मृत संस्कार, धर्म और कला - सिन्धु घाटी की सभ्यता, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : मृत संस्कार, धर्म और कला - सिन्धु घाटी की सभ्यता, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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मृत संस्कार, धर्म और कला 

मृत संस्कार

  • सिन्धु प्रदेश में मुख्यतः तीन तरह से मृतक संस्कार करने की प्रथा थी। - (a) मृतक के शरीर को ज्यों- का-त्यों पृथ्वी में गाड़ देना, (b) शव को खुला छोड़कर पशु-पक्षियों को खिलाने के बाद कंकाल भाग को पृथ्वी में गाड़ना, (c) शव का अग्नि संस्कार कर देना।
  • मेसोपोटामिया और मिस्र की तरह सिन्धु-सभ्यता में भी शवों के साथ जीवन की सभी आवश्यक वस्तुओं को गाड़ने की प्रथा थी। इससे स्पष्ट होता है कि सिन्धु सभ्यता के निवासी पुनर्जन्म में विश्वास करते थे।
  • हड़प्पा में शवों को गाड़ने और मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा प्रचलित थी।
  • मोहनजोदड़ो में राख और हड्डियों से भरे बहुत से कलश मिले हैं।

स्मरणीय तथ्य

  • सिन्धुवासी रथ निर्माण की कला से परिचित नहीं थे।
  • गेहूं और जौ रबी फसल के रूप में उत्पादित की जाती थी।
  • सिन्धुवासियों का प्रमुख निर्यात सूती वस्त्र, मृृण्मूर्तियां और मिट्टी के बर्तन थे।
  • कबूतर सिन्धुवासियों के लिए पूजनीय था।
  • मृतक संस्कार की विभिन्न पद्धतियों में पूर्णरूपेण समाधिस्थ करना सर्वाधिक लोकप्रिय था।
  • कुछ विद्वानों ने हड़प्पा की अभिन्नता ‘हरि-यूपीया’ से सिद्ध करने की चेष्टा की है। ‘हरि-यूपीया’ का उल्लेख एक बार ऋग्वेद में हुआ है।
  • हड़प्पा संस्कृति के स्थलों से ऐसे भवनों के अवशेष प्राप्त नहीं हुए है जिन्हें निर्विवाद रूप से पूजा-गृह या मंदिर की संज्ञा दी जा सके।
  • सामान्यतः भवनों में अलंकरण का अभाव रहता था। हो सकता है कि कुछ भवनों को अलंकृत किया गया हो और अलंकरण के चिन्ह अब नष्ट हो गए हो।
  • नगरों में सड़कों तथा भवनों की स्थिति तथा उनकी सामान्य योजना लगभग एक-सी थी। उसमें तकनीकी कुशलता तथा वैज्ञानिकता के बावजूद विधिता का अभाव था।
  • भवनों के निर्माण में सामान्यतया पक्की ईंटों का ही प्रयोग किया गया। उनकी जुड़ाई मिट्टी के गारे से की जाती थी।
  • ऊँचे चबूतरों के निर्माण में तथा बाद के भवनों की दीवालों में सामान्यतया कुछ कच्ची ईंटों का प्रयोग भी किया जाता था।
  • हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में एक से अधिक मंजिल के भवनों के चिन्ह कम प्राप्त हुए है। पर ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकांश भवनों में एक से अधिक मंजिले थीं। इनमें से भूमितल पर बनी प्रथम मंजिल तो ईंटों की होती थी, किन्तु उनके ऊपर एक या उससे अधिक मंजिलों के निर्माण में लकड़ी का प्रयोग किया जाता था।
  • दरवाजों के ऊपर की पटाई अधिकांशतः लकड़ी के तख्तों या डण्डों की सहायता से की जाती थी। जहां किसी छोटे स्थान को पाटना होता वहां ईंटों का टोड़ेदार मेहराब बना दिया जाता था।

लिपि ज्ञान

  • सिन्धु सभ्यता के निवासियों ने लेखन कला का भी विकास किया था। उनकी लिपि चित्रात्मक थी, जिनमें प्रत्येक लिपि रेखीय संकेत किसी जीवित एवं अजीवित वस्तु को दर्शाती थी।
  • विद्वानों का विचार है कि साधारणतया इस लिपि की लिखावट दाहिनी से बाँयी ओर थी।
  • कुछ विद्वानों का मत है कि यह वही लिपि है जिसका प्रयोग मिस्र, मेसोपोटामिया तथा पश्चिम एशिया में होता था। किन्तु यह सर्वमान्य नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सिन्धु प्रदेश की लिपि है और पश्चिमी एशिया की लिपियों से इसका किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है।
  • सिन्धु लिपि में मुख्यतः 62 चिन्ह है।
  • इस लिपि का कम्प्यूटर विश्लेषण पूर्व सोवियत संघ में 1964 में और भारत के टाटा इन्स्टिट्यूट आॅफ फंडामेन्टल रिसर्च में 1972 में हुआ।

धर्म और कला

  • सिन्धु घाटी में किसी प्रकार का मंदिर या वेदी प्राप्त नहीं हुई है।
  • हड़प्पा एवं बलूचिस्तान के अधिकांश स्थानों से प्राप्त स्त्री एवं सांड़ की मूर्तियों, भव्य भवन की रचना एवं उससे सम्बन्धित नालियां, स्नानागार, एवं मुहरों पर प्राप्त आकृतियों से लोगों के धार्मिक विचारों का पता चलता है।
नव-पाषाण युग
  • इस युग के मनुष्यों ने सभ्यता के मामले में काफी प्रगति की। औजार बेहतर ढंग से तराशे, घिसे तथा चिकने किए हुए थे। 
  • प्रमुख उपकरण थे।सेल्ट, बसूले, छेनियां, मूसल, बाणाग्र, आरियां, तक्षणियां आदि। 
  • तीन तरह की विशेष कुल्हाड़ियां प्रयोग में लाई जाती थीं। ये थे।वक्र धार की तिकोनी कुल्हाड़ियां, पालिशदार पत्थर की कुल्हाड़ियां, नुकीले हत्थे व अंडाकार बगलों वाली कुल्हाड़ियां
  • इस युग के अवशेष तमिलनाडु, कर्नाटक, हैदराबाद, कश्मीर, बंगाल, उड़ीसा और नागपुर से प्राप्त हुए हैं।
  • कुछ नई खोजों के साथ आदमी का रहन-सहन भी बदल गया। उसका खानाबदोशी जीवन समाप्त हो गया था और उसने एक स्थान पर टिके रहने वाले किसान का जीवन शुरू कर दिया था। महत्वपूर्ण खोज थे।कृषि की शुरुआत तथा पशुओं को पालतू बनाना। 
  • उसने गेहूं, मक्का, जौ तथा सब्जियां उगाने की कला सीखी। 
  • पालतू पशुएं प्रतिदिन दूध देती थीं और जरूरत पड़ने पर उनमें से कुछ खाई भी जा सकती थीं। 
  • ये लोग गर्त वाले घरों का निर्माण और चाक से बने बर्तनों का प्रयोग भी करते थे। 
  • बड़ी-बड़ी शिलाओं के मकबरे और ऐसी कब्रें मिली हैं, जिनमें हड्डियां पात्रों में रखकर दबाई गई हैं। इस प्रकर की कब्रü चनल्लूर आदि स्थानों से प्राप्त हुई हैं। इन्हें ‘डोलमेन’ कहा जाता है।
  • बेलन घाटी में विन्ध्य पर्वत के उत्तरी पृष्ठों पर लगातार तीनों अवस्थाएं एक के बाद एक पाई जाती हैं।पहले पुरापाषाण कालिक, तब मध्य-पाषाण कालिक और तब नव-पाषाण कालिक, और यही बात नर्मदा घाटी के मध्य-भाग की है।

 

  • क्वेटा संस्कृति से प्राप्त अवशेष धार्मिक विशेषताओं को प्रतिबिंबित करते हैं।
  • समकालीन पश्चिमी एशियाई संस्कृति के अनुरूप ही कुछ लोग मातृदेवी की उपासना करते थे।
  • कुछ मुहरों में तीन सिर और एक सींगधारी पुरुष की आकृति खुदी हुई है। इतिहासकार इसे शिव के आद्यरूप पशुपति की आकृति मानते हैं।
  • हड़प्पा की एक मुहर में एक नग्न महिला की आकृति बनी हुई है जो कुछ नीचे की तरफ झुकी हुई है और मूर्ति की योनि से पौधा उत्पन्न दिखाई पड़ता है, जिससे भूदेवी की उपासना की प्रथा का परिचय मिलता है।
  • एक मूर्ति के सिर पर नाग की आकृति सर्पपूजा का प्रमाण देती है।
  • कालीबंगन में एक यज्ञ स्थल प्राप्त हुआ है।
  • योनि और लिंग जैसी अनेक पत्थर की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं।
  • कुछ मुद्राओं से पशुपति और वृक्ष पूजा की भी जानकारी मिलती है।
  • मृतकों के साथ गाड़ी जाने वाली दैनिक उपयोग की वस्तुओं से हड़प्पावासियों के पारलौकिक सत्ता में विश्वास का ज्ञान होता है।
  • चित्रित मृदभांडों से सिंधु सभ्यता के नागरिकों के मृदा-पात्रों के निर्माण की कुशलता ज्ञात होती है।
  • नगर योजना और जल-निष्कासन व्यवस्था के अनुरूप ही हड़प्पाकालीन पात्रों की उन्नातवस्था से एक तार्किक और सुव्यवस्थित मानसिकता का भान होता है।
  • हड़प्पा से प्राप्त बलुआ पत्थर की मानव शरीर को दर्शाने वाली दो मूर्तियों से सिंधु सभ्यता के नागरिकों की रूपंकर कला में उन्नति दृष्टिगत होती है।
  • इसी प्रकार मोहनजोदड़ो से प्राप्त (संभवतया नर्तकी) मूर्ति की भाव-भंगिमायें धातु-मूर्तिकला का विकास दर्शाती हैं। खड़ी नग्न मूर्ति के गले में एक कंठाभूषण तराशा गया है और एक बाजू में पूरी तरह चूड़ियां तराशी गयी हैं। ऋग्वेद में उल्लिखित दासी की भाँति इस मूर्ति की नीग्रोइड आकृति बनाई गयी है।
  • बैल का काफी संख्या में अंकन और कई सिर वाले जंतुओं के चित्र इन जंतुओं के धार्मिक महत्व को स्थापित करते हैं।
  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त पुजारी की मूर्ति संपूर्ण मूर्तिकला में महत्वपूर्ण है। पुजारी की बारीकी से तराशी गयी दाढ़ी, मूछें, साफ और संवरे हुये बाल इस मूर्ति की कलात्मक विशेषता है। पूजारी की मूर्ति में अंकित बड़े-बड़े होठ और चैड़ी नाक से इसके दास होने का ज्ञान होता है।
  • हड़प्पाकालीन काष्ठकला और चित्रकला का एक भी उदाहरण प्राप्त नहीं हुआ है।

हड़प्पा संस्कृति का अन्त

  •     इस बात का अनुमान लगाना बहुत ही कठिन है कि हड़प्पा संस्कृति के विनाश का क्या कारण था।
  • भूकम्प, जमीन का अचानक उठाव, सिन्धु की बदलती परिस्थिति, मौसम परिवर्तन आदि कारणों का अनुमान इसके विनाश के सम्बन्ध में लगाया जा सकता है। मोहनजोदड़ो में प्राप्त मानव कंकालों में एक नरमंुड पाया गया जिस पर एक कटा निशान था। इससे बर्बर आक्रमण और सामूहिक हत्याकांड का अनुमान लगाया जाता है।
  • कुछ विद्वान इसके विनाश का कारण भयंकर बाढ़ को मानते हैं, क्योंकि बाढ़ से लाई गई ढेर सारी मिट्टी पायी गई।
  • लोथल में भी बाढ़ की भयानकता के चिन्ह देखे गये हैं।
  • कालीबंगन में बाढ़ या आक्रमण के कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए है। इस नगर के विनाश का कारण शायद घग्गर नदी का सूखना बताया जाता है।
  • कुछ नगरों का पतन स्थानीय कारणों के कारण भी हो सकता है।
  • सम्पूर्ण सभ्यता का अन्त अकस्मात ही नहीं हुआ था। हड़प्पा संस्कृति के पतन में लोथल और पंजाब का विनाश इस विचार की पुष्टि करता है।
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