भौगोलिक स्थिति (भाग - 1) - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

भूगोल (Geography) for UPSC Prelims in Hindi

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UPSC : भौगोलिक स्थिति (भाग - 1) - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

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  • पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में 8°4" उत्तरी अक्षांश से 37°6" उत्तरी अक्षांश तथा 68°7" पूर्वी देशान्तर से 97°25" पूर्वी देशान्तर के बीच 32,87,782 वर्ग कि. मी. क्षेत्रफल पर विस्तृत देश भारत हिन्द महासागर के उत्तर में स्थित है।
  •   भौगोलिक स्थिति (भाग - 1) - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev पूर्वी देशान्तर इसके लगभग मध्य से होकर गुजरता है जो कि देश का मानक समय भी है।
  • पूर्व से पश्चिम तक इसकी लम्बाई 2,933 कि. मी. तथा उत्तर से दक्षिण तक लम्बाई 3,214 कि.मी. है।
  • इसकी स्थलीय सीमा की लम्बाई 15,200 कि.मी. तथा जलीय सीमा की लम्बाई 7516.5 कि.मी. है। 
  • मुख्य धरातलीय भाग की समुद्री सीमा की लम्बाई 6,200 कि.मी है।
  • क्षेत्रफल की दृ"टि से भारत विश्व का सातवाँ बड़ा देश है। इससे बड़े 6 देश है रूस, कनाडा, ब्राजील, संयुक्त राज्य अमेरिका, आस्ट्रेलिया तथा चीन। 
  • भारत का धुर दक्षिणी भाग भूमध्य रेखा से मात्रा 876 कि. मी. दूर है।
  • यह भूमध्यरेखा के उत्तर में स्थित है। कर्क रेखा इसके लगभग मध्य भाग से होकर गुजरती है। कर्क रेखा जिन प्रदेशों से होकर गुजरती है वे हैगुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, प. बंगाल, त्रिपुरा तथा मिजोरम।
  • देश का मानक समय ग्रीनविच मीन टाइम से 5 घंटा 30 मिनट आगे है।
  • इसका सबसे दक्षिणी बिन्दु अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में स्थित है जिसको वर्तमान में इन्दिरा प्वाॅइण्ट के नाम से जाना जाता है। 
  • इसके पूर्व नाम हैं हैला हि चिंग, पिगमेलियन प्वाॅइण्ट तथा पारसन प्वाॅइण्ट था।
  • प्रादेशिक जलसीमा आधार रेखा से मापे गये 12 समुद्री मील की दूरी तक है जबकि संलग्न क्षेत्र (Contiguous Zone) की दूरी प्रादेशिक जलसीमा के आगे 24 समुद्री मील तक है। 
  •  इस क्षेत्र में भारत को स्वच्छता का प्रबन्ध करने, सीमा शुल्क की वसूली करने आदि का अधिकार प्राप्त है।
  •  देश का एकान्तिक आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone) संलग्न क्षेत्र के आगे 200 समुद्री मील तक है, जिसमें वैज्ञानिक शोधकार्यों को करने तथा कृत्रिम द्वीपों का निर्माण एवं प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन करने की छूट मिली हुई है।
  • यद्यपि देश का क्षेत्रफल विश्व के कुल क्षेत्रफल का मात्रा 2.2 प्रतिशत ही है किन्तु यहाँ पर विश्व की लगभग 16ः जनसंख्या निवास करती है। 
  • यहाँ की प्राकृतिक बनावट, संसाधन क्षमता आदि को देखते हुए जार्ज बी. क्रैसी ने अपनी भौगोलिक पुस्तक ‘एशिया की भूमि एवं निवासी’ (Asia's Land and People)  में लिखा है कि ‘भारत को महाद्वीप कहलाने का उतना ही अधिकार है जितना कि यूरोप को।’
  •  भारत के निकटतम पड़ोसी देश है पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, म्यान्मार तथा बांग्लादेश।
  •  श्रीलंका भी पाक जलसन्धि द्वारा अलग हुआ हिन्द महासागर में स्थित पड़ोसी देश है।
  • भूटान एक विशेष सन्धि द्वारा भारत पर निर्भर है एवं इसकी प्रतिरक्षा, विकास आदि कार्यों का उत्तरदायित्व भारत पर ही है।
  •  पाकिस्तान एवं भारत की सीमा को स्पर्श करने वाले भारतीय राज्य है जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान तथा गुजरात; जबकि अफगानिस्तान की सीमा मात्रा जम्मू-कश्मीर राज्य को स्पर्श करती है।
  • भारत एवं चीन की सीमा से सटे राज्य है जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, सिक्किम तथा अरुणाचल प्रदेश।
  • अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर तथा मिजोरम की सीमाएं उत्तर-पूर्व में स्थित म्यान्मार को स्पर्श करती है।
  • बांग्लादेश एवं भारत की सीमा से लगे भारतीय राज्य है मिजोरम, त्रिपुरा, असम, मेघालय तथा पश्चिम बंगाल।

 

                        स्मरणीय तथ्य

  • हरिद्वार के बाद गंगा मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है।
  • गंगा का डेल्टाई भाग पश्चिमी बंगाल तथा बांग्लादेश की सीमा पर स्थित गौर (Gaur) नामक स्थान से प्रारम्भ होता है।
  • कोसी नदी को प्रारम्भ में अरुण नदी के नाम से जाना जाता है। इसका उद्गम गोसाई थान के उत्तर में लगभग 6ए770 मी. की ऊँचाई से होता है।
  • घाघरा नदी कुमायूँ हिमालय के सिलम हिमानी से निकलती है। इसे पौराणिक रूप से वशिष्ठ की कन्या कहा जाता है।
  • रामगंगा, गोमती, घाघरा, ताप्ती, गंडक तथा कोसी नदियाँ गंगा की सहायक नदियां हैं, जो इससे बायें किनारे पर मिलती हैं।
  • गंगा से दाहिने किनारे पर मिलने वाली नदियां हैं-यमुना, चम्बल, सिन्ध, बेतवा, केन, टोंस तथा सोन।
  • देश का सबसे ऊँचा बाँध पंजाब में सतलुज नदी पर बना भाखड़ा बाँध है। इसकी लम्बाई 518 मी. एवं ऊँचाई 227 मी. है। इसके जलाशय की क्षमता 103 कि.मी. है।
  • देश का सबसे लम्बा बाँध (विश्व का भी) उड़ीसा में महानदी पर बना हीराकुंड बाँध है। इसकी लम्बाई 4ए800 मी. है।
  • जल परिवहन के लिए प्रयुक्त होने वाली दक्षिण भारत की प्रमुख नहरें हैं-बकिंघम नहर तथा पश्चिम तटीय नहर।
  • भारत की सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित झील देवताल है। यह गढ़वाल हिमालय में 17ए745 फीट की ऊँचाई पर स्थित है।
  • भारत का प्रथम जलविद्युत केन्द्र शिवसमुद्रम में सन् 1893 में स्थापित किया गया था।
  • केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (सी.ए.जेड.आर.आई.) राजस्थान के जोधपुर नगर में स्थापित किया गया है।

भौतिक स्वरूप

  • भारत के सम्पूर्ण क्षेत्रफल का 10.7ः पर्वतीय भाग, 18.6ः पहाड़ियाँ, 27.7ः पठारी क्षेत्र और 43ः भूभाग मैदानी है।
  • भौगोलिक दृष्टिकोण से भारत को चार भागों में बाँटा जा सकता है जो अपनी भौतिक और भौगोलिक विशेषताओं में एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न हैंः
  • उत्तरी पर्वतीय प्रदेश (Northern Mountain Wall)
  • सतलज-गंगा-ब्रह्मपुत्रा का मैदान (Sutlej-Ganga-Brahmaputra Plain)
  • दक्षिण का पठार (Deccan Plateau)
  • तटीय मैदानी प्रदेश (Coastal Plain Region)

उत्तरी पर्वतीय प्रदेश

  • इस क्षेत्र के अंतर्गत हिमालय पर्वत भारत की उत्तरी सीमा में पश्चिम से पूर्व की ओर 2,400 कि. मी. लम्बाई में एक वृहद् चाप के आकार में फैला है। 
  • इनकी चैड़ाई 150 से 400 कि.मी. और ऊँचाई 6,000 मीटर तक है। यह करीब 5 लाख वर्ग कि. मी. में फैला है।
  • ये पर्वत उस विशाल पर्वत प्रणाली के भाग है जो मध्य एशिया से मध्य यूरोप तक फैले है। 
  • इस पर्वत-प्रणाली को पामीर की गाँठ (Pamir Knot) कहते है। 
  • पश्चिमी भाग में इसकी तीन श्रेणियाँ प्रत्यक्ष हैः
  • लद्दाख-जास्कर श्रेणी,
  • पंगी श्रेणी और ठमेर,
  • पीर पंजाल श्रेणी।
  •  पूर्वी भाग में हिमालय श्रेणी और सबसे उत्तर में काराकोरम श्रेणी है जो चीन तक चली गयी है। इन पर्वतों ने भारत को शेष एशिया से पृथक कर दिया है।

सतलज-गंगा-ब्रह्मपुत्रा का मैदान

  •  यह मैदान हिमालय की उत्पत्ति के बाद बना है। यह हिमालय पर्वत के दक्षिण में और दक्षिण पठार के उत्तर में भारत का ही नहीं वरन् विश्व की सबसे अधिक उपजाऊ और घनी जनसंख्या वाला मैदान है।
  • इसका क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग कि. मी. है। यह मैदान पूर्व में 145 कि. मी. से लेकर पश्चिम में 480 कि. मी. चैड़ा है तथा 2,414 कि. मी. की लम्बाई में धनुष के आकार में फैला है। इस मैदान की ढाल समतल है। अतः ऊँचे भाग बहुत कम है।
  • अरावली पर्वत श्रेणी को छोड़कर कोई भी भाग समुद्र तल से 150 मीटर से अधिक ऊँचा नहीं है। यह मैदान अधिक गहरा है।
  • पाताल-तोड़ कुएँ बनाने के लिए की गयी खुदाई के फलस्वरूप यह प्रकट हुआ है कि इसकी मोटाई पृथ्वी की ऊपरी धरातल से 400 मीटर तक तथा समुद्री धरातल से 3,050 मीटर नीचे तक है।
  • इस मैदान में सिन्ध का अधिकांश भाग (पाकिस्तान), उत्तरी राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, प. बंगाल, बंगलादेश और असम का आधा भाग सम्मिलित है।
  • यह मैदान सिन्धु, गंगा, ब्रह्मपुत्रा और उनकी सहायक नदियों द्वारा लायी गयी मिट्टी से बना है, अतः यह बहुत उपजाऊ है। 
  • इस मैदान के बीच में अरावली पर्वत आ जाने के कारण सिन्धु और उसकी सहायक नदियाँ (झेलम, चिनाव, रावी, व्यास तथा सतलज) पश्चिम में तथा गंगा और उसकी सहायक नदियाँ (यमुना, गंडक, घाघरा, गोमती, सरयू, सोन) तथा ब्रह्मपुत्रा पूर्व में बहती है।
  • अरावली पर्वत इन नदी समूहों के बीच में जल विभाजक (Water-parting) का काम करता है। 
  • इस मैदान के पश्चिमी और पूर्वी भाग क्रमशः पश्चिमी और पूर्वी मैदान कहलाते है। 
  • पश्चिमी मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है और पूर्वी मैदान का ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है।
  • इसका पूर्वी भाग ही वास्तव में मुख्य मैदान है। इस मैदान की गहराई बहुत अधिक है। 
  • प्रतिवर्ष गंगा और उसकी सहायक नदियों द्वारा लायी गयी बारीक लाँप मिट्टी की तहें जमती जाती है, अतः हजारों मीटर की गहराई तक खुदाई करने पर भी पुरानी चट्टानों का पता नहीं चलता है।
  • यह मैदान अपेक्षाकृत अधिक नम तथा निम्न भूमि वाला है। इस मैदान का क्षेत्रफल 3,57,000 वर्ग कि. मी. है।
  • गंगा के मैदान को धरातल की ऊँचाई-निचाई के विचार से दो भागों में बाँटा गया हैः ;पद्ध  बाँगर और ;पपद्ध खादर। 
  • इस मैदान में उन भागों के, जहाँ नदियों द्वारा कछार के प्राचीनतम संग्रहीत पुरानी मिट्टी के ऊँचे मैदान बन गये हैऔर जहाँ सामान्य रूप से नदियों की बाढ़ का पानी नहीं पहुँच जाता बाँगर (Bangar) कहते है।
  • नये कछारी भाग जो निचले मैदान हैऔर जहाँ बाढ़ का पानी प्रतिवर्ष पहुँचकर नयी मिट्टी की परत जमा देता है, खादर (Khadar) के नाम से पुकारे जाते है। 
  • कहीं-कहीं नदियों के पास ऊँचे किनारे विस्तृत उप-घाटियों के रूप में परिवर्तित हो गये है। इन छोटे-छोटे मैदानी भागों को दोआब Doab) कहा जाता है। 
  • गंगा और यमुना नदियों के बीच पड़ने वाले समतल मैदानी भाग काफी उपजाऊ है जिन्हें गंगा-यमुना दोआब कहा जाता है। यह भारत की सबसे उपजाऊ भूमि है।
  • गंगा के डेल्टा के उत्तर-पूर्व में ब्रह्मपुत्रा का मैदान है। यह गारो और हिमालय पहाड़ के बीच में एक लम्बा और पतला मैदान है जिसमें ब्रह्मपुत्रा नदी की बाढ़ का पानी पर्वतों से लायी मिट्टी को जमा देता है। 
  • पानी में मिट्टी की मात्रा इतनी अधिक होती है कि जल के बहाव में थोड़ी-सी रूकावट पड़ने पर ही मिट्टी के ढेर एकत्रित हो जाते है और चारों ओर फैल जाते हैं। 
  • यही कारण है कि ब्रह्मपुत्रा नदी में द्वीप बहुत पाये जाते है। ब्रह्मपुत्रा की घाटी में चावल, नारंगी, फल, जूट तथा चाय की पैदावार होती है।
  • जहाँ हिमालय पर्वत और सतलज गंगा के मैदान मिलते हैवहाँ हिमालय से आने वाली असंख्य धाराओं ने अपने साथ पर्वतीय क्षेत्र से टूट कर गिरे हुए पत्थरों के छोटे-छोटे टुकड़े काफी गहराई तक जमा कर दिये है। 
  • इन कंकड़-पत्थरों के ढँके हुए भाग को ही भाबर कहा जाता है। यह प्रदेश हिमालय के एक सिरे से दूसरे सिरे तक लगभग 8 कि. मी. तक चैड़ा है। 
  • इस प्रदेश में लम्बी जड़ों वाले बड़े-बड़े वृक्ष तो अवश्य दृष्टिगोचर होते है किन्तु छोटे पौधों, खेतों तथा जनसंख्या का प्रायः अभाव पाया जाता है।
  • भाबर प्रदेश के आगे जाकर भाबर के नीचे बहने वाला जल ऊपरी धरातल पर प्रकट हो जाता है। इसके बड़े-बड़े दलदल हो जाते है। इन दलदलों में ऊँची घास, वृक्ष और असंख्य पशु पाये जाते है। 
  • इन घने वनों वाले प्रदेश को तराई कहते है। मलेरिया के कारण यहाँ की जनसंख्या काफी कम होती है। 
  • भाबर की अपेक्षा तराई का प्रदेश अधिक चैड़ा है। 
  • तराई की रचना बारीक कंकड़-पत्थर, रेत और चिकनी मिट्टी से हुई है।
  • हिमालय पर्वत की रचना के कारण उसके और प्रायद्वीपीय भारत के मध्य में एक गहरी खाई बन गयी जिसमें टैथिस सागर की अवशिष्ट जल खाड़ियों के रूप में भरा हुआ रह गया। 
  • इन खाड़ियों को वर्तमान अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी का उत्तरी भाग कहा जा सकता है जो अब नष्ट हो चुका है। हिमालय से निकलने वाली आरम्भिक नदियों ने अपने साथ कंकड़-पत्थर और मिट्टी लाकर इन खाड़ियों के तल में जमा कर दिया। 
  • इस प्रकार नवसृजित हिमालय की आरम्भिक नदियों द्वारा जो मिट्टी का एक बड़ा भाग सतलज प्रदेश, हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत के मध्य बना वही आज सिन्धु-सतलज -गंगा  मैदान प्रदेश कहलाता है।
  • इस मैदान का विस्तार अधिक है। यह भारत के लगभग एक-तिहाई क्षेत्रफल को घेरे हुए है। 
  • यहाँ सम्पूर्ण देश की लगभग 45ः जनसंख्या निवास करती है। 
  • यद्यपि भौगोलिक तथा आर्थिक दृष्टि से यह भारत का सर्वोत्तम भाग है किन्तु भूगर्भशाóों की दृष्टि से इसका महत्व अधिक नहीं है क्योंकि यह भारत का नवीनतम भाग है और इसकी भौतिक संरचना सरल है।
  • इस भाग में खनिज पदार्थों का नितांत अभाव है किन्तु भूमि समतल होने के कारण रेलमार्गों और नदियों का जाल बिछा है, जिस कारण इस भाग में देश के अनेक प्रमुख व्यापारिक और औद्योगिक केन्द्र स्थित हैतथा जनसंख्या भी घनी है। 
  • सिन्धु, सतलज, गंगा और ब्रह्मपुत्रा नदियों द्वारा लायी गयी मिट्टी से बने होने के कारण और सिंचाई की सुविधा के कारण यह मैदान हिमालय पर्वत का उपहार (Gift of the Himalaya) कहलाता है।

 

दक्षिण का पठार (Deccan Plateau)

 

  • पठार के उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल और सतपुड़ा की पहाड़ियां, पश्चिम में ऊँचे पश्चिम घाट और पूरब में निम्न पूर्वी घाट और दक्षिण में नीलगिरि पर्वत है। 
  • इस प्रायद्वीप की औसत ऊँचाई 487 से 762 मीटर है।
  • यह भारत का सबसे बड़ा पठार है जिसका क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किलोमीटर है। 
  • प्रायद्वीप के अंतर्गत दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश के पश्चिमी भाग, दक्षिणी बिहार, महाराष्ट्र, उड़ीसा, कर्नाटक आदि राज्य सम्मिलित है।
  • यह प्रायद्वीप भारत की प्राचीनतम कठोर चट्टानों का बना वह भू-भाग है जिसका क्षरण मौसमी क्षति की क्रियाओं द्वारा होता रहा है और जिनके कारण यह अनेक छोटे-मोटे पठारों में विभाजित हो गया है उत्तर में बिहार के राँची जिले में छोटानागपुर का पठार और दक्षिण में दक्षिण का मुख्य पठार आदि इसके उदाहरण है। 
  • इस प्रायद्वीप का धरातल कम चपटी है। यह साधारणतः टीलेदार या लहरदार है।
  • मालवा के पठार के पूर्वी भाग महादेवमैकालबराकर और राजमहल की पहाड़ियों के रूप में गंगा नदी की घाटी में वाराणसी तक फैला हुआ है।
  • विन्ध्याचल के दक्षिण में इसके समानान्तर 1,120 किलो मीटर के विस्तार में सतपुड़ा पर्वत फैला है। 
  • यह पर्वत श्रेणी मध्य प्रदेश में नर्मदा के दक्षिण और ताप्ती के उत्तर में रीवा से लगकर पश्चिम की ओर राजपीपला पहाड़ियों में होती हुई पश्चिमी घाट तक फैली है। 
  • यह श्रेणी अधिकतर बेसाल्ट और ग्रेनाइट चट्टानों की बनी है जिनकी औसत ऊँचाई 762 मीटर है किन्तु अमरकण्टक की पहाड़ियाँ 1,066 मीटर तक ऊँची हैजो आगे जाकर पूर्व की ओर छोटानागपुर के पठार पर समाप्त हो जाती है। 
  •  छोटानागपुर पठार के अन्तर्गत बिहार में राँची, हजारीबाग और गया जिले है जिनके बीच से गहरी नदियाँ (महानदी, दामोदर, सोन और सुवर्णरेखा) बहती है । पठार की औसत ऊँचाई 760 मीटर है किन्तु पाश्र्वनाथ चोटी 1, 365 मीटर ऊँची है। 
  •  इस पठार पर अधिकतर चावल पैदा होता है। इमारती पत्थरों और खनिज का धनी यह प्रदेश खनिज भण्डार के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

 

तटीय मैदानी प्रदेश (Coastal Plain Region)

 

  • दक्षिण के पठार के पूर्व और पश्चिम की ओर से पूर्वी तथा पश्चिमी घाट और समुद्र के बीच में समुद्र तटीय मैदान स्थित है। 
  • ये मैदान या तो समुद्र की क्रिया द्वारा बने है या नदियों द्वारा लायी गयी कीचड़ मिट्टी द्वारा बने है । ये क्रमशः पश्चिमी समुद्रतटीय मैदान और पूर्वी समुद्रतटीय मैदान कहलाते है ।
  • पश्चिमी समुद्रतटीय मैदान प्रायद्वीप के पश्चिम में खम्भात की खाड़ी से कुमारी अन्तरीय तक फैले है । 
  • इनकी औसत चैड़ाई 64 कि. मी. है। नर्मदा और ताप्ती के मुहानों पर यह 80 कि. मी. चैड़ा है। 
  • इस तटीय मैदान में बहनेवाली नदियाँ छोटी और तीव्रगामी है , अतः इनके द्वारा पश्चिमी घाट पर होने वाली वर्षा का जल व्यर्थ ही समुद्र में बहकर चला जाता है। तीव्रगामी होने से ये नदियाँ मिट्टी का जमाव भी नहीं करती है ।
  • दक्षिणी भाग में लम्बे और संकरे लैगून(Lagoons) पाये जाते है जो नदियों के मुहाने पर बालू के जम जाने से बने है । इन्हें कायल्स  (Kayals)  भी कहते है । 
  • इन लैगूनों में नावें भी चलायी जाती है तथा मछलियाँ भी पकड़ी जाती है । कोचीन बन्दरगाह ऐसे ही लैगून पर स्थित है।
  • मैदान के उत्तरी भाग को कोंकण और दक्षिणी भाग को मालाबार कहते है । इस मैदान में उत्तम जलवायु, उपजाऊ मिट्टी और चावल उत्पादन के कारण अधिक जनसंख्या पायी जाती है।
  • पूर्वी तटीय मैदान पश्चिमी तटीय मैदान की अपेक्षा अधिक चैड़ा है। इसकी औसत चैड़ाई 161 से 483 कि. मी. तक है। यह गंगा के मुहाने से कुमारी अन्तरीप तक फैला है। 
  • यह मैदान दो भागों में बाँटा जा सकता है। निचला भाग जिसमें नदियों की डेल्टा है और ऊपरी भाग जो अधिकांशतः नदियों के ऊपरी मार्ग में है। 
  • निचला भाग पूर्णतः उस काँप मिट्टी से बना है जिसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों ने पठार के ऊपरी भागों से लाकर बिछा दिया है।
  • समुद्र के निकटवर्ती भागों में बालू के ढेरों की लम्बी श्रृंखला मिलती है जो लहरों द्वारा मैदानों पर बन गयी है । इन ढेरों द्वारा चिलका और पुलीकट छिछली झील बन गयी है । 
  • ऊपरी भाग अंशतः काँप मिट्टी का अवशिष्ट मैदान है जो उभरे हुए भू-भाग के क्षयीकरण द्वारा बना है।
  • इस सम्पूर्ण तट को कोरोमण्डल तट कहते है । उत्तरी भाग को उत्तरी सरकार या गोलकुण्डा और दक्षिणी भाग को कर्नाटक या कोरोमण्डल तट कहते है । 

 

मिट्टिटयां

 

  • यहाँ की मिट्टी की विशेषताओं में मिलने वाली विभिन्नतों का सम्बन्ध चट्टानों की संरचना, उच्चावचों के धरातलीय स्वरूप, धरातल का ढाल, जलवायु, प्राड्डतिक वनस्पति आदि से स्थापित हुआ है। 
  • भारत में मिलने वाली मिट्टी की प्रमुख किस्म इस प्रकार है :
  • जलोढ़ मिट्टी ।(Alluvial Soil)
  • काली या रेगुर मिट्टी (Black or Regur Soil) 
  • लाल मिट्टी  (Red Soil) 
  • लैटराइट मिट्टी (Laterite Soil)

 

जलोढ़ मिट्टी

 

  • जलोढ़ मिट्टी उत्तर भारत में पश्चिम में पंजाब से लेकर सम्पूर्ण उत्तरी विशाल मैदान को आवृत करते हुए गंगा नदी के डेल्टा क्षेत्र तक फैली है। 
  • अत्यधिक उर्वरता वाली इस मिट्टी का विस्तार सामान्यतः देश की नदियों के बेसिनों एवं मैदानी भागों तक ही सीमित है। हल्के भूरे रंगवाली यह मिट्टी 75 लाख वर्ग कि. मी. क्षेत्र को आवृत किये हुए है।
  • इसकी भौतिक विशेषताओं का निर्धारण जलवायविक दशाओं विशेषकर वर्षा तथा वनस्पतियों की वृद्धि द्वारा किया जाता है। इस मिट्टी में उत्तरी भारत में सिंचाई के माध्यम से गन्ना, गेंहूं, चावल, जूट, तम्बाकू, तिलहनी फसलों तथा सब्जियों की खेती की जाती है।
  • उत्पत्ति, संरचना तथा उर्वरता की मात्रा के आधार पर इसको तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है जो निम्नलिखित है
  • पुरातन जलोढ़ या बांगर मिट्टीः निदियों द्वारा बहाकर उनके पाश्र्ववर्ती भागों में अत्यधिक ऊँचाई तक बिछायी गयी पुरानी जलोढ़ मिट्टी को बांगर के नाम से जाना जाता है। नदियों में आने वाली बाढ़ का पानी ऊंचाई के कारण इन तक नहीं पहुँच पाता है। 
  • नदी जल की प्राप्ति न होने, धरातलीय ऊंचाई तथा जल-तल के नीचा होने के कारण इनकी सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है।
  • नूतन जलोढ़ या खादर मिट्टी: यह मिट्टी नदियों के बाढ़ के मैदानों तक ही सीमित होती है। इसके कण बहुत महीन होते है तथा इनकी जलधारण शक्ति पुरातन जलोढ़ की अपेक्षा अधिक होती है। 
  • इन मिट्टियों की स्थिति नदी घाटी में होने के कारण इनकी सिंचाई की आवश्यकता सामान्यतः नहीं होती है।
  • अतिनूतन जलोढ़ मिट्टी: इस प्रकार की मिट्टी गंगा, ब्रह्मपुत्रा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि बड़ी नदियों के डेल्टा क्षेत्र में ही मिलती है। यह मिट्टी दलदली एवं नमकीन प्रकृति की होती है। इसके कण अत्यधिक बारीक होते है तथा इसमें पोटाश, चूना, फास्फोरस, मैग्नीशियम एवं जीवांशों  की अधिक मात्रा समाहित रहती है। 
  • इस मिट्टी में गन्ना, जूट आदि फसलों की कृषि की जाती है।
  • उपर्युक्त प्रकार की जलोढ़ मिट्टियों का गठन बलुई-दोमट से लेकर मृत्तिकामय रूप में पाया जाता है तथा इनका रंग हल्का भूरा होता है। इस प्रकार की मिट्टियों में नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा वनस्पतियों के अंश पर्याप्त मात्रा में मिलते है।

 

 

 

 

           

            देश के प्रमुख जलप्रपात
 देश में जलप्रपातों ;जामतसिसेद्ध की संख्या नगण्य है। सभी जलप्रपात छोटे है। अधिकांश दक्षिण भारत में ही पाये जाते है। देश के प्रमुख जलप्रपात निम्नवत है - 

  • जोग अथवा गरसोप्पा अथवा महात्मा गाँधी जल प्रपात, शरवती नदी पर ऊँचाई 255 मी)। इस जलप्रपात के निर्माण में राजा, राकेट, रोरर तथा दाम ब्लाचे नामक चार जलप्रपाता का योगदान रहता है।
  • शिवसमुद्रम् जलप्रपात, कावेरी नदी पर (ऊँचाई 90 मी.)।
  • गोकक प्रपात, कृष्णा नदी की सहायक गोकक नदी पर (ऊँचाई 55 मी)।
  • येना जलप्रपात, महाबालेश्वर के समीप (ऊँचाई 183 मी.)
  • पायकारा जलप्रपात, नीलगिरि के पर्वतीय क्षेत्र में ।
  • धुआँधार जलप्रपात, नर्मदा नदी पर (उँचाई 10 मी.)।
  • बिहार जलप्रपात, टोंस नदी पर (ऊँचाई 100 मी.)।
  • चूलिया जलप्रपात, चम्बल नदी पर (कोटा के समीप, ऊँचाई 18 मी.)।
  • मधार जलप्रपात, चम्बल नदी पर (ऊँचाई 12 मी.)।
  • पुनासा जलप्रपात, चम्बल नदी पर (ऊँचाई 12 मी.)।

 

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