भारत के खनिज संसाधन - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

भूगोल (Geography) for UPSC Prelims in Hindi

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UPSC : भारत के खनिज संसाधन - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

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भारत के खनिज संसाधन
I खनन

  • हमारे देश की अर्थव्यवस्था में खनिज उत्खनन का विशेष महत्व है। यहां कुल 7.5,00,000 हेक्टेयर भूमि पर खनन प्रक्रिया होती है। यह खनन क्षेत्रा 19 राज्यों में है जिसमें राजस्थान में 1,41,280 हेक्टेयर, बिहार एवं झारखण्ड में 13,67,595 हेक्टेयर, व उड़ीसा में 1,04,334 हेक्टेयर क्षेत्रा है। इन खनन उद्योगों से देश को 10,049 करोड़ रुपए का वार्षिक लाभ होता है पर इनके कारण पर्यावरण पर कितना प्रभाव पड़ता है, इसे आंकड़ों में दर्शाना मुश्किल है। पर्यावरण असंतुलन के संदर्भ में इनसे होने वाली कई समस्याएं हैं। जैसे - अवैज्ञानिक खनन प्रक्रिया से लगातार जंगलों का विनाश हो रहा है। लगातार वनों के कटान से वानस्पतिक क्षेत्रों पर दुष्प्रभाव पड़ता है जिसके कारण भूमि कटाव, जलवायु परिवर्तन और तापक्रम प्रभावित होता है। इसलिए वन कटान, पारिस्थितिकी असंतुलन का सबसे प्रमुख कारण है। हमारे देश में प्रति वर्ष 235 लाख घन मीटर जलाऊ लकड़ी की मांग है जबकि जंगलों से अधिकृत उत्पादन केवल 40 लाख घनमीटर है। शेष मांग वनों से अवैध रूप से लकड़ी एकत्रा कर के पूरी की जाती है। देश में लगभग सात करोड़ पशु वनों पर आश्रित हैं।
  • खनन प्रक्रिया के कारण जो वानस्पतिक ह्रास होता है वह ऊपरी मृदा कटान का सबसे महत्वपूर्ण कारण है। इसी प्रक्रिया से भूमि कटाव होता है। भूमि कटाव प्रक्रिया पहाड़ों की ढाल, भूमि के स्थायित्व को विशेष रूप से प्रभावित करती है। दून घाटी में इस साल जंगलों के सर्वेक्षण के दौरान ज्ञात हुआ है कि वनों का विनाश पर्यावरण व पारिस्थितिकी के लिए निरंतर खतरा बन रहा है, क्योंकि इसके कारण भूमि से मिट्टी-क्षति 8-1 टन/हेक्टेयर/प्रतिवर्ष केवल गली कटाव के कारण होती है। एक अनुमान के अनुसार प्रति वर्ष भारत में करीब 6,000 टन ऊपरी मिट्टी का क्षय होता है। प्राकृतिक वन संपदा के ह्रास के कारण प्रति वर्ष लगभग 1,000 करोड़ कीमत की उपजाऊ मिट्टी का कटाव हो जाता है।
  • पर्यावरण विभाग द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार दून घाटी में खदानों का सबसे बुरा असर यहां के जल संसाधनों तथा मसूरी के प्राकृतिक वातावरण पर हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार खदान के मलबे को नीचे बह रही नदी और नहरों में गिरने दिया जाता है। उससे पीने तथा सिंचाई का पानी बेहद प्रदूषित हो रहा है। पिछले दो दशकों में बालदी नदी के जल ग्रहण क्षेत्रों के पास खेतों की पैदावार 28 प्रतिशत तक गिरी है और इसी क्षेत्रा के 18 गांवों के जल संसाधनों में 50 फीसदी की कमी आई है। खनन प्रक्रिया दो तरीके से वायु को भी प्रदूषित करती है। खनन प्रक्रिया द्वारा अयस्क निकाला जाता है तब विस्फोट के कारण धूल के कण उत्पन्न होते हैं। दूसरा जब अयस्क को विभिन्न प्रक्रियाओं और चरणों से गुजारा जाता है। तब फिर धूल के और बहुत सी गैसों के कारण वायुमंडल प्रदूषित होता है।
  • खदानों में काम करने वाले मजदूरों से चर्चा के दौरान पता चला कि अधिकतर व्यक्ति सांस और आंख की बीमारियों से पीड़ित हैं। इसके अतिरिक्त खदानों के आसपास जो लोग रहते हंै और उनमें भी जिन लोगों का शरीर अन्य रोगों से पहले ही ग्रस्त है उनके लिए यह धूल काफी खतरनाक होती है।
  • खनिज पदार्थों की दोहन प्रक्रिया से प्रभावित क्षेत्रा को खनन के बाद फिर उपयोगी बनाना सबसे चुनौतीपूर्ण है। इस क्षेत्रा में सबसे पहला कदम है ऐसे वैज्ञानिक उपायों का संयोजन जिससे उन क्षेत्रों की मिट्टी में पोषक तत्व उत्पन्न हो सकें और वे वनस्पति को उगाने में समर्थ हों। वैज्ञानिक कार्यक्रमों के अंतर्गत कुछ ऐसे ही आधारों का समावेश किया गया है।
  •  एक सफल वैज्ञानिक कार्यक्रम में अधिकतर खनन भूमि संवर्धन प्रक्रिया में क्षेत्रा को संरक्षित करने के लिए पेड़ लगाने पर बल दिया जाता है। परंतु मसूरी-दून घाटी के वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि संवर्धन के प्रथम चरण में कुछ प्रजातियों की घास और शाक पर ही जोर दिया जाना चाहिए क्यांेकि एक ओर यह कम समय में ही उग जाती है वहीं दूसरी ओर इससे उत्पन्न होने वाले कार्बाइड तत्त्व भूमि की उर्वरकता को बढ़ाते हैं।

III भारत में खनिज का वर्गीकरण एवं वितरण
खनिजों का वर्गीकरण खनिज कई प्रकार के है-
1. धात्विक खनिज, जिसके अन्तर्गत - लौह धातु, पारा आदि आते है,
2. अधात्विक खनिज: अभ्रक, एस्बेस्टस, पायराइट, नमक, जिप्सम, हीरा आदि इसके अन्तर्गत सम्मिलित किये जाते है तथा
3. अणु शक्ति वाले खनिज के अन्तर्गत- यूरेनियम, थोरियम, बेरिलियम, सुरमा, जिंक्स, ग्रेफाइट आदि आते है।

भारत के प्रमुख खनिज संसाधनों का वितरण

  • माइका-  भारत माइका के उत्पादन तथा निर्यात में विश्व का प्रथम देश है। इसका प्रयोग विद्युत तथा औषधि उद्योगों में किया जाता है। इसका मुख्य जमाव हजारीबाग और गया (बिहार), नेल्लौर जनपद (आन्ध्र प्रदेश) तथा राजस्थान में पाया जाता है। भारत के 50ः माइका का उत्पादन कोडरमा खान (झारखण्ड) से किया जाता है।
  • इल्मेनाइट-  इसका प्रयोग लौह- इस्पात उद्योग में किया जाता है। इसके उत्पादन में विश्व में भारत का प्रथम स्थान है। यह पूर्वी तथा पश्चिमी तटों से प्राप्त किया जाता है। केरल, उड़ीसा, तमिलनाडु आदि प्रमुख उत्पादक राज्य है।
  • शैल फास्फेट-  इनका जमाव तलछटों में होता है। इसका निक्षेप सागरीय वातावरण में पाया जाता है जिसकी उत्पत्ति फास्फेट युक्त आग्नेय शैलों के अपरदन से होती है। उदयपुर, जैसलमेर (राजस्थान), मसूरी (उ. प्र.) आदि में इसका जमाव पाया जाता है।
  • जिप्सम-  इसका प्रयोग कागज, कपड़ा, सीमेन्ट आदि उद्योगों में किया जाता है। भारत की 94ः संचित राशि राजस्थान (बीकानेर तथा जोधपुर), जम्मू व कश्मीर, गुजरात, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश में है।
  • नमक-  नमक में 31.32ः क्लोराइड तथा 60.68ः सोडियम की मात्रा होती है। नमक उत्पादन का 70ः भाग भारत में प्रयोग किया जाता है। भारत में नमक उत्पादन के तीन स्त्रोत है: 1. दक्षिणी पठारी भाग के तटवर्ती क्षेत्रों में समुद्री जल द्वारा, 2. राजस्थान के मरुस्थलीय भागों की खारी झीलों द्वारा, तथा 3. नमक की चट्टान (गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश) द्वारा। सागरीय क्षेत्रा जो गुजरात तथा महाराष्ट्र से संलग्न है, उनसे भारत में सर्वाधिक नमक उत्पन्न किया जाता है।
  • स्टिएराइट-  यह अल्प सिलिक आग्नेय शैलों में डोलोमाइट के साथ प्राप्त किया जाता है। भारत इसके उत्पादन में विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसका जमाव आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि में पाया जाता है।
  • हीरा-  अनन्तपुर, गुंटूर, कडप्पा, कुर्नूल, गोदावरी (आन्ध्र प्रदेश), बल्लारि (कर्नाटक), सतना, पन्ना तथा छतरपुर (मध्य प्रदेश), चन्दा (महाराष्ट्र), सम्बलपुर (उड़ीसा), बांदा तथा मिर्जापुर (उ. प्र.) आदि में हीरा पाया जाता है। पन्ना (म. प्र.) हीरा उत्पादन का प्रमुख केन्द्र है।
  • आणविक खनिज-  यूरेनियम, थोरियम तथा बेरीलियम महत्वपूर्ण आणविक खनिज है। यूरेनियम झारखण्ड(जादूगोडा खान), हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश (बस्तर) आदि में पाया जाता है। थोरियम केरल तथा तमिलनाडु के तटवर्ती भागों में पाया जाता है। बेरिलियम राजस्थान, तमिलनाडु, बिहार, कश्मीर, आन्ध्र प्रदेश में पाया जाता है।
  • ताँबा-  ताँबे का उत्पादन भारत में पर्याप्त मात्रा में नहीं होता है, जिस कारण हम विदेशों से आयातित ताँबे पर निर्भर हैं। ताँबे का निक्षेप दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार में पाया जाता है। इसका निक्षेप प्राचीन तथा नवीन दोनों प्रकार की चट्टानों तथा कुडप्पा, विजयवाड़ा तथा अरावली सिरीज की चट्टानों में पाया जाता है। अग्निगुन्दाला तथा कुर्नूल (आन्ध्र प्रदेश), चित्रादुर्ग, कोलायादी, थिनथिनी (कर्नाटक), सिंहभूम, राखा तथा मोसाबनी(झारखण्ड) दार्जिलिंग (प. बंगाल), मलजरखण्ड (मध्य प्रदेश), दारिबा, खेत्राी (राजस्थान) आदि प्रमुख तांबा उत्पादक क्षेत्रा हैं। गुजरात, उड़ीसा, राजस्थान में अल्प मात्रा में ताँबे की संचित राशि है।
  • बाक्साइट- लावा का पठार बाक्साइट का प्रमुख उत्पादन क्षेत्रा है। इसका जमाव लेटराइट निक्षेपों में कटनी (मध्य प्रदेश) तथा गुजरात व गोवा के तटीय क्षेत्रों में पाया जाता है। बाक्साइट का मुख्य भंडार- महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, झारखण्ड,गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि में पाया जाता है।
  • सीसा तथा जस्ता- सीसा का मुख्य अयस्क गैलिना, सेरुसाइट तथा ऐंगलेसाइट एवं जस्ता का अयस्क स्फैलेराइट, हेमीमार्फाइट तथा स्मिथसोनाइट आदि है। जावर (उदयपुर) राजस्थान का महत्वपूर्ण निक्षेप है। यह भारत का सर्वाधिक सीसा तथा जस्ता का उत्पादन करता है। अग्निगुन्दाला (आन्ध्र प्रदेश) तथा संबलपुर, कालाहांडी (उड़ीसा) में सीसा का उत्पादन वृहत् स्तर पर किया जाता है।
  • चाँदी- चाँदी से आभूषण तथा तार तैयार किया जाता है। विगत वर्षों में चाँदी की औद्योगिक खपत अधिक हुई है। जावर खान चाँदी उत्पादन का सबसे प्रमुख क्षेत्रा है। कुडप्पा, गुन्टूर तथा कुर्नूल (आन्ध्र प्रदेश), भागलपुर, (बिहार),संथाल परगना, सिंहभूम (झारखण्ड) बड़ौदा (गुजरात), बारामूला (जम्मू व कश्मीर), बेलारी (कर्नाटक), अल्मोड़ा (उत्तर प्रदेश) आदि में चाँदी का उत्पादन किया जाता है।
  • निकिल- इसका सर्वाधिक उत्पादन कटक तथा मयूरभंज जनपद (उड़ीसा) में किया जाता है।
  • चूने का पत्थर- इसका प्रयोग लौह- इस्पात, सीमेंट, रासायन आदि उद्योगों में किया जाता है। यह चम्पारन, रोहतास, पलामू, हजारीबाग (बिहार), देहरादून, गढ़वाल, अल्मोड़ा, मिर्जापुर (उ. प्र.), पुरलिया (प. बंगाल), सुन्दर गढ़, कोरापुट तथा सम्बलपुर (उड़ीसा), हैदराबाद, नालगा डा, गुन्टूर, कुर्नूल तथा कड़प्पा (आन्ध्र प्रदेश), नागपुर तथा भण्डरा (महाराष्ट्र) आदि में पाया जाता है। मुख्य जमाव विन्ध्याचल, अरावली तथा जैन्तिया की पहाड़ियों में पाया जाता है। मध्य प्रदेश देश का 36ः उत्पादन करता है। भारत में डोलोमाइट की संचित राशि लगभग 40.31 करोड़ टन है।
  • लौह- अयस्क- लौह- अयस्क की दृष्टि से भारत विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ विश्व की संचित राशि का 20ः लौह अयस्क विद्यमान है। लौह- अयस्क का जमाव भारत के प्रत्येक राज्य में पाया जाता है, परन्तु 96ः सिंहभूम(झारखण्ड) , क्योंझर, तलचीर तथा मयूरभंज (उड़ीसा), मध्य प्रदेश, कर्नाटक तथा गोवा में विद्यमान है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र तथा आन्ध्र प्रदेश में देश की सम्पूर्ण संचित राशि का 3ः पाया जाता है।
  • सोना- सोने का सर्वाधिक उत्पादन कोलार की खान (कर्नाटक) से किया जाता है, जिसके संपूर्ण उत्पादन को रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया को बेच दिया जाता है। दूसरा उत्पादन क्षेत्रा हूूट्टी खान (कर्नाटक के रायचूर जनपद में) है जो अपने उत्पादन का समस्त भाग ‘स्टेट बैंक आॅफ इण्डिया’ को उद्योगों के लिए देता है। धारवाड़ सिस्ट्स की चट्टानों में सोने की विपुल संचित राशि विद्यमान है। कर्नाटक का सोने का उत्पादन में प्रथम स्थान है। इसके अलावा आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल तथा बिहार में भी इसका उत्पादन किया जाता है।
  • मैंगनीज- मैंगनीज उत्पादन में भारत विश्व का 5वां बड़ा देश है। मैंगनीज लौहा- इस्पात उद्योग में कच्चे माल के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसका जमाव सभी प्रकार की भूगर्भिक संरचना में पाया जाता है, परन्तु भारत का 90ः जमाव दक्षिणी पठारी भाग के धारवाड़ क्रम की चट्टानों में पाया जाता है। आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, उड़ीसा तथा गोवा संचित राशि की दृष्टि से धनी राज्य है। नागपुर, भण्डरा (महाराष्ट्र) तथा मध्य प्रदेश के बालाघाट में वृहद् भंडार पाया जाता है।

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