बैंकिंग प्रणाली - अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : बैंकिंग प्रणाली - अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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बैंकिंग प्रणाली

¯ यूरोपीय पद्धति पर आधारित बैंकिंग संस्थाओं का उद्भव सर्वप्रथम 1780 के दशक में बंगाल मे हुआ, जहाँ यूरोपीय व्यापारियों ने अपने व्यापार को वित्तीय साधन उपलब्ध कराने हेतु इसकी स्थापना की। 
 ¯ इस तरह का सबसे पहला बैंक हिन्दुस्तान बैंक था। 
 ¯ जनरल बैंक की स्थापना 1786 ई. में हुई। 
 ¯ इन बैंकों के निदेशक कम्पनी के यूरोपीय अधिकारी ही होते थे और उन्हें सरकारी संरक्षण प्राप्त था। 
 ¯ फिर भी 18वीं सदी के अंत तक उन्हें देशी बैंक रों की प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। 
 ¯ इसके बाद देशी बैंक रों को सरकारी व्यवसाय से हाथ धोना पड़ा। 
 ¯ 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही व्यापार और उद्योग को वित्तीय साधन उपलब्ध कराने का काम यूरोपीय बैंकों ने हथिया लिया और देशी बैंक रों को अलाभकारी आंतरिक व्यापार और ग्रामीण सूदखोरी पर निर्भर होना पड़ा।
 ¯ प्रारम्भिक यूरोपीय बैंक भी जल्दी ही अपना अस्तित्व खो बैठे। 
 ¯ 1806 ई. में नए बैंक आॅफ बंगाल का उदय हुआ जो तीन प्रेसिडेन्सी बैंकों में पहला था। 
 ¯ हिन्दुस्तान बैंक भी 1829-32 के संकट को नहीं झेल सका। उसकी जगह यूनियन बैंक ने ले ली। 
 ¯ यूनियन बैंक भी 1848 ई. में लुप्त हो गया। 
 ¯ इसी बीच 1840 ई. में बम्बई में दूसरे प्रेसिडेन्सी बैंक - बैंक आॅफ बम्बई - की शुरुआत हुई।
 ¯ तीसरे प्रेसिडेन्सी बैंक की शुरुआत मद्रास में 1843ई. में हुई। 
 ¯ प्रारम्भ से ही ये प्रेसिडेन्सी बैंक सरकारी खजाने के कार्यों से सम्बद्ध रहे।
 ¯ बैंकिंग क्षेत्र में संयुक्त-पूँजी व सीमित देयता पर आधारित पहला भारतीय प्रयास था 1881 ई. में अवध कमर्शियल बैंक की स्थापना। 
 ¯ लेकिन संयुक्त-पूँजी पर आधारित आधुनिक भारतीय बैंक की वास्तविक शुरुआत 1894 ई. में पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना और 1901 ई. में पीपुल्स बैंक की स्थापना से ही माना जा सकता है। ये दोनों बैंक लाला हरकिशन लाल गौवा द्वारा स्थापित किए गए थे। 
 ¯ 1931 ई. के संकट के दौरान पीपुल्स बैंक असफल हो गया। 
 ¯ 1935 ई. में भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना हुई और इसके साथ ही बैंकिंग के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई।

नई भूमि-व्यवस्था
 ¯ ब्रिटिश क्षेत्रों के विस्तार के साथ-साथ राजस्व वसूली की राशि भी बढ़ती गई। 
 ¯ भू-राजस्व कम्पनी की आय का सबसे बड़ा स्रोत हो गया। 
 ¯ इस आय का एक बड़ा हिस्सा कम्पनी ब्रिटिश सरकार को भेंट करती थी। 
 ¯ 1767 ई. से कम्पनी को हर साल 4,00,000 पौंड ब्रिटिश सरकार के खजाने में जमा करने पड़ते थे। 
 ¯ कम्पनी राजस्व का एक भाग भारत से व्यापारिक वस्तुएँ खरीदने में खर्च करती थी। वे वस्तुएँ इंग्लैंड तथा अन्य देशों को निर्यात की जाती थी और वह धन इंग्लैंड चला जाता था।
 ¯ वारेन हेस्टिंग्स के समय में कम्पनी ने बंगाल और बिहार में राजस्व-वसूली के अधिकार की नीलामी शुरू की थी। जो व्यक्ति सबसे ऊँची बोली लगाता, उसे एक निश्चित क्षेत्र से राजस्व वसूल करने के अधिकार दे दिए जाते। 
 ¯ यह व्यवस्था किसी के लिए भी लाभप्रद सिद्ध नहीं हुई। 

कारखाना अधिनियम
 अधिनियम    वायसराय

 1881 का कारखाना अधिनियम    लार्ड रिपन
 1891 का कारखाना अधिनियम    लार्ड लैन्सडाउन
 1911 का कारखाना अधिनियम    लार्ड हार्डिंग द्वितीय
 1922 का कारखाना अधिनियम    लार्ड रीडिंग
 1934 का कारखाना अधिनियम    लार्ड विलिंगटन
 1946 का संशोधित

कम्पनी को जितनी वसूली की उम्मीद रहती थी उतनी नहीं मिलती थी। दूसरी तरफ, जमींदार किसानों को लूटते जा रहे थे। 
 स्थायी बंदोबस्त - नीलामी की व्यवस्था से कम्पनी की आय में सुस्थिरता नहीं आई, इसलिए कम्पनी ने बंगाल और बिहार में भू-राजस्व स्थायी तौर पर निश्चित करने का निर्णय लिया। 
 ¯ 1793 ई. में कार्नवालिस ने यह नई व्यवस्था लागू कर दी, जिसे स्थायी बंदोबस्त का नाम दिया गया। 
 ¯ उड़ीसा, आंध्र प्रदेश के तटीय जिलों और बनारस (वाराणसी) में भी स्थायी बन्दोबस्त लागू किया गया। 
 ¯ इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदार जागीर का मालिक भी बन गया। उसे हर साल एक निश्चित कालावधि में राजस्व की एक निश्चित राशि सरकार को देनी पड़ती थी। 
 ¯ स्थायी बंदोबस्त से कम्पनी को नियमित आय होने लगी। इस व्यवस्था ने जमीदारों के एक नए वर्ग को जन्म दिया, जो अंग्रेजों के प्रति वफादार थे।
 ¯ जागीर के मालिक बन जाने के बाद अनेक जमींदार अधिकतर शहरों में ही रहने लगे। वे किसानों से लगान के रूप में अधिक से अधिक पैसा ऐंठने लगे। 
 ¯ 1799 ई. में उन्हें अधिकार दिया गया कि वे लगान न देने वाले किसानों को जमीन से बेदखल कर सकते हैं और उनकी सम्पत्ति जब्त कर सकते हैं। 
 ¯ फसल न होने पर किसान लगान नहीं दे पाते थे और काफी बड़ी संख्या में किसानों को बेदखल कर दिया जाता था। इस प्रकार भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की संख्या बढ़ती गई। 
 ¯ आगे चलकर स्थायी बंदोबस्त से सरकार की अपेक्षा जमींदारों को अधिक फायदा हुआ। खेती के लिए नई भूमि प्राप्त की गई, तो जमींदारों ने लगान भी बढ़ा दिया। मगर उन्हें सरकार को जो रकम देनी पड़ती थी, वह पूर्ववत् कायम रही।
 रैयतवारी व्यवस्था - मद्रास प्रेसिडंेसी में एक नई व्यवस्था लागू की गई जिसे रैयतवारी व्यवस्था कहते हैं। 
 ¯ पश्चिम भारत में कुछ समय तक मराठाü द्वारा स्थापित भूमि-व्यवस्था को ही चलने दिया गया, मगर धीरे-धीरे इसमें रैयतवारी व्यवस्था के अनुसार परिवर्तन किए गए।
 ¯ सीधे बंदोबस्त की इस व्यवस्था में सरकार ने जमीन रैयत यानी किसानों को दे दी। 
 ¯ जमीन के उपजाऊपन और फसल की किस्म के आधार पर राजस्व 30 साल तक की अवधि के लिए निश्चित कर दिया जाता था। 
 ¯ पैदावार की कुल कीमत का लगभग आधा हिस्सा सरकार को मिलता था। 
 ¯ इस व्यवस्था के अंतर्गत किसान की स्थिति अधिक सुरक्षित हो गई, मगर राजस्व-वसूली बड़ी सख्ती से होने के कारण वह अक्सर महाजन के चंगुल में फंस जाता था। 
 ¯ इस व्यवस्था ने सरकार को ही सबसे बड़ा जमींदार बना दिया और किसानों को सरकारी अफसरों की दया पर छोड़ दिया गया।
 महालवारी व्यवस्था - उत्तर भारत में भूमि-बंदोबस्त स्थानीय प्रथाओं के अनुसार हुआ। 
 ¯ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गांव-बिरादरियों या महालों के साथ भूमि-बंदोबस्त किया गया। 
 ¯ जमीन पर गांव-बिरादरियों के सामूहिक स्वामित्व को ‘भाईचारा’ कहा जाता था। गांवों के समूह ‘महाल’ कहलाते थे इसलिए इसे महालवारी व्यवस्था कहा गया। 
 ¯ पंजाब और दिल्ली में भी यही भूमि-व्यवस्था लागू की गई।

 

स्मरणीय तथ्य
 ¯    दादनी प्रथा - इस प्रथा के अन्तर्गत ब्रिटिश व्यापारी भारतीय उत्पादकों, कारीगरों एवं शिल्पियों को अग्रिम संविदा (पेशगी) के रूप में रुपया दे देते थे।
 ¯    कमियौटी प्रथा - बिहार एवं उड़ीसा में प्रचलित इस प्रथा के अन्तर्गत कृषि दास के रूप में खेती करने वाले कमियाँ जाति के लोग अपने मालिकों द्वारा प्राप्त ऋण पर दी जाने वाली ब्याज की राशि के बदले में जीवन भर उनकी सेवा करते थे।
 ¯    तीन कठिया प्रथा - इस प्रथा के अन्तर्गत चम्पारण (बिहार) के किसानों को अपने अंग्रेज बागान मालिकों के अनुबन्ध पर अपनी जमीन के करीब 3/20 भाग पर नील की खेती करना आवश्यक होता था।
 ¯    दुबला हाली प्रथा - भारत के पश्चिमी क्षेत्र, मुख्यतः सूरत में प्रचलित इस प्रथा के अन्तर्गत दुबला हाली भूदास अपने मालिकों को ही अपनी सम्पत्ति का और स्वयं का संरक्षक मानते थे।

¯ अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए भूमि कानूनों ने भारतीय समाज में कई नई स्थितियाँ पैदा कर दी। 
 ¯ जमीन खरीद-बिक्री की चीज हो गई। 
 ¯ निश्चित समय के अन्दर सरकार को राजस्व अदा करने के कानून के कारण कई छोटे भू-स्वामी अपनी सम्पत्ति को गिरवी रखने या उससे हाथ धोने पर मजबूर हुए। 
 ¯ प्रमुख रूप से इन्हीं नई भूमि-व्यवस्थाओं के कारण गांवों में जमीन का वितरण असमान हुआ और गरीबी बढ़ी।
 ¯ परन्तु इन नई भूमि-व्यवस्थाओं ने भारतीय कृषि-उत्पादन को बाजार के साथ जोड़कर इसे अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा भी दिया। 
 ¯ खाद्यान्न और नकदी फसलें तथा बागान की वस्तुएँ देशी तथा विदेशी बाजारों के लिए बिक्री की महत्त्वपूर्ण चीजें बन गई। 
 ¯ उदाहरण के लिए ब्रिटिश व्यापारी अफीम को बड़े पैमाने पर चोरी-छिपे चीन में ले जाने लगे, इसलिए भारत में अफीम की पैदावारी बढ़ाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया गया। 
 ¯ दक्कन की काली मिट्टी में कपास की खेती को बहुत ज्यादा बढ़ावा मिला, क्योंकि बाहर के देशों में कपास की मांग बढ़ गई थी। 
 ¯ भारतीय जूट, चाय और कहवा के निर्यात से अधिकाधिक मुनाफा मिलने लगा। 
 ¯ मगर इस व्यापार से ज्यादातर लाभ अंग्रेजों के व्यापारी संस्थानों और उनके गुमास्तों ने ही उठाया।
 ¯ कृषि पर अधिकाधिक निर्भरता, अत्यधिक भू-राजस्व की मांग, नव-जमींदारों का उत्थान व कर-वसूली में अत्याचार, कृषकों की ऋणग्रस्तता, प्रति एकड़ उपज में कमी आदि कारणों से कृषि उत्पादन में स्थिरता-सी आ गई। 
 ¯ इस प्रकार एक ओर जहां सारे विश्व में कृषि को आधुनिक बनाया जा रहा था एवं तकनीकी रूप से उत्पादन में गुणात्मक वृद्धि हो रही थी, भारतीय कृषि दुःखद ढंग से पिछड़ रही थी।
 ¯ वर्तमान सदी के आरम्भ से कृषि के विकास के लिए सरकार ने कुछ रचनात्मक नीतियाँ अपनाई। 
 ¯ कृषि के बारे में जानकारी एकत्र करने के लिए कृषि-विभाग स्थापित किए गए। 
 ¯ कृषि के बारे में उच्च शिक्षा देने के लिए तथा अनुसंधान कार्य और प्रायोगिक कृषि के लिए बिहार में ‘इंपीरियल इंस्टीट्यूट आॅफ एग्रिकल्चर’ की स्थापना की गई। 
 ¯ इस तरह कृषि के विकास के लिए कुछ कदम उठाए गए। मगर जमींदार भूमि में कोई सुधार किए बगैर ही किसानों से ज्यादा लगान वसूल करते रहे, इसलिए आधुनिक और उन्नत कृषिकर्म की दिशा में अधिक प्रगति नहीं हुई।

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