रणजीत सिंह और राजपूत - विदेशी यात्री, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : रणजीत सिंह और राजपूत - विदेशी यात्री, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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रणजीत सिंह

 ¯ रणजीत सिंह का जन्म 1780 ई. में गुजरांवाला में हुआ था। वे सुकरचकिया मिसल के थे। 
 ¯ 1797 ई. में वे अपने मिसल के प्रमुख बने। रणजीत सिंह ने मिसलों का एकीकरण किया और एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की। 
 ¯ 1799 ई. में उन्होंने लाहौर पर अधिकार कर लिया और 1805 ई. में उसे अपनी राजधानी बनाई। 
 ¯ 1808 ई. में रणजीत सिंह ने सतलज नदी पार करके फरीदकोट, अम्बाला आदि को अपने अधीन कर लिया, परन्तु 1808 में अंग्रेजों के साथ हुई अमृतसर की संधि के बाद सतलज के पार के प्रदेशों पर अंग्रेजों का अधिकार स्वीकार कर लिया गया। 
 ¯ उन्होंने 1818 ई. में मुल्तान पर तथा 1834 ई. में पेशावर पर कब्जा कर लिया। 
 ¯ 1839 ई. में रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई और दो अंग्रेज-सिक्ख युद्धों के बाद 1849 में लार्ड डलहौजी ने पंजाब को अंग्रेजी शासन में विलीन कर लिया।

रुहेला एवं बंगश पठान
 ¯ रुहेलखंड प्रदेश दिल्ली के पूर्व में था। इस प्रदेश में भारत की पश्चिमोत्तर सीमा की पर्वत-श्रेणियों (रुह) से अफगान लोग बड़ी संख्या में आकर बस गए थे, जिन्हें रुहेला कहते थे। 
 ¯ दाउद एवं उसके पुत्र अली मोहम्मद खान ने रुहेलखंड में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।
 ¯ एक दूसरे अफगान सरदार मोहम्मद खान बंगश ने भी फर्रुखाबाद में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।

जाट
 ¯ दिल्ली, आगरा और मथुरा के आसपास के क्षेत्र में जाटों की एक नई शक्ति का उदय हुआ। उनका मुख्य पेशा कृषि था। 
 ¯ चूड़ामन एवं बदन सिंह ने भरतपुर में जाट राज्य की स्थापना की और वहां से वे आसपास के इलाकों में लूट-पाट मचाते रहे। 
 ¯ उन्होंने दिल्ली दरबार में चल रहे षड्यंत्रों में भी भाग लिया। 
 ¯ सूरजमल (1707-63 ई.) जाट शासकों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ। उसे जाट जाति का ”अफलातून“ कहा जाता था। 
 ¯ उसने हर तरफ जाट राज्य की सीमा का प्रसार किया। 
 उसका साम्राज्य उत्तर में गंगा से लेकर दक्षिण में चम्बल तक तथा पूर्व में आगरा से पश्चिम में दिल्ली तक फैला था। 
 ¯ 1763 ई. में उसकी मृत्यु के साथ ही यह प्रदेश छोटे-छोटे जमींदारों में बंट गया और अन्ततः अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया।

 

राजपूत
 ¯ राजपूत सरदार अकबर के समय से मुगल साम्राज्य को समर्थन देते आ रहे थे। मगर उनमें से बहुतों ने औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह किया क्योंकि औरंगजेब उनके पैतृक भूमि के उत्तराधिकार में हस्तक्षेप करने लगा था। 
 ¯ औरंगजेब की मृत्यु के बाद उन्होंने मुगल साम्राज्य के बंधन से अपने को मुक्त करने तथा अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ाने के प्रयास किए।
 ¯ जोधपुर और आमेर के शासकों को क्रमशः गुजरात और मालवा का सूबेदार बनाया गया। 
 ¯ कुछ समय तक लगा कि राजपूत मुगल साम्राज्य में अपना स्थान और प्रभाव पुनः प्राप्त कर रहे हैं और जाटों तथा मराठों के विरुद्ध साम्राज्य के मुख्य समर्थक बन रहे हैं।
 ¯ इस काल में सबसे श्रेष्ठ राजपूत शासक आमेर का सवाई राजा जयसिंह (1681-1743 ईण्) था। 
 ¯ उसने खूबसूरत जयपुर नगर बसाया और खगोल के अध्ययन के लिए दिल्ली, जयपुर, वाराणसी, उज्जैन तथा मथुरा में वेधशालाएं स्थापित कीं।
 ¯ परंतु राजपूतों का प्रभाव ज्यादा दिनों तक नहीं टिका। वे आपसी कलहों में इतने अधिक उलझे रहे कि अपने प्रभाव-क्षेत्रों के बाहर सत्ता की होड़ के लिए उनमें न ताकत थी और न ही क्षमता। 
 ¯ जाटों, मराठों और सूबाई शासकों की शक्ति बढ़ी तो राजपूतों के हाथों से राज्यों के बाहर की उनकी जागीरें निकल गईं और उनका प्रभाव घटने लगा। 
 ¯ परन्तु राजस्थानियों के एक समूह का देश की अर्थव्यवस्था में प्रभाव बढ़ा। ये सौदागर लोग थे और उस समय गुजरात, दिल्ली तथा आगरा के महत्वपूर्ण केन्द्रों के अंतर्राज्यीय व्यापार में लगे हुए थे। मुगल साम्राज्य की अवनति के साथ इन केन्द्रों का व्यापारिक महत्व भी घट गया। 
 ¯ राजस्थानी सौदागर नए केन्द्रों में पहुंचे और उन्होंने बंगाल, अवध तथा दक्कन में वाणिज्य-व्यापार पर अपना कब्जा जमाना शुरू कर दिया।

 

मैसूर
 ¯ 18वीं शताब्दी के आरम्भ में नंजराज और देवराज का मैसूर की सत्ता पर कब्जा था। 
 ¯ 1761 ई. में हैदरअली ने नंजराज को मैसूर से उखाड़ फेंका तथा अपनी प्रभुता स्थापित की। 
 ¯ उसने फ्रांसीसी विशेषज्ञों की मदद से डिंडिगुल में एक आधुनिक शिंगार का निर्माण करवाया। 
 ¯ इसने विद्रोही जमींदारों को शांत किया व बिदनूर, सुंडा, सेरा, कनारा और मालाबार के इलाकों को जीता। 
 ¯ 1769 ई. में उसने अंग्रेजों को हराया तथा मद्रास तक जा पहुंचा। 
 ¯ द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान 1782 में हैदराबाद में उसकी मृत्यु हो गई।
 ¯ अपने पिता की मृत्यु के बाद टीपू मैसूर का बादशाह बना। 
 ¯ वह एक कुशल प्रशासक एवं सेनापति था। 
 ¯ उसने आधुनिक कैलेन्डर को लागू किया, सिक्का ढलाई की नई तकनीक अपनाई व नाप-तौल के आधुनिक पैमाने अपनाए। 
 ¯ 1789 ई. की फ्रांसीसी क्रांति में भी उसने गहरी रुचि दिखाई तथा श्रीरंगपट्टनम् में ”स्वतंत्रता वृक्ष“ लगाया एवं फ्रांस के ”जैकोबिन क्लब“ का सदस्य बन गया। 
 ¯ उसने जागीरदारी पद्धति को समाप्त करने का प्रयास किया तथा भू-राजस्व उपज का एक-तिहाई तय किया। 
 ¯ 1786 ई. के बाद उसने एक आधुनिक नौसेना भी गठित करने का प्रयास किया। 
 ¯ अपने पिता की भांति उसने भी धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई तथा शृंगेरी के मन्दिर में देवी शारदा की प्रतिमा बनाने हेतु आर्थिक सहायता भी प्रदान की। 
 ¯ 1799 ई. में चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान अंग्रेजों से लड़ते हुए वह शहीद हो गया।
 ¯ मैसूर राज्य को मराठों, निजाम और अंग्रेजों ने आपस में बांट लिया। बचा हुए शेष भाग मैसूर के मृत राजा चामराज के अल्पवयस्क पुत्र को सौंप दिया गया। 
 ¯ 1831 ई. में लार्ड विलियम बेंटिक ने मैसूर को सीधे शासन में ले लिया। 
 ¯ 1881 ई. में पुनः लार्ड रिपन ने मैसूर को राजपरिवार के हवाले कर दिया।

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