वन (भाग - 1)- भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

भूगोल (Geography) for UPSC Prelims in Hindi

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वन, नवीकरण के योग्य संसाधन हैं और ये आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। पर्यावरण की गुणवत्ता सुधारने में भी वनों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। देश-भर में 794.42 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को वन के रूप में अधिसूचित किया गया है, जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 24.6 प्रतिशत वास्तविक वन क्षेत्र है। इसमें से सघन वन (क्राउन डेन्सिटी 40%) 12.05 प्रतिशत है, खुला वन (क्राउन डेन्सिटी 10.40 प्रतिशत) 46.32 प्रतिशत है और कच्छ वनस्पति क्षेत्र 0.8 प्रतिशत है।

वनों के प्रकार (Type of Forests)

स्वामित्व के आधार पर 

विभिन्न विशेषताओं के आधार पर वनस्पतिशास्त्रियों ने वनों का वर्गीकरण किया है।

  • राजकीय वन-पूर्णतः सरकारी नियन्त्राण वाले वन जो 757 लाख हेक्टेयर भूमि पर विस्तृत है जो कुल वनों का 96.11% है।

  • संस्थानीय वन-यह प्रायः स्थानीय नगरपालिकाओं एवं जिला परिषदों के नियंत्रण में है। इनका क्षेत्रफल केवल 24 लाख हेक्टेयर है जो कुल वनों का 2.68% है।

  • व्यक्तिगत वन-यह व्यक्तिगत लोगों के अधिकार में है। इसका क्षेत्रफल केवल 9 लाख हेक्टेयर है।

प्रशासनिक आधार पर

  • सुरक्षित वन-यह वन 83471 Kms भूमि में फैले है, तथा कुल वनों का 12.05% है। इन वनों को काटना और इनमें पशुओं को चराना मना है। भूमि के कटाव को रोकने, बाढ़ों को रोकने, मरुस्थल के प्रसार को रोकने और जलवायु व अन्य भौतिक कारणों से ऐसा किया गया है।

  • संरक्षित वन-यह वन 233 लाख हेक्टेयर भूमि अर्थात् कुल वनों के 31.2% भू-भाग पर विस्तृत है। इनमें लोगों को अपने पशुओं को चराने तथा लकड़ी काटने की सुविधा तो दी जाती है, किन्तु उन पर कड़ा नियंत्रण रखा जाता है ताकि वनों को नुकसान न पहुँचे और वन कहीं धीरे-धीरे समाप्त न हो जाये।

  • अवर्गीकृत वन-कुल वनों का 16% अर्थात् 119 लाख हेक्टेयर भू-भाग पर विस्तृत है। ये ऐसे वन है जिनका वर्गीकरण अभी तक नहीं किया गया है। इनमें लकड़ी काटने और पशुओं को चराने पर सरकार की ओर से कोई रोक नहीं है।

विदोहन (Exploitation)  के आधार पर

  • व्यवसाय के लिए उपलब्ध वन-इस प्रकार के वन 430 लाख हेक्टेयर भूमि पर फैले है। यह कुल वनों का 57.64ः है। इन वनों को काम में लाया जा रहा है।

  • सम्भावित उपलब्ध वन-ये वन भावी उपयोग के लिए सुरक्षित रखे गये है। इन वनों का विस्तार 163 लाख हेक्टेयर भूमि पर है जो कुल वनों का 21.85% है। इन वनों का क्षेत्र सरकार के द्वारा धीरे-धीरे बढ़ायी जा रही है।

  • अन्य वन-ये वन 153 लाख हेक्टेयर भूमि पर फैले है, जिनके उपयोग के लिए कोई नियन्त्राण नहीं है। इनमें अप्राप्य वन भी शामिल है। इस प्रकार के वन कुल वनों का 20.51ः है।

  • कोणधारी वन-48 लाख हेक्टेयर भूमि पर यह वन विस्तृत है जो कुल वनों का 6.43ः है। यह शीतोष्ण वन है।

  • चैड़ी पत्ती वाला वन-इन वृक्षों का कुल क्षेत्रफल 69.8 लाख हेक्टेयर है, अर्थात् कुल वनों का 93.57ः है। ये उष्ण कटिबंधीय वन है। इनमें मानसून वन सबसे अधिक है। साल, सागवान के वन अधिक महत्वपूर्ण है।

भौगोलिक आधार पर 

  • उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests)-इस प्रकार के वन उन प्रदेशों में पाये जाते है जहाँ वर्षा 200 से.मी. या उससे अधिक पड़ती है तथा आद्र्रता की मात्रा वर्षभर 70ः से अधिक पायी जाती है और तापमान 24॰C से अधिक रहता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, अ.डमान निकोबार, लक्षद्वीप समूह, पश्चिम बंगाल और असम में ऐसे वन पाये जाते है। ये सघन और सदैव हरे-भरे रहते है। वृक्षों की ऊँचाई 50 मी. तक पाई जाती है। यहाँ के महत्वपूर्ण वृक्ष रबर, महोगनी, एबोनी, नारियल, बाँस, सिनकोना, बेंत, ताड़, आइरन वुड है। वृक्षों के परस्पर मिले रूप में पाये जाने के कारण इन्हें काटना काफी असुविधाजनक होता है।

  • उष्ण कटिबंधीय पतझड़ वन (Tropical Deciduous Forests)-इस प्रकार के वन 100 से 200 से. मी. वर्षा वाले क्षेत्र में पाये जाते है। ये मानसून वन कहलाते है। ग्रीष्मकाल में ये अपनी पत्तियाँ गिरा देते है। ये वन पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, असम राज्यों में पाये जाते है। व्यावसायिक दृष्टि से इन वनों का काफी महत्व है। यह लगभग 7 लाख वर्ग कि. मी. में फैला है। इनका अधिकांश भाग सरकार द्वारा सुरक्षित है। इसमें साल और सागौन के वृक्ष काफी महत्वपूर्ण है। सागौन के वृक्ष महाराष्ट्र और कर्नाटक में सबसे अधिक पाये जाते है। अन्य प्रमुख वृक्ष शीशम, चन्दन, कुसुम, पलास, हल्दू, आँवला, शहतूत, बाँस, कत्था व पैडुक है। इन वनों से लकड़ी के साथ-साथ अनेक उपयोगी पदार्थ भी प्राप्त होते है-जैसे तेल, वार्निश, चमड़ा रंगने का पदार्थ इत्यादि।

  • उष्ण कटिबंधीय शुष्क वन (Tropical Dry Forests)-इस प्रकार के वन 50 से 100 से. मी. वर्षा वाले क्षेत्र में पाये जाते है। इन वृक्षों की लम्बाई 6 से 9 मीटर तक होती है तथा जडें़ काफी गहरी होती है। पूर्वी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वन उन भागों में पाये जाते हैं, जहाँ भूमि कुछ अनुपजाऊ होती है। दक्षिण भारत के शुष्क भागों में भी इस प्रकार के वन मिलते है। आम, महुआ, बरगद, शीशम, हल्दू, कीकर, बबूल इनके प्रमृख वृक्ष है। तराई प्रदेशों में सवाना प्रकार की घास उगती है, जिसे सवाई, मूँज, हाथी व काँस घास के नाम से जानते है।

  • मरुस्थलीय और अर्द्ध-मरुस्थलीय वन (Desert and SemiDesert Forests)-इस प्रकार के वन 50 से. मी. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलते है। ये वृक्ष छोटी-छोटी झाड़ियों के रूप में होते है। वृक्षों की जड़ें लंबी होती है। वर्षा की कमी के कारण वृक्षों में पत्तियाँ छोटी और काँटेदार होती है। इनका प्रमुख वृक्ष बबूल है। इसके अलावा खेजड़ा, खैर, खजूर, रामबाँस, नागफनी भी प्रमुख वृक्ष है। ये वन दक्षिण-पश्चिम, हरियाणा, पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात तथा कर्नाटक के वृष्टिछाया प्रदेश में पाये जाते है।

  • पर्वतीय वन (Mountain Forests)-ये वन ऊँचाई और वर्षा के अनुसार उपोष्ण प्रादेशीय और शीतोष्ण प्रादेशीय प्रकार के होते है। पूर्वी हिमालय में पश्चिमी हिमालय की अपेक्षा वर्षा अधिक होती है। दोनों प्रकार की वनस्पतियों में भिन्नता पाई जाती है। पूर्वी हिमालय में दालचीनी, अमूरा, साल, ओक, लारेल, मेपिल, एलडर, बर्च, सिल्वर फर, पाइन, स्प्रूस और जूनीपन आदि वृक्ष प्रमुख है। वहीं पश्चिमी हिमालय में साल, सेमल, ढाक, शीशम, जामुन, बेर, चीड़, देवदार, नीला पाइन, एल्ब आर्मद वृक्ष महत्वपूर्ण है।

  • अल्पाइन वन (Alpine Forests)-इस प्रकार के वन हिमालय पर्वत पर 2400 मीटर से अधिक ऊँचाई पर मिलते है। यह पूर्णतया कोणधारी वृक्ष हैं। इसका विस्तार 2400 से 3600 मीटर के बीच की ऊँचाई में मिलता है। इसमें ओक, मेपिल, सिल्वर फर, पाइन, जूनीपर प्रमुख वृक्ष है। जहाँ पर घास व फल वाले पौधे भी उगते है। हिमालय के पूर्वी भागों में इनका अधिक विस्तार पाया जाता है। 3600 मीटर से 4800 मीटर की ऊँचाई तक टुंड्रा प्रकार की वनस्पति मिलती है, अर्थात् छोटी झाड़ियाँ व काई उत्पन्न होती है। 4800 मीटर से ऊपर वनस्पति के कोई चिन्ह नहीं मिलते, क्योंकि यहाँ हर समय बर्फ जमी रहती है। हिमालय पर 4800 मीटर ऊँचाई की सीमा को हिम रेखा कहते है।

  • ज्वारीय वन (Tidal Forests)-गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा नदियों के डेल्टा प्रदेश में मैनग्रोव व सुन्दरी वृक्ष मिलते है। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा के वनों को सुन्दर वन कहते है क्योंकि यहाँ का प्रधान वृक्ष सुन्दरी है।

  • समुद्र तटीय वन (Coastal For ests)-जहाँ समुद्री तट पर रेतीला किनारा मिलता है, वहाँ इस प्रकार के वन पाये जाते है। इनमें बहुधा केसूरिना वृक्ष उत्पन्न होते है। कहीं-कहीं पतझड़ की किस्म वाले वन तथा सदाबहार वन भी मिलते है। ताड़ व नारियल यहाँ के प्रमुख वृक्ष है।

  • नदी तट के वन (Riverine Forests)-यह वन विशाल मैदान की नदियों के किनारे खादर प्रदेशों में पाये जाते है। प्रमुख वृक्ष खैर, झाऊ तथा इमली है।

वनो का वितरण

भारत के सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्रफल में से 792.42 लाख हेक्टेयर भूमि पर वन-सम्पदा फैली है। इनका भौगोलिक वितरण बहुत असमान्य है। सरकारी अनुमानों के अनुसार भारत में केवल 24.16% भू-भाग पर ही वन पाये जाते है। यह प्रतिशत विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा बहुत कम है।

  • ‘राष्ट्रीय वन’ नीति द्वारा यह निश्चित किया गया है कि वनों का प्रतिशत 33.3 कर दिया जाय। इस दिशा में प्रयास जारी है। हाल ही में उपग्रह के चित्रा से यह पता चला है कि देश की कुल भूमि के केवल 10% भू-भाग पर अच्छे वन पाये जाते है। सरकारी आंकड़े के 794.42 लाख हेक्टेयर वन में केवल 300 लाख हेक्टेयर पर ही वास्तविक वन है।

  • देश के कुल वनों का 11.24% भाग अकेले मध्य प्रदेश में पाया जाता है, इसके बाद महाराष्ट्र और आन्ध्र प्रदेश राज्यों का स्थान आता है। वास्तव में पठारी राज्यों में देश के कुल वनों का 60% से अधिक भाग पड़ता है। इसके बाद उत्तरी-पूर्वी राज्यों का स्थान आता है। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे मैदानी राज्य देश के केवल 16% वन रखते है।

  • भारत में प्रति व्यक्ति वनों का औसत केवल 0.2 हेक्टेयर है जबकि ब्राजील में यह 8.6 हेक्टेयर, आस्ट्रेलिया में 5.1 हेक्टेयर, स्वीडन में 3.2 हेक्टेयर तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में 1.8 हेक्टेयर है।

  • ‘राष्ट्रीय वन नीति’ के अनुसार वास्तविक रूप से हिमालय पर्वत और दक्षिणी पठार एवं पहाड़ी क्षेत्रों की कुल भूमि के 60% भू-भाग पर तथा मैदानों की 20% भूमि पर वनों का विस्तार होना चाहिए। जनसंख्या के बढ़ते हुए भार और ईंधन की माँग के कारण नदी-तटों तथा अन्य अनुपजाऊ क्षेत्रों में भी वन प्रदेशों का विस्तार आवश्यक माना गया है।

वन नीति और कानून

  • भारत उन कुछ देशों में से है जहां 1984 से ही वन नीति लागू है। इसे 1952 और 1988 में संशोधित किया गया। संशोधित वन नीति, 1988 का मुख्य आधार वनों की सुरक्षा, संरक्षण और विकास है। इसके मुख्य लक्ष्य हैं-
    (i) पारिस्थितिकीय संतुलन के संरक्षण और पुनःस्थापन द्वारा पर्यावरण स्थायित्व को बनाए रखना,
    (ii) प्राकृतिक संपदा का संरक्षण,
    (iii) नदियों, झीलों और जलधाराओं के आवाजाही के क्षेत्र में भूमि कटाव और मृदा अपरोदन पर नियंत्रण,
    (iv) राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में तथा तटवर्ती क्षेत्रों में रेत के टीलों के विस्तार को रोकना,
    (v) व्यापक वृक्षारोपण और सामाजिक वानिकी कार्यक्रमों के जरिए वन और वृक्ष के आच्छादन में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी, 
    (vi) ग्रामीण और आदिवासी जनसंख्या के लिए ईंधन की लकड़ी, चारा तथा अन्य छोटी-मोटी वन-उपज आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कदम उठाना,
    (vii) राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वन-उत्पादों में वृद्धि,
    (viii) वन-उत्पादनों के सही उपयोग को बढ़ावा देना और लकड़ी का अनुकूल विकल्प खोजना, और
    (ix) इन उद्देश्यों की प्राप्ति और मौजूदा वनों पर पड़ रहे दबाव को न्यूनतम करने हेतु जन साधारण, विशेषकर महिलाओं का अधिकतम सहयोग हासिल करना।

  • वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के प्रावधानों के अंतर्गत वन भूमि को गैर-वन भूमि में बदले जाने से पूर्व केंद्र सरकार की अनुमति की आवश्यकता होती है। इस अधिनियम को लागू किए जाने के बाद से वन-भूमि के अपवर्तन की दर घटकर वर्ष 1980 के पहले 1.43 लाख हेक्टेयर प्रतिवर्ष के मुकाबले लगभग 25ए000 हेक्टेयर प्रतिवर्ष हो गई है। 1988 के दौरान, विभिन्न राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों से प्राप्त 851 से अधिक प्रस्तावों को इस अधिनियम के तहत जांचा जा चुका है।

  • ‘नष्ट वनों को उपभोग के आधार पर पुनर्जीवित करने के लिए जनजातियों और ग्रामीण निर्धन वर्ग का संगठन’ नामक योजनादेश के नौ राज्यों में लागू की जा रही है। वन क्षेत्र में वृद्धि के अलावा, इस योजना का उद्देश्य आदिवासी लोगों को रोजगार और फलोपभोग की सुविधाएं मुहैया करवाने का है। देश के 21 राज्यों में संयुक्त वन प्रबंधन व्यवस्था अमल में लाई जा रही है। देश के नष्ट हुए वनों के 70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र का लगभग 35ए000 ग्रामीण वन सुरक्षा समितियों द्वारा रख-रखाव और संरक्षण किया जा रहा है। 

वन अग्नि नियंत्रण

देश में आग लगने के कारणों का पता लगाने, रोकथाम और विरोध करने के लिए चंद्रपुर (महाराष्ट्र) और हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तर प्रदेश) में यू. एन. डी. पी. के सहयोग से एक आधुनिक वन अग्नि नियंत्रण परियोजना शुरू की गई है। वर्तमान में यह देश के 14 राज्यों में चलाई जा रही है। राज्य सरकारों को हाथ के औजारों, अग्नि प्रतिरोधी वस्त्रों, वायरलेस संचार तंत्रा, अग्नि खोजी औजारों, निगरानी स्तंभों के निर्माण, फायर-लाइन्स की स्थापना आदि के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है।

वन्य जीवन

  • भारतीय वन्य जीवन बोर्ड, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं, वन्य जीवन संरक्षण की अनेक परियोजनाओं के अमलीकरण की निगरानी और निर्देशन करने वाला शीर्ष सलाहकार संघ है।

  • इस समय संरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत 84 राष्ट्रीय उद्यान और 447 अभयार.य आते हैं, जो देश के सकल भौगोलिक क्षेत्र का 45% हैं।

  • वन्य जीवन (सुरक्षा), अधिनियम, 1972 जम्मू और कश्मीर को छोड़कर (इसका अपना अलग अधिनियम है), शेष सभी राज्यों में स्वीकार किया जा चुका है।

  • दुर्लभ और खत्म होती जा रही प्रजातियों के व्यापार पर इस अधिनियम ने रोक लगा दी है। 

  • वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम, 1972 तथा अन्य कानूनों की समीक्षा के लिए अंतर्राज्यीय समिति गठित की गई है।

  • जंगल की लुप्त होती जा रही जीव व वनस्पतियों की प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर आयोजित सम्मेलन में हुए समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में भारत भी एक है।

  • अप्रैल 1973 में शुरू की गई बाघ परियोजना के तहत 25 बाघ अभयार.य बनाए गए हैं। ये अभयार.य देश के 14 राज्यों में लगभग 33,875 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले हुए हैं। इन 14 राज्यों द्वारा अब बाघों की संख्या 3,891 बताई गई है।

घटता वन क्षेत्र और पर्यावरण

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ‘जनसंख्या और वन% भारत पर रिपोर्ट -2000` जारी कर जो आंकड़े प्रस्तुत किए हैं उनका विश्लेषण बहुत सावधानी से करना होगा ताकि पर्यावरण की सुरक्षा और आर्थिक विकास की नीतियों के बीच समुचित संतुलन स्थापित किया जा सके। इन आंकड़ों के अनुसार बीसवीं शताब्दी के प्रांरभ में भारत का वन-क्षेत्र कुल भूमि-क्षेत्र का 40 प्रतिशत था जो घट कर 1951 में केवल 22 प्रतिशत रह गया। इसका अर्थ यह हुआ कि स्वतंत्राता से पहले वन-क्षेत्रों का दोहन और विनाश अधिक तेजी से हुआ और इस कारण वन-क्षेत्र 45 प्रतिशत घट गया। आजादी के बाद भी वन-क्षेत्र यद्यपि घटा है लेकिन पिछले पचास सालों में हमारे वन-क्षेत्र के घटने की दर 12.5 प्रतिशत रही है। यह आजादी से पहले के 45 प्रतिशत की तुलना में काफी कम है और यह एक ऐसी कसौटी है जिसके आधार पर हमें पर्यावरण सुरक्षा और आर्थिक विकास की नीतियों का निर्धारण करना होगा।

आजादी से पहले वन-क्षेत्र के तेजी से दोहन और विनाश के कई कारण हैं। विदेशी शासक को इस बात की कतई चिंता नहीं थी। उसका सारा ध्यान भारत से कच्चा माल अपने देश भेजने पर लगा था। वनों की रक्षा तथा वृक्षारोपण की आवश्यकता तो हमें स्वाधीनता के बाद ही महसूस हुई है। इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि वृक्षारोपण कार्यक्रम और वनों की सुरक्षा के लिए किए गए प्रयासों के फलस्वरूप हम वनों के विनाश की रफ्तार कुछ धीमी करने में सफल रहे हैं। इस सफलता को आजादी के बाद तेजी से बदलते परिप्रेक्ष्य में भी देखना आवश्यक है। 1951 से 2000 के बीच भारत की जनसंख्या में 2.8 गुना वृद्धि हुई है और इसका बहुत भारी दबाव हमारे वन-क्षेत्रों पर भी पड़ा है। इमारतों और ईंधन के लिए लकड़ी की मांग में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। वन-क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं की स्थापना के कारण भी पर्यावरण को क्षति हुई है। ठेकेदारों और सरकारी कर्मचारियों के बीच मिलीभगत और भ्रष्टाचार ने भी वनों पर कुठाराघात किया है। वन-क्षेत्रों में इस कमी के कारण पर्यावरण की स्थिति चिंताजनक हो गई है और इस कारण वृक्षारोपण और वन्यीकरण की दिशा में युद्धस्तर पर काम करने की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है। सरकार को अधिक सक्रिय होकर ऐसी दूरगामी नीतियां और कार्यक्रम बनाने होंगे जिनसे ईंधन, इमारती लकड़ी और पशुओं के चारे के लिए वनों की अनावश्यकता कटाई रोकी जा सके। इसके साथ ही आम आदमी में यह आत्मविश्वास पैदा करना होगा कि वृक्षों की रक्षा के लिए उसका छोटा-सा भी प्रयास पर्यावरण की रक्षा करने में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।
वन-क्षेत्र को बचाने और बढ़ाने के साथ वनों की गुणवत्ता बढ़ाना भी जरूरी है। भारत में पहले वनों की सघनता अधिक थी और इस कारण वन्य वस्तुओं का उत्पादन भी अधिक था। लेकिन इधर वनों की सघनता घटने के कारण उत्पादन में बहुत कमी आई है। हमारा वृक्षारोपण कार्यक्रम इस दृष्टि से कमजोर रहा है कि हम वनों को अपने आर्थिक विकास का आधार बनाने में विफल रहे हैं। चीन अपनी परंपरागत जड़ी-बूटियों के निर्यात से विपुल विदेशी मुद्रा कमा रहा है, लेकिन हम इस मामले में बहुत पिछड़े हुए हैं। वृक्षारोपण के नाम पर ऐसे अनेक वृक्ष बड़े पैमाने पर लगाए गए जो बहु उपयोगी नहीं हैं। भारत चाहे तो अपनी प्राकृतिक संपदा को अब भी अपनी समृद्धि का आधार बना सकता है।

 

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