन प्राप्त करने के लिए एमरी और यहाँ तक की लिनलिथगो भी कुछ रियायतें देने के लिए मान गए थे, किन्तु उनके प्रस्तावों में चर्चिल ने बुरी तरह काँट-छाँट कर दी। 
  • परिणामस्वरूप लिनलिथगो का ‘अगस्त प्रस्ताव’ (8 अगस्त, 1940) उसके 17 अक्टूबर, 1939 के वक्तव्य से अधिक कुछ नहीं थाः अनिश्चित भविष्य में डोमिनियन स्टेटस, युद्ध-पश्चात् संविधान बनाने के लिए एक निकाय का गठन (जिसके लिए स्पष्ट रूप से अंततः ब्रिटिश पार्लियामेंट की अनुमति आवश्यक होती; इसमें सार्वत्रिक वयस्क मताधिकार द्वारा चुने जाने की बात नहीं की गई थी), वायसराय की कार्यकारिणी में तत्काल विस्तार जिससे इनमें कुछ और भारतीयों को सम्मिलित किया जा सके, और एक युद्ध-सलाहकार परिषद।
  • 1 जुलाई, 1941 में वायसराॅय की कार्यकारिणी में विस्तार करके पहली बार इसमें भारतीय बहुमत रखा गया (इसमें बारह में से आठ भारतीय थे किंतु प्रतिरक्षा, वित्त और गृह विभाग गोरों के ही अधीन रहे) और एक राष्ट्रीय प्रतिरक्षा परिषद की स्थापना की गई जिसका कार्य केवल सलाह देना था। 
  • शेष बातों में तक तक कोई पहल नहीं की गई जब तक कि दक्षिण-पूर्वी एशिया के संकट ने ब्रिटिश सरकार को मार्च-अप्रैल 1942 में नाटकीय क्रिप्स मिशन भेजने पर बाध्य नहीं किया।

लीग और पाकिस्तान

  • मार्1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में अपनाए जानेवाले पाकिस्तान के नारे को अंतिम रूप प्रदान करने में अंग्रेजों का प्रोत्साहन भी अवश्य रहा था। 
  • कभी-कभी पाकिस्तान की माँग का मूल इकबाल के उस भाषण में खोजा जाता है जो उन्होंने 1930 में लीग का सभापतित्व करते समय दिया था। 
  • कैंब्रिज में चैधरी रहमत अली के पंजाबी मुसलमान विद्यार्थियों के गुट को इस विचार का प्रणेता होने का श्रेय दिया जा सकता है। 
  • 1933 और 1935 में लिखे गए दो परचों में रहमत अली ने एक नई अस्मिता के लिए एक अलग राष्ट्रीय दर्जे की माँग की थी जिसे उसने ‘पाकिस्तान’ नाम दिया था (इसके अंतर्गत पंजाब, अफगान प्रांत, कश्मीर, सिंध और बलूचिस्तान आते थे)।
  • फिलहाल तो पाकिस्तान की धारणा अंग्रेजों के लिए इसलिए उपयोगी थी कि इसके माध्यम से वे भारत में संवैधानिक गतिरोध बनाए रख सकते थे, किंतु जिन्ना को एक सीमा तक प्रोत्साहन देते हुए भी उनकी सभी माँगों को स्वीकार करने का उनका कोई इरादा नहीं था। 
  • फलस्वरूप जिन्ना ने अंततः अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और अगले वर्ष सिंकदर हयात खान और फजलुल-हक को नई राष्ट्रीय प्रतिरक्षा परिषद की सदस्यता अस्वीकार करने के लिये बाध्य किया गया।

क्रिप्स मिशन

  • युद्ध भारत के निकट आ रहा था (15 फरवरी, 1942 को सिंगापुर का पतन हुआ, 8 मार्को रंगून का और 23 मार्को अंडमान द्वीपसमूह का)। 
  • अंततः अंग्रेजों को इस बात का एहसास हुआ कि कुछ सद्भावनापूर्ण कदम उठाकर भारतीय जनमत को अपने पक्ष में करना आवश्यक हो गया है।
  • 1942 में मार्के प्रथम सप्ताह में क्रिप्स ने युद्धकालीन मंत्रिमंडल को इस बात के लिए सहमत कर लिया कि ऐसा प्रारूप घोषित कर दिया जाए जिसमें अलहदगी के अधिकार की, प्रांतीय विधायिकाओं द्वारा चुनी हुई ‘संविधान-निर्मात्री सभा’ की, और प्रांतों को इसमें सम्मिलित न होने के अधिकार की और रजवाड़ों को अपने प्रतिनिधि भेजने के अधिकार सहित भारत को डोमिनियन स्टेटस दिए जाने की बात हो। 
  • यह घोषणा तत्काल प्रकाशित नहीं की गई, किंतु 23 मार्को इसके आधार पर भारतीय नेताओं से समझौते की बातचीत करने क्रिप्स भारत आए।
  • क्रिप्स मिशन आरंभ से ही अनेक अस्पष्टताओं और गलतफहमियों से ग्रस्त रहा और अंत में उन्हीं के कारण असफल भी रहा। 


‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन

  • अप्रैल 1942 ई. में क्रिप्स मिशन के असफल होने के चार महीने के भीतर ही आजादी के लिए भारतीय जनता का तीसरा महान संघर्ष शुरू हुआ। इस संघर्ष को ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
  • बंबई में 8 अगस्त, 1942 ई. को आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने एक प्रस्ताव पास किया। 
  • प्रस्ताव में घोषणा की गई कि भारत में ब्रिटिश शासन को जल्दी से समाप्त करना अति आवश्यक हो गया। आजादी और जनतंत्र की विजय के लिए फासिस्ट देशों तथा जापान के विरुद्ध लड़ रहे मित्र राष्ट्रों के लिए भी यह जरूरी है कि भारत को जल्दी से स्वाधीनता मिल जाए। 
  • प्रस्ताव में कहा गया कि भारत से ब्रिटिश सत्ता को हटा दिया जाए। 
  • प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि स्वतंत्र हो जाने पर भारत अपने संपूर्ण साधनों सहित उन देशों के साथ महायुद्ध में शामिल हो जाएगा जो फासिज्म और साम्राज्यवादी आक्रमण के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं । 
  • प्रस्ताव ने देश की आजादी के लिए ‘सबसे व्यापक स्तर पर अहिंसात्मक जन-आंदोलन’ शुरू करने की स्वीकृति दे दी। 
  • प्रस्ताव के पास हो जाने पर गाँधीजी ने अपने भाषण में कहा ”मैं आपको एक संक्षिप्त मंत्र देता हूँ। इसे आप हृदय में पक्का बिठा लीजिए और अपनी प्रत्येक संास के साथ इसे व्यक्त होने दीजिए। मंत्र है - करो या मरो“। इस प्रयास से हम या तो आजाद होंगे या मर मिटेंगे। 
  • भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ”करो या मरो“ और ”भारत छोड़ो“ का रणनाद हर जगह सुनाई पड़ने लगा।
  • 9 अगस्त, 1942 ई. की सुबह कांग्रेस के अधिकांश नेता गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें देश के विभिन्न भागों के जेलों में बंद कर दिया गया। 
  • कांग्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 
  • देश के हर हिस्से में हड़तालें हुईं, प्रदर्शन हुए। 
  • सरकार ने दमन का सहारा लिया। गोलियाँ चली, लाठी-चार्ज हुए और सारे देश में गिरफ्तारियाॅं हुई। 
  • गुस्से में आकर जनता भी हिंसा पर उतर आई। लोगों ने सरकारी सम्पत्ति पर हमले किए, रेल-पटरियों को तोड़ा और डाक-तार व्यवस्था में रूकावटें पैदा कर दी। कई स्थानों पर पुलिस के साथ मुठभेड़ हुई। 
  • आंदोलन के बारे में समाचारों के प्रकाशन पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। 
  • कई अखबारों ने अपना प्रकाशन बंद कर दिया, क्योंकि उन्हें प्रतिबंध स्वीकार नहीं थे। 
  • 1942 ई. के अंत तक करीब 60ए000 लोग जेल में बंद हो गए और सैकड़ों की मृत्यु हो गई। मरने वालों में अनेक बच्चे और वृद्ध महिलाएँ भी थीं। 
  • प्रदर्शन में भाग लेने पर तमलुक (बंगाल) में 73 साल की मातंगिनी हाजरा को, गोहपुर (असम) में 13 साल की कनकलता बरूआ को, पटना (बिहार) में सात तरूण विद्यार्थियों को और अन्य सैकड़ों को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया। 
  • देश के कुछ भाग - जैसे उत्तर प्रदेश में बलिया, बंगाल में तमलुक, महाराष्ट्र में सतारा, कर्नाटक में धारवाड़ और उड़ीसा में बालासोर तथा थलचर - ब्रिटिश शासन से मुक्त कर लिए गए और वहाँ की जनता ने अपनी सरकारें स्थापित की। 
  • पूरे महायुद्ध के दौरान जयप्रकाश नारायण, अरूण आसफ अली, एस. एम. जोशी, राममनोहर लोहिया आदि अनेकों द्वारा आयोजित क्रांतिकारी गतिविधियाँ जारी रहीं।
  • ब्रिटिश सेना और पुलिस ने तो यातनाएँ दी ही, बंगाल में भयंकर अकाल भी पड़ा। अकाल में करीब 30 लाख लोग मरे। भुखमरी के शिकार लोगों को राहत पहुँचाने में सरकार ने कोई विशेष दिलचस्पी नहीं ली।

आजाद हिंद फौज

  • दूसरे महायुद्ध के दौरान आजादी के संघर्ष की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी आजाद हिंद फौज की स्थापना और उसकी गतिविधियाँ। 
  • रासबिहारी बोस ने जो एक क्रांतिकारी थे और भारत से भाग निकलने के बाद कई साल से जापान में रह रहे थे, दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में रह रहे भारतीयों के सहयेाग से ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ की स्थापना की। 
  • जापान ने ब्रिटिश फौजों को हराकर दक्षिण-पूर्व एशिया के लगभग सभी देशों पर कब्जा कर लिया था। जापान ने ब्रिटिश सेना के हजारों भारतीय सैनिकों को बंदी बना लिया था। 
  • लीग ने ब्रिटिश शासन से भारत को आजाद करने के उद्देश्य से भारतीय युद्धबंदियों को लेकर आजाद हिंद फौज बनाई। 
  • जनरल मोहन सिंह ने, जो अंग्रेजों की भारतीय सेना में एक अफसर थे, आजाद हिंद फौज बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। 
  • इस बी1941 ई. में, सुभाष चंद्र बोस भारत से भाग निकलने में सफल हुए। वे भारत की आजादी के लिये काम करने हेतु जर्मनी पहुँगए। 
  • इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का नेतृत्व करने और आजाद हिंद फौज का पुनर्निर्माण करने तथा इसका कार्यक्रम बनाने के लिये सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर पहुँगए। 
  • आजाद हिंद फौज में करीब 45ए000 सैनिक थे। इसमें भारतीय युद्धबंदियों के अलावा वे भारतीय भी थे जो दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न देशों में बसे हुए थे। 
  • 21 अक्टूबर, 1943 ई. को सुभाषचंद्र बोस ने, जो अब नेताजी के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे, सिंगापुर में स्वतंत्र भारत (आजाद हिंद) की अंतरिम सरकार की स्थापना की घोषणा की। 
  • जापान ने अंडमान द्वीपों पर कब्जा कर लिया था। 
  • नेताजी अंडमान गए और वहाँ भारत का झण्डा फहराया। 
  • 1944 ई. के आरम्भ में आजाद हिंद फौज के तीन टुकड़ियों ने अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के उद्देश्य से भारत के पूर्वोत्तर भाग पर हुए हमले में भाग लिया। 
  • आजाद हिंद फौज के एक प्रमुख अफसर शाह नवाब खान के अनुसार, जो सैनिक भारतीय प्रदेश में पहुँगए थे वे ”जमीन पर लेट गए और उन्होंने मातृभूमि की पवित्र मिट्टी को चूमा“। 
  • मगर आजाद हिंद फौज को भारत को आजाद करने में सफलता नहीं मिली। आजाद हिंद फौज, जिसका नारा था ”दिल्ली चलो“ और जिसका अभिवादन था ”जय हिंद“, भारतीयों के लिये देश में और देश के बाहर, प्रेरणा का स्रोत थी। 
  • नेताजी ने दक्षिण-पूर्व एशिया के सभी पंथों तथा धर्मों के भारतीयों को भारत की आजादी के लिए एकमत किया। 
  • भारत की आजादी की गतिविधियों में भारतीय स्त्रियों  ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। 
  • कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन् के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज में महिलाओं की एक रेजिमेंट बनाई गई थी। 
  • बताया जाता है कि जापान के समर्पण कर देने के कुछ दिन बाद एक विमान-दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गई।


गाँधी-जिन्ना वार्ता
 जुलाई 1944 में हिंदू महासभा के कड़े विरोध के बावजूद गाँधीजी ने ‘राजगोपालाचारी सूत्र’ के आधार पर जिन्ना से बातचीत करने का प्रस्ताव किया। 

  • यह सूत्र पिछले अप्रैल में प्रस्तुत किया गया था: युद्ध के लिए एक आयोग बिठाया जाए जो मुसलमानों के पूर्ण बहुमतवाले भारत के पूर्वोत्तर और पश्चिमोत्तर भागों में जुड़े हुए क्षेत्रों का सीमांकन करे, ऐसे क्षेत्रों के सब निवासी इस संबंध में अपना मत दें कि क्या वे अलग पाकिस्तान चाहते हैं , अलग हो जाने की स्थिति में कुछ सेवाओं जैसे कि प्रतिरक्षा और संचार-साधनों को साझा रखने पर सहमति हो और इस योजना को पूरी तरह तभी लागू किया जाए जब अंग्रेज पूर्णरूपेण सत्ता हस्तांतरित कर दें। 
  • लीग ने कांग्रेस की स्वाधीनता की मांग का समर्थन किया था और संक्रमण की अवधि में कांग्रेस के साथ मिलकर अंतरिम सरकार बनाने के लिए वह तैयार थी। 
  • किन्तु 30 जुलाई को जिन्ना ने 6 प्रातों (पंजाब, सिंध, बलुचिस्तान, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत, बंगाल और असम) को अलग कर के पाकिस्तान बनाने की अपनी माँग दुहराई, जिसमें थोड़ा बहुत फेर-बदल किया जा सकता था, और राजाजी के सूत्र की यह कहकर आलोचना की कि इसमे तो ‘केवल छाया और छिलके, कटा हुआ, विकलांग और सड़ा-गला पाकिस्तान’ दिया जा रहा है। उनका यह भी कहना था कि विभाजन को स्वतंत्रता मिलने तक नहीं रोका जा सकता। 
  • उन्होंने साझी सेवाओं को अनावश्यक बताया और उनका वचार था कि जनमत-संग्रह के लिए हिंदुओं और मुसलमानों - दोनों के मत लिए जाने से तो मुसलमानों के एक अलग राष्ट्र होने के मूल विचार पर ही प्रहार होता है जिसमें उनका आत्मनिर्णय का अधिकार निहित है। 
  • परिणामतः सितंबर 1944 में गाँधी-जिन्ना वार्ता टूट गई।
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