भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 और भारत सरकार अधिनियम, 1935 - विविध तथ्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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UPSC : भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 और भारत सरकार अधिनियम, 1935 - विविध तथ्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 और भारत सरकार अधिनियम, 1935

 

भारतीय परिषद् अधिनियम, 1861

  • वायसराय की कार्यकारिणी में एक पाँचवां सदस्य सम्मिलित कर लिया गया जो कि विधि वृत्ति का व्यक्ति था।
  • वायसराय को परिषद् के नियम बनाने की अनुमति विभागीय प्रणाली का आरम्भ यानि मंत्रिमण्डलीय व्यवस्था की नींव रखी गई।
  • कानून बनाने के लिए वायसराय की कार्यकारी परिषद् में न्यूनतम 6 और अधिकतम 12 अतिरिक्त सदस्यों की नियुक्ति से उसका विस्तार किया गया। सदस्यों की नियुक्ति वायसराय करेगा एवं वे दो वर्ष तक अपने पद पर बने रहेंगे। आधे सदस्य गैर सरकारी होंगे। गैर सरकारी सदस्य ”ऊंचे श्रेणी“ के भारतीय थे।
  • इस अधिनियम के अनुसार बम्बई तथा मद्रास प्रांतों को अपने लिए कानून बनाने तथा उनमें संशोधन करने का अधिकार पुन: दे दिया गया।
  • गवर्नर-जनरल को संकटकालीन अवस्था में विधान परिषद् की अनुमति के बिना ही अध्यादेश जारी करने की अनुमति दे दी। ये अध्यादेश अधिकाधिक 6 मास तक लागू रह सकते थे।
  • इस अधिनियम के द्वारा भारतीयों को विधान परिषदों में प्रतिनिधित्व मिला। भारतीय विधान मंडल की नींव रखी गई। तीनों प्रेजिडेन्सियां एक समान पद्धति में आ गई। विकेन्द्रीकरण की नींव पड़ी जिसके फलस्वरूप 1935 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा प्रांतीय स्वशासन दे दिया गया।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1892

  • इस अधिनियम में केवल भारतीय विधान परिषदों की शक्तियाँ, कार्य तथा रचना की ही बात कही गई थी। अतिरिक्त सदस्यों की संख्या कम से कम 10 हो तथा अधिक से अधिक 16 हो। इस अधिनियम में यह भी सुझाव था कि इस परिषद् में कम से कम 40: लोग अशासनिक होने चाहिए।
  • सदस्यों के चुनाव के लिए एक अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अपनायी गई।
  • सदस्यों को सार्वजनिक हितों के मामलों में 6 दिन की सूचना देकर प्रश्न पूछने का भी अधिकार दिया गया।
  • प्रांतीय विधान परिषदों के अराजकीय सदस्यों को केन्द्रीय विधान परिषद् के लिए एक-एक सदस्य चुनने की अनुमति दी गई।
  • विधान परिषदों की शक्तियाँ बढ़ा दी गयीं। अब वह वार्षिक बजट पर बहस कर सकती थीं और इसके सदस्य कोई जनसाधारण से संबंधित प्रश्न पूछ सकते थे।
  • प्रांतीय विधान परिषदों में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 8 से 20 कर दी गई।

भारतीय परिषद ऐक्ट, 1909
 (मिंटो-मार्ले सुधार)

  • केन्द्रीय तथा प्रांतीय विधान मंडलों का आकार तथा शक्तियां बढ़ाई गईं।

केन्द्रीय विधान मंडल: अतिरिक्त सदस्यों की अधिकतम संख्या 60 कर दी गई। अब विधान मंडल में 69 सदस्य थे जिनमें 37 शासकीय तथा 32 अशासकीय वर्ग के थे। शासकीय वर्ग में केवल 9 पदेन सदस्य थे अर्थात् गवर्नर-जनरल तथा उसके 7 कार्यकारी पार्षद और एक असाधारण सदस्य। बाकि के 28 सदस्य गवर्नर-जनरल द्वारा मनोनीत किए जाते थे। 32 अशासकीय सदस्यांे में से 5 गवर्नर-जनरल द्वारा मनोनीत किए जाते थे और शेष 27 निर्वाचित किए जाते थे। 27 में से 13 तो साधारण निर्वाचक मंडल, 12 वर्ग निर्वाचक मंडल तथा 2 विशेष निर्वाचक मंडल द्वारा निर्वाचित होते थे। वर्ग निर्वाचक मंडल के 12 सदस्यों में 6 मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्र से एवं 6 भूपतियों के निर्वाचन क्षेत्र को दिए गए।
प्रांतीय विधान मंडल: प्रांतों में अशासकीय सदस्यों का बहुमत था। भिन्न-भिन्न प्रांतों की विधान परिषदों की बढ़ी हुई संख्या इस प्रकार थी -
 (i) बर्मा16
 (ii)पूर्वी बंगाल तथा असम41
 (iii)बंगाल52
 (iv)बम्बई47
 (v) संयुक्त प्रांत47
 (vi)पंजाब25

  • चुनाव के लिए प्रत्याशियों तथा मतदाताओं की योग्यताएं निश्चित करने के लिए अधिनियम बनाए गए। 
  • स्त्रियां तथा वे सभी लोग जो 25 वर्ष की आयु से कम थे, वोट नहीं दे सकते थे। 
  • च इस अधिनियम का सबसे घिनौना अंग था साम्प्रदायिक मत प्रणाली। 
  • सदस्य प्रश्न तथा अनुपूरक प्रश्न पूछ सकते थे। 
  • माॅर्ले ने इस अधिनियम को ‘स्वप्न’ की संज्ञा दी।

भारत सरकार अधिनियम, 1919
 (माॅन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार)

  • अब भारत सचिव का वेतन ब्रिटिश कोश से दिया जाना था।
  • भारत परिषद में सदस्यों की संख्या 8 और 12 के बीच तय की गई। वित्तीय मामलों और भारतीय जनपद सेवा के मामलों को छोड़कर भारत सचिव का भारत परिषद से परामर्श करना आवश्यक नहीं था।
  • इस अधिनियम से भारत में सरकार के कार्य प्रणाली में काफी परिवर्तन हुआ -

(i) विषयों को अब केन्द्रीय सूची तथा प्रांतीय सूची में बांटा गया।
 (ii) केन्द्र में उत्तरदायी सरकार का कोई तत्व नहीं।
 (iii) वायसराय की 8 सदस्यों की कार्यकारी परिषद में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 3 कर दी गई।
 (iv) गवर्नर-जनरल की शक्तियां बढ़ीं।
 (v) गवर्नर-जनरल का वेतन बढ़ाकर 2,56,000 रुपये प्रति वर्ष कर दिया गया।
केन्द्रीय विधान मंडल: केन्द्रीय स्तर पर द्विसदनात्मक व्यवस्था लागू की गई। राज्य सभा (उच्च सदन) में सदस्यों की संख्या 60 थी और विधायिका सभा (निम्न सदन) में सदस्यों की संख्या 145 थी। राज्य सभा में 26 मनोनीत और 34 निर्वाचित सदस्यों की व्यवस्था थी। निर्वाचित होने वाले 37 सदस्यों में 20 हिन्दू, 10 मुस्लिम, 3 यूरोपीय और 1 सिक्ख समुदाय के सदस्य थे। विधायिका सभा के 145 सदस्यों में 41 मनोनीत और 104 निर्वाचित थे। निर्वाचित पदों में 52 हिन्दू, 30 मुस्लिम, 2 सिक्ख, 7 भूपति, 9 यूरोपीय और 4 व्यापार क्षेत्र से होते थे। राज्य सभा की कार्य अवधि 5 वर्ष थी, जबकि विधायिका सभा की कार्य अवधि 3 वर्ष थी। हालांकि केन्द्रीय विधान मंडल की शक्तियां बढ़ाई गई, परंतु अभी भी बजट के 75: भाग पर मत प्रकट नहीं किया जा सकता था।
प्रांतीय सरकार: द्वैध शासन प्रणाली का आरम्भ अर्थात् कार्यकारी परिषद और लोकप्रिय मंत्रियों की व्यवस्था। इन दोनों भागों का प्रधान गवर्नर ही होता था। प्रांतीय विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया -
 (i) आरक्षित विषय: वित्त, भूमिकर, न्याय, पुलिस, कानून और व्यवस्था, सिंचाई, समाचार पत्र इत्यादि।
 (ii) हस्तांतरित विषयें: स्थानीय स्वशासन, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, सरकारी समितियां, निर्माण, धार्मिक मामले।

  • यह द्वैध शासन 1921 से 1937 तक चलता रहा। 
  • बंगाल में द्वैध शासन 1927 तक चलता रहा और मध्य प्रांत में 1924-26 तक चलता रहा। 
  • स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ। 
  • प्रांतीय बजट केन्द्रीय बजट से अलग कर दिया गया। 
  • ‘मेस्टन एवार्ड’ के अनुसार प्रान्तीय सरकारें केन्द्रीय सरकार को एक निश्चित धनराशि प्रतिवर्ष देती।

भारत सरकार अधिनियम, 1935

  • राष्ट्रवादी आंदोलन को कमजोर बनाने एवं कांग्रेस में फूट डालने के उद्देश्य से ब्रिटिश लोगों ने संवैधानिक सुधारों का जाल फेंककर कांग्रेस के एक हिस्से को औपनिवेशिक प्रशासन के समर्थन में करना चाहा थी। अपनी इन्हीं नीतियों को प्रारूप देने के उद्देश्य से ब्रिटिश संसद ने अगस्त 1935 में भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित किया।
  • इसमें विभिन्न प्रांतों तथा राजाओं और महाराजाओं की रियासतों को मिलाकर भारत को एक संघ का दर्जा दिया गया। संघीय विधायिका के लिए रियासतों के प्रतिनिधियों की नियुक्ति का अधिकार राजाओं को दिया गया। इन प्रतिनिधियों की नियुक्ति का मूल उद्देश्य राष्ट्रवादियों पर नियंत्रण स्थापित करना तथा उनके किसी भी प्रयास को विफल करना था। वयस्क व्यक्तियों की संख्या का छठा हिस्सा ही मतदान का अधिकारी था। प्रतिरक्षा और विदेश विभाग संघीय विधायिका के अधिकार के बाहर थे। इसके अलावा बाकी मामलों में भी वायसराय को हस्तक्षेप करने व नियंत्रण स्थापित करने का विशेषाधिकार प्राप्त था।
  • प्रांतों के प्रशासन का तरीका भी बदल गया। अब प्रांतों का संचालन प्रांतीय स्वायत्तता के सिद्धांत पर होना था। कहने को ही प्रांतीय शासन की बागडोर मंत्रियों के हाथ में थी, परंतु वास्तविक शक्ति गवर्नरों के हाथ में थी। अधिनियम 1935 की संयुक्त संसदीय कमेटी के अध्यक्ष लिनलिथगो थे जो 1936 से भारत के वायसराय बने।

संघीय विधान मंडल: यह द्विसदनात्मक होना था जिसमें राज्य सभा के 260 सदस्यों में से 156 सदस्य भारतीय अंग्रेजी प्रांत से और 104 सदस्य भारतीय रियासतों के शासकों द्वारा मनोनीत होने थे। ब्रिटिश प्रांतों के 156 सदस्यों में से 150 निर्वाचित होते और 6 मनोनीत। दूसरे सदन यानि संघीय सभा में सदस्यों की संख्या 375 होनी थी जिसमें से 250 सदस्य भारतीय ब्रिटिश प्रांतों से निर्वाचित होते और शेष 125 सदस्य भारतीय रियासतों के राजाओं द्वारा मनोनीत।

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