मौर्यकालीन समाज - मौर्य साम्राज्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : मौर्यकालीन समाज - मौर्य साम्राज्य, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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मौर्यकालीन समाज

 वर्ण व्यवस्था

  • पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रों की भांति कौटिल्य ने भी वर्णाश्रम व्यवस्था को सामाजिक संगठन का आधार माना है। उसके अनुसार वर्णाश्रम व्यवस्था की रक्षा करना राजा का कत्र्तव्य है।
  • धर्मशास्त्रों के अनुरूप कौटिल्य ने भी चारों वर्णों के व्यवसाय निर्धारित किए। किंतु शूद्र को शिल्पकला और सेवावृति के अतिरिक्त कृषि, पशुपालन और वाणिज्य से आजीविका चलाने की अनुमति दी है। 
  • अर्थशास्त्र में शूद्र को आर्य कहा गया है तथा उसे म्लेच्छ से भिन्न माना गया है। कहा गया है कि आर्यशूद्र को दास नहीं बनाया जा सकता, यद्यपि म्लेच्छों में संतान को दास रूप में बेचना या खरीदना दोष नहीं है।
  • ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ करवाए जाने का उल्लेख मेगास्थनीज ने भी किया है। 
  • राजा के शिक्षकों, यज्ञ कराने वाले पुरोहित (आचार्य) तथा वेदवाही ब्राह्मणों को भूमि दान में दी जाती थी। यह भूमि ब्रह्मदेय कहलाती थी और यह पूर्णतः कर-मुक्त थी। 
  • चार वर्णों के अतिरिक्त कौटिल्य ने अनेक वर्णसंकर जातियों का भी उल्लेख किया है। इनमें से कुछ आदिवासी जातियां थीं, जो किसी खास व्यवसाय से आजीविका चलाती थीं। 
  • कौटिल्य ने चांडालों के अतिरिक्त अन्य सभी वर्णसंकर जातियों को शूद्र माना है। इनके अतिरिक्त जुलाहे, धोबी, दर्जी, सुनार, लुहार, बढ़ई आदि व्यवसाय पर आधारित वर्ग, जाति का रूप धारण कर चुके थे। अर्थशास्त्र में इन सबका समावेश शूद्र वर्ग के अंतर्गत किया गया है। 
  • अशोक के शिलालेखों में दास और कर्मकार का उल्लेख है जो शूद्र वर्ग के अंदर ही समाविष्ट किए जाते हैं ।
  • मेगास्थनीज ने लिखा है कि कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता, और न वह अपने व्यवसाय को दूसरी जाति के व्यवसाय में बदल सकता है। केवल ब्राह्मणों को ही अपनी विशेष स्थिति के कारण यह अधिकार प्राप्त था। 
  • मेगास्थनीज ने भारतीय समाज को सात जातियों में विभक्त किया है - (i) दार्शनिक, (ii) किसान, (iii) पशुपालक, (iv) कारीगर या शिल्पी, (v) सैनिक, ;अपद्ध निरीक्षक, (vi) सभासद या अन्य शासक वर्ग। 
  • दार्शनिकों की जाति को मेगास्थनीज दो श्रेणियों में विभक्त करता है - ब्राह्मण और श्रमण। 
  • श्रमणों को भी दो श्रेणियों में बांटा गया है। जो वनों में रहते थे और कंद-मूल-फलों पर आजीविका चलाते थे इन्हें वैखानस या वानप्रस्थ आश्रम से संबद्ध माना जा सकता है। 
  • दूसरी श्रेणी के श्रमण वे थे जो आयुर्वेद में कुशल होते थे और समाज में सम्मानित थे। 

स्त्रियों की स्थिति

  • परिवार में स्त्रियों की स्थिति स्मृतिकाल की अपेक्षा अब अधिक सुरक्षित थी। उन्हें पुनर्विवाह तथा नियोग की अनुमति थी। 
  • संभ्रांत घर की स्त्रियाँ प्रायः घर के अंदर ही रहती थीं। कौटिल्य ने ऐसी वक्तियों को अनिष्कासिनी कहा है। 
  • अर्थशास्त्र से सती प्रथा के प्रचलित होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। 
  • जैन तथा बौद्ध अनुश्रुतियों में भी सती प्रथा का उल्लेख नहीं है, किंतु यूनानी लेखकों ने उत्तर-पश्चिम में सैनिकों की वक्तियों के सती होने का उल्लेख किया है। 
  • मौर्य युग में भी बहुत-सी स्त्रियाँ ऐसी थीं जो वैवाहिक जीवन न बिताकर गणिका या वेश्या के रूप में जीवन-यापन करती थीं। 
  • स्वतंत्र रूप से वेश्यावृति करने वाली स्त्रियाँ रूपाजीवा कहलाती थीं। इनसे राज्य को आय होती थी। इनके कार्यों का निरीक्षण गणिकाध्यक्ष तथा एक राजपुरुष करता था। 
  • बहुत-सी गणिकाएं गुप्तचर विभाग में भी काम करती थीं।

दास प्रथा

  • मेगास्थनीज ने लिखा है कि सभी भारतवासी समान हैं और उनमें कोई दास नहीं है। कई अन्य यूनानी विद्वानों का भी यही मत है लेकिन इन कथनों को शब्दशः स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि कम-से-कम बुद्ध के काल से ही दासों को उत्पादन के काम में लगाया जाता था और पालि त्रिपिटक में इसके असंख्य उल्लेख हैं ।
  • जहां त्रिपिटक में दासों के चार प्रकार बताए गए हैं , कौटिल्य ने नौ का उल्लेख किया है।
  • कौटिल्य के विवरणों से यह भी स्पष्ट है कि राज्य की भूमि पर कृषिकार्य में, खादानों में, कारखानों में, सुरक्षा प्रबंधों में दासों एवं दासियों का प्रयोग किया जाता था। 
  • कौटिल्य ने आजीवन दासों और उत्पन्न दासों में अंतर रखा है। ऐसे लोग जो एक निश्चित अवधि के लिए अस्थायी रूप से बंधक एवं आश्रित थे, इनको कौटिल्य ने आहितक कहा है। 
  • अर्थशास्त्र के अनुसार सही अर्थों में तो केवल बर्बर म्लेच्छ ही, जो वर्ण से बाहर थे, तथा अनार्य (यहां पर आर्यों में शूद्र सम्मिलित हैं ) समाज के सदस्य ही स्थायी रूप से दास बनाए जा सकते थे।

मनोरंजन

  • नगरों में प्रेक्षाएं लोकप्रिय थीं। स्त्रीऔर पुरुष कलाकार दोनों प्रेक्षाओं में भाग लेते थे। इन्हें रंगोपजीवी तथा रंगोपजीवनी कहते थे। 
  • विहार यात्राओं में मृगया और सुरापान की प्रधानता रहती थी। अशोक ने इन यात्राओं को बंद करवा दिया और धम्म यात्राओं को प्रारम्भ किया। 

धर्म

  • कौटिल्य के अनुसार त्रयी (अर्थात्, तीन वेदों) के अनुसार आचरण करते हुए संसार सुखी रहेगा और अवसाद को प्राप्त नहीं होगा। तदनुसार राजकुमार के लिए चोलकर्म, उपनयन, गोदान इत्यादि वैदिक संस्कार निर्दिष्ट किए गए हैं । 
  • अर्थशास्त्र में अश्वमेघ, वाजपेय आदि बड़े-बड़े यज्ञों की इसलिए निंदा की गई है कि इनमें गाय और बैल का वध होता था, जो कृषि की दृष्टि से उपयोगी थे।
  • अशोक ने अपने नव शिलालेख में लोगों द्वारा किए जाने वाले मांगलिक कार्यों का उल्लेख किया है। ये मांगलिक कार्य बीमारी के समय, विवाह, पुत्रोत्पत्ति तथा यात्रा के अवसर पर किए जाते थे।
  • अशोक ने अपने शिलालेखों में ब्राह्मणों, निग्र्रन्थों के साथ-साथ आजीविकों का भी उल्लेख किया है। 
  • राज्याभिषेक के 12वें वर्ष में अशोक ने बराबर की पहाड़ियों में आजीविकों को दो गुफाएं प्रदान की। 
  • अशोक के पौत्र दशरथ ने भी नागार्जुनी की पहाड़ियों में कुछ गुफाएं आजीविकों को भेंट की।
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