मृदा - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

भूगोल (Geography) for UPSC Prelims in Hindi

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UPSC : मृदा - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

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मृदा

  • जिस मृदा का pH7 से कम होता है उसे अम्लीय कहते है , परन्तु व्यावहारिक रूप से जिसका pH5.5 या इससे कम होता है उसे अम्लीय माना जाता है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रा में जल के साथ घुलनशील लवण घुलकर नीचे चला जाता है और ऊपरी परत में हाइड्रोजन आयन की अधिकता से भूमि अम्लीय हो जाती है। 
  • अम्लीय मृदा बनने के अन्य कारण सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रिया, अम्लजनक मौलिक पदार्थों से अम्लीय मृदाओं की उत्पति, फसलों द्वारा क्षारकों का निराकरण, अम्लजनक उर्वरकों का निरंतर उपयोग हो सकता है। 
  • अम्लीय मृदा में सुधार के लिए चूना पत्थरों का उपयोग किया जाता है। 
  • साधारण व्यवहार में आने वाले चूना पत्थरों में कैल्सियम चूना-पत्थर, डोलोमाइटिक लाइम स्टोन, खड़िया, बुझा चूना, स्लैग, लकड़ी की राख, सीप खोल का चूना आदि प्रमुख है।

अम्लीय मृदा का दुष्प्रभाव

  • पौधों के जड़ ऊतकों पर आयन्स का विषैला प्रभाव पड़ता है।
  • पौधों की झिल्लियां द्वारा धनायन्स की पारगम्यता कम हो जाती है।
  • पौधों की जड़ों द्वारा क्षारीय तथा अम्लीय मूलकों के बीच असंतुलन।
  • एन्जाइमों की सक्रियता कम होकर पौधों द्वारा पोषकों की ग्राह्यता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
  • एल्यूमिनियम, लोहा अधिक विलेय होकर पौधों के लिए हानिकारक मात्रा में उपलब्ध होने लगते है।
  • लाभकारी मृदा में सूक्ष्म जीवाणु प्रायः निष्क्रिय हो जाते है।
  • अनेक लघु पोषक तत्त्व उपलब्ध नहीं हो पाते है।

क्षारीय तथा लवणीय मृदायें

  • लवणीय मृदायें: जिस मृदा में घुलनशील लवण की सांद्रता विषैले स्तर तक मौजूद हो यानि जिस मृदा के लिए विद्युत चालकता 4.0 mm bos/cm हो, जिसमें स्थानापन्न सोडियम 15% से कम तथा pH 8.5 से कम हो तो वह लवणीय मृदा होता है। 
  • घुलनशील लवणों में अधिकतर सोडियम, कैल्शियम व मैग्नीशियम के क्लोराइड व सल्फेट होते है।
  • क्षारीय मृदायें: इसमें घुलनशील लवण की अत्यधिक सांद्रता नहीं होती और इसकी विद्युत चालकता 4.0 mm bos/cm से कम होती है। 
  • इसमें स्थानापन्न सोडियम 15% से अधिक तथा pH 8.5 से अधिक होता है।
  • लवण-क्षारयुक्त मृदायें: इसमें विद्युत चालकता 4.0 mm bos/cm से अधिक, स्थानापन्न सोडियम 15ः अधिक और pH 8.5 से कम होता है।

मृदा लवणीयता तथा क्षारीयता का दुष्प्रभाव

  • ऐसी मृदा संरचना सघन हो जाती है जिससे जल की पारगम्यता कम हो जाती है तथा वायु संचार कम हो जाता है। 
  • वायु संचार कम होने से जीवाणु क्रिया में बाधा आती है।
  • पोषक तत्त्वों की उपलब्धि में बाधा आती है।
  • जल अवशोषण में विघ्न पैदा होता है।
  • लवणों के विषैलेपन का पौधों पर दुष्प्रभाव होता है।

 

  फल एवं सब्जियों का उत्पत्ति स्थल

फल

1

 आंवला   

  उष्ण कटिबंधीय एशिया (भारत)

2

 एबोकाडो 

  उष्ण कटिबंधीय अमेरिका

3

 केला       

   इन्डोचाइना

4

 बेर         

    भारत

5

 साइट्रस   

  उत्तरी पश्चिमी भारत

6

 अंगूर         

  आर्मीनिया

7

 अमरूद     

 अमेरिका उपोष्ण

8

  कटहल     

 भारत

9

 लीची         

  चीन

10

 आम       

  भारत

11

 पपीता     

 उपोष्ण अमेरिका

12

 सेब         

  कैस्पियन सागर

 

फल एवं सब्जियों का उत्पत्ति स्थल   सब्जियाँ
1 फूलगोभी  इटली
2 प्याज         एशिया
3 लौकी          भारत (देहरादून)
4 कद्दू             अमेरिका
5 मूली            चीन
6 शकरकन्द      अमेरिका
7 लाल मिर्च      ब्राजील
8 बैंगन             भारत
9 भि डी          भारत   
10 टमाटर           दक्षिणी अमेरिका

 

 लवणीय तथा क्षारीय मृदा सुधार

  • पूर्ण जल निकास  
  • पर्याप्त सिंचाई
  • जिप्सम का प्रयोग   
  • गंधक का प्रयोग
  • सल्फ्यूरिक अम्ल का उपयोग
  • लाइम गंधक का उपयोग
  • लवणहीन सिंचाई जल
  • पृष्ठ मृदा से पानी का वाष्पीकरण कम करना
  • लवणरोधी फसलüउगाना
  • पानी लगाकर हरा शैवाल लगाना  

 

फसलों के प्रमुख रोग

    

रोग का नाम

रोग का कारक

फैलने का माध्यमरोग की पहचान

1

 धान का झुलसा

 फफूँदी

  बीज, हवा, मृद

   पत्तियाँ फूल  टहनियां आदि मुरझाकर भूरी हो जाती है।

2

 धान का पदगल

 फफूँदी

  बीज, हवा, मृदा

   भूमि के पास तना सड़ जाता है और पौधा झुक जाता है।

3

 धान का खैरा रोग

 जिंक की कमी

 भूमि

   पत्तियाँ गहरे पीले रंग की हो जाती है। और वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है।

4

 धान का अंगमारी रोग

  जीवाणु

  मृदा

  मध्य शिरा के साथ जलासिक्त पारभासक धब्बे

5

 धान का झोंका

  फफूँदी

  बीज, हवा, मृदा

 पत्तियों पर नाव के आकार का धब्बा जो बीच में सफेद धूसर रंग का तथा चारों ओर भूरे रंग से घिरा होता है।

6

 धान का कूट

 फफूँदी

 बीज एवं हवा

 बाली के कुछ दाने हरे रंग के हो जाते है।

7

 गेहूँ का चूर्णिकासिता या चूर्णों फफूँद रोग

 फफूँदी

 हवा

  पत्ती के दोनों भागों पर सफेद सतह जमा हो जाती है।

8

 (I) गेहूँ का काला किट्ट

  फफूँदी

  हवा,   मृदा

 

 

   (II)  गेहूँ का भूरा किट्ट

   
 

   (III) गेहूँ का पीला किट्ट

   

9

  गेहूँ का कडवा रोग

 फफूँदी

 हवा

  इसमें पूरी बाली काले चूर्ण में बदल जाती है।

10

 गेहूँ का सेंहू रोग

     कीट द्वारा

    भूमि व बीज

 

11

 सरसों का श्वेत किट्ट या  श्वेत फफोला रोग

  फफूँदी

    वायु ,जल एवं कीट  

पत्तियों पर सफेद रंग के छोटे-छोटे धब्बे बन जाते है।  तथा पुष्प का आकार अति वृद्धि के कारण बदल जाता है।

12

     आलू का झुलसा

  फफूँदी

  मृदा ,हवा, बीज

  पत्तियाँ पीले भूरे रंग की हो जाती है।

13

     आलू का विलयन

   

14

     आलू की पछेती अंगमारी

 फफूँदी

   भूमि - हवा

  भूरे अथवा बैंगनी रंग के अनियमिताकर धब्बे पत्तियों  पर दिखाई देते है।

15

     आलू की अगेती  अंगमारी

  फफूँदी

  मृदा हवा

  गहरे भूरे अथवा काले रंग के धब्बे पत्तियों पर दिखाई पड़ते है

  

  ।

   

16

     आलू का ड्डकृष्ण कान्त     रोग (भंडारन रोग)

 निम्न आक्सीजन प्रबन्ध

 

 आलू के मध्य में ऊतक काले रंग का हो जाता है।

17

     मक्का का झुलसा

  फफूँदी

  बीज- भूमि

 पत्तियाँ भूरी होकर गिर जाती है।

18

     मक्का का तुलासिका

 फफूँदी

 बीज-भूमि

 इसमें पत्तियों पर पीली धारी पड़ जाती है तथा निचली सतह पर इनके चे सफेद चूर्ण के समान का धब्बा बन जाता है।

19

     मूँगफली का टिक्का रोग

 फफूँदी

 बीज, हवा, वर्षा

  पत्तियों पर अडाकार भूरे या कत्थई रंग के धब्बे दिखाई पड़ने लगते है।

20

     गन्ना का लाल सड़न

 फफूँदी

  भूमि,  पेड़ी

  इसमें गन्ने के तने से एल्कोहल की तरह की गंध आती है तथा गांठों के पास पोर सूखकर सड़ जाते है।

21

     मटर का बुकनी  या चूर्ण रोग  

  फफूँदी

  रोगी ठंठ

  पत्तियों कलियों व तनों पर सफेद पाउडर जैसी फफूँदी दिखाई पड़ती है।

22

     नींबू का कैन्कर या खर्रा रोग    

 जीवाणु

  रोगी पौधे

  इसमें पत्तियों कांटों टहनियों तथा फलों पर प्रारम्भ में पीला दाग    बनता है जो बाद में भूरे रंग का हो जाता है। फलों पर खुरदरे भूरे रंग का दाग बन जाता है।

 

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