व्यापार, उद्योग और भारतीय धन का बहिर्गमन - अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव, इतिहास, यूपीएससी UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : व्यापार, उद्योग और भारतीय धन का बहिर्गमन - अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव, इतिहास, यूपीएससी UPSC Notes | EduRev

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व्यापार, उद्योग और भारतीय धन का बहिर्गमन

व्यापार और उद्योग
 ¯ भारत के आर्थिक इतिहास में पलासी का युद्ध एक युगान्तरकारी घटना है। भारत पर विदेशी आधिपत्य ने भारतीय अर्थव्यवस्था को उपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तित कर दिया। 
 ¯ विदेशी शासन का भारतीय व्यापार और उद्योग पर विनाशकारी असर हुआ। ईस्ट इंडिया कम्पनी की नीतियों और इसके पदाधिकारियों में फैले भ्रष्टाचार के कारण इस देश में, विशेषकर बंगाल में, व्यापार और उद्योग को गहरा धक्का लगा।
 ¯ अट्ठारहवीं शताब्दी के अंत तक भारत के बहुत बड़े भू-भाग पर ब्रिटिश शासन दृढ़ता से कायम हो चुका था। इस तरह यह ब्रिटेन का एक उपनिवेश हो गया जिसे साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति के लिए विकसित करना जरूरी था। 
 ¯ ब्रितानी उत्पादकों का स्वार्थ भारतीय विकास की प्रक्रिया में बहुत बड़ी बाधा के रूप में उभरा। 
 ¯ ब्रिटेन के लिए यह जरूरी था कि भारत में ब्रितानी उत्पादनों की खपत बढ़े तथा भारत से ब्रिटिश उद्योगों और इसके निवासियों की आवश्यकता के अनुरूप कच्चा माल और खाद्य सामग्री निर्यात किया जाए। 
 ¯ इस नीति के कारण आर्थिक विकास नहीं हो सका और आर्थिक गतिहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गई। 
 ¯ विदेशी प्रतिद्वंद्विता और सरकारी संरक्षण के अभाव में कुटीर उद्योग और लघु उद्योगों, जिन पर सतरहवीं शताब्दी और अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में देश को नाज था, का ह्रनास हो गया।
 ¯ कम्पनी का मुनाफा बढ़ाने के लिए उसके एजेन्टों ने कपड़ा तथा अन्य वस्तुओं के भारतीय उत्पादकों को मजबूर किया कि वे उनसे बाजार भाव से 20 से 40 प्रतिशत तक कम कीमत लें और इसकी अवहेलना या विरोध करने वालों के खिलाफ बल-प्रयोग किया गया। 
 ¯ अनेक बुनकरों के नाम कम्पनी के बही में लिख लिए गए और उनके द्वारा किसी दूसरे के लिए काम करने पर पाबंदी लगा दी गई। 
 ¯ कम्पनी के अफसर दक्कन से थोक में कपास खरीदते थे और उसे ऊँची कीमतों पर बंगाल के बुनकरों को बेचते थे। 
 ¯ इन सब कारणों से बुनकर सम्प्रदाय दरिद्र हो गया और सूती कपड़ा-उद्योग चैपट हो गया। 
 ¯ ब्रिटेन द्वारा मशीन-निर्मित सस्ते माल की भारत में बहुलता से भी भारत के शहरी हस्तशिल्प उद्योगों का तेजी से पतन हो गया। 
 ¯ 1813 ई. में अंग्रेजों ने भारत पर एक- पक्षीय स्वतंत्र व्यापार की नीति आरोपित कर दी। 
 ¯ इंग्लैंड से भारत आने वाली वस्तुओं पर चुंगी नहीं लगती थी। 
 ¯ दूसरी ओर, भारत से इंग्लैंड पहुँचने वाली वस्तुओं पर वहाँ ऊँची चुंगी लगती थी। 
 ¯ इन नीतियों के कारण 1820 ई. के बाद भारत में ब्रिटिश माल की बाढ़ आ गई और भारतीय उत्पादकों के लिए यूरोपीय बाजार का द्वार बंद हो गया। 
 ¯ भारत से कच्चा माल ब्रिटेन जाने लगा तथा वहाँ से मशीनोत्पादित सामग्री यहाँ के बाजारों में भर दी गई। 
 ¯ भारतीय देशी रियासतों के नरेशों की हीनता एवं पराभव ने बचे-खुचे काश्तकारों की रोजी-रोटी छीन ली तथा भारत औद्योगिक ब्रिटेन का कृषि-जनित उत्पादन उपनिवेश मात्र बन कर रह गया।

संचार साधन
 ¯ ब्रिटेन के हित में भारत के आर्थिक शोषण को तीव्र बनाने के लिए परिवहन और संचार के साधनों में सुधार करना आवश्यक था। 
 ¯ 1857 के विद्रोह से भी अंग्रेजों ने सीखा कि भारत पर अपना शासन कायम रखने के लिए उन्हें संचार-साधनों का विस्तार और विकास करना होगा। 
 ¯ अतः उन्नीसवीं सदी के मध्य से परिवहन और संचार के साधनों को उन्नत बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया।
 ¯ रेलवे के विकास से भारत की परिवहन व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। 
 ¯ पहली रेलवे लाइन 1853 ई. में बम्बई और थाने के बीच बनी। 
 ¯ अगले वर्ष कलकत्ता को रेलमार्ग से बंगाल के पश्चिमी क्षेत्र की कोयला-खानों के साथ जोड़ा गया। 
 ¯ 1856 ई. में मद्रास को आर्कोनम् के साथ जोड़ा गया। 
 ¯ भारत में रेलवे के निर्माण और विस्तार में ब्रिटिश व्यापारियों और ठेकेदारों ने भारी मुनाफा कमाया।
 ¯ शुरू के वर्षों में रेलवे विभाग ने बड़ी लाइनों के निर्माण पर ही अधिक जोर दिया। 
 ¯ बम्बई, मद्रास और कलकत्ता जैसे बड़े बंदरगाहों को देश के भीतरी भागों के महत्त्वपूर्ण शहरों और कृषि-क्षेत्रों के साथ जोड़ा गया। 
  ¯ रेलवे लाइनों के निर्माण का मुख्य उद्देश्य था बंदरगाहों को देश के भीतरी क्षेत्रों से जोड़ना जो अंग्रेजों के आर्थिक हितों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण थे। 
 ¯ देश के उन विभिन्न भागों को आपस में जोड़ने पर बहुत कम ध्यान दिया गया जिनसे देश के एक भाग में निर्मित वस्तुओं को दूसरे भागों में पहुँचाने में सुविधा होती। 
 ¯ रेलवे ने मालभाड़े के बारे में जो नीति अपनाई, उससे भी अंग्रेजों की नियत स्पष्ट होती है। 
 ¯ देश के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान तक रेलवे से माल पहुँचाने में ज्यादा भाड़ा लगता था, मगर बंदरगाहों से माल को देश के अन्य भागों में पहुँचाने में कम भाड़ा लगता था।
 ¯ जो क्षेत्र प्रतिरक्षा की दृष्टि से महत्त्व के थे, उन्हें फौजों को स्थानान्तरित करने के लिए आपस में जोड़ दिया गया। 
 ¯ रेलवे पर प्रमुखतः सरकार का स्वामित्व था, परंतु उनका प्रबंध ब्रिटिश कम्पनियों के हाथों में था। 
 ¯ इस स्थिति में 1947 ई. तक कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ, हालाँकि उस समय तक देश में करीब 70,000 किलोमीटर लम्बी रेलवे लाइनें बन चुकी थीं और दुनिया का सबसे बड़ा रेलवे-जाल भारत में ही था।

भारत में आधुनिक उद्योग
 ¯ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में कुछ आधुनिक उद्योग अस्तित्व में आए। ये दो प्रकार के थे - बगान-उद्योग और मशीन-उद्योग। 
 ¯ इन उद्योगों पर प्रमुखतः ब्रिटिश कम्पनियों का स्वामित्व व नियंत्रण था। 
 ¯ भारतीय भी कुछ उद्योगों के मालिक थे, मगर सरकारी सहयोग न मिलने के कारण भारतीयों के इन उद्योगों का तेजी से विकास न हो सका। 
 ¯ औद्योगिक विकास के प्रारम्भिक दौर में हर देश को विदेशी प्रतियोगिता से अपने को बचाने के लिए ‘संरक्षण’ की नीति अपनानी पड़ती है। 
 ¯ परंतु भारत की ब्रिटिश सरकार ने लम्बे समय तक इस तरह की कोई कार्रवाई नहीं की, क्योंकि उससे इंग्लैंड के हितों को हानि पहुँचती।
 ¯ यूरोपियों ने जिन क्षेत्रों में भारतीय òोतों का सबसे ज्यादा लाभ उठाया उनमें से एक था बागान उद्योग। इसकी शुरुआत अठारहवीं सदी के अंतिम वर्षों में नील से रंग तैयार करने के साथ हुई। 
 ¯ बिहार और बंगाल के कुछ खास जिलों में नील की खेती की जाती थी। 
 ¯ भारत से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में 1850 ई. तक नील एक प्रमुख चीज हो गई। मगर उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में नील की मांग घटती गई, क्योंकि तब सस्ते और अधिक टिकाऊ कृत्रिम रंगों का उत्पादन शुरू हो गया।
 ¯ चाय बागान उद्योग, जिसकी स्थापना उन्नीसवीं सदी के मध्यकाल में हुई, जल्दी ही भारत का सबसे बड़ा बागान उद्योग बन गया। 
 ¯ अधिकांश चाय बागान असम, बंगाल और दक्षिण भारत में थे। 
 ¯ धीरे-धीरे चाय का उत्पादन बढ़ता गया और बीसवीं सदी के आरम्भिक वर्षों में संसार के चाय बाजार में भारत का स्थान प्रथम हो गया। 
 ¯ 1940 ई. तक भारत में उत्पादित चाय का अस्सी प्रतिशत निर्यात होने लगा और इंग्लैड इसके लिए सबसे बड़ा बाजार बन गया। 
 ¯ बागान उद्योग की अन्य महत्त्वपूर्ण चीजें थी काँफी, रबर और सिनकोना। 
 ¯ भारत में अंग्रेजी राज की समाप्ति तक इन बागान उद्योगों पर ब्रिटिश पूँजी का एकाधिकार बना रहा।
 ¯ 1840 एवं 1850 के दशक में सूती वó, जूट एवं कोयला उत्पादन में मशीनरी का उपयोग होने लगा। 
 ¯ सूती कपड़ा की पहली मिल 1853 ई. में बम्बई प्रेसिडेन्सी के बड़ौच नामक स्थान पर कवासजी नानाभाई द्वारा शुरू की गई।

अकाल का वर्ष    अकाल से प्रभावित क्षेत्र
 1860.61    पंजाब, राजपूताना, उत्तर-पश्चिम प्रांत   एवं कच्छ
 1866.67    बंगाल, बिहार, उड़ीसा
 1868.69    उत्तर प्रदेश, राजपूताना, पंजाब
 1873.74    बिहार, बंगाल, बुन्देलखण्ड
 1876.77    मद्रास, बम्बई, मैसूर, हैदराबाद
 1877.78    पंजाब, कश्मीर, उ. प. प्रांत
 1988.89    उड़ीसा, गंजाम
 1890.92    पंजाब
 1896.97    अवध, बंगाल, मद्रास, पंजाब, उत्तर    पश्चिम प्रांत, बम्बई
 1899.1900    बरार, बम्बई, पंजाब, अजमेर, मध्य   प्रांत
 1905.06    बम्बई
 1906.07    उत्तर बिहार
 1907.08    उत्तर पश्चिम प्रांत, मध्य प्रांत, बंगाल,    मद्रास, बम्बई

¯ उसके बाद भारतीय सूती कपड़ा उद्योग लगातार प्रगति करता रहा। इस प्रगति में थोड़ी बाधा तब पड़ी जब इंग्लैड में कपास की मांग बढ़ जाने से इसकी कीमत में थोड़ी वृद्धि हो गई थी। 
 ¯ प्रथम महायुद्ध आरम्भ होने के पहले सूती कपड़े का उत्पादन करने वाले देशों में भारत का चैथा स्थान था। 
 ¯ भारतीय सूती कपड़ा उद्योग ने पहले अंग्रेजी कपड़ा उद्योग का और बाद में जापानी कपड़ा उद्योग का सफलतापूर्वक सामना किया। 
 ¯ ज्यादातर कपड़ा मिलें बम्बई, अहमदाबाद और मद्रास में थी। 
 ¯ सूती कपड़ा मिलों का स्वामित्व और नियंत्रण मुख्यतः भारतीयों के हाथ में था।
 ¯ अधिकांश जूट मिलें अंग्रेजों के अधिकार में थी। आरम्भ मेंüजूट उद्योग बंगाल का एक कुटीर उद्योग था। 
 ¯ 1855 ई. में जाॅर्ज आकलैंड ने पहला जूट कताई कारखाना बंगाल के रिसरा नामक स्थान पर स्थापित किया।
 ¯ प्रारंभ में भारतीय जूट-उद्योग को डंडी (स्काटलैंड) की जूट मिलों की कड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ा। 
 ¯ परंतु उन्नीसवीं सदी के अंतिम चरण से भारतीय जूट-उद्योग का विश्व बाजार में लगभग एकाधिकार स्थापित हो गया।
 ¯ भारत की कोयला खानों में 1845 ई. में काम शुरू हुआ था। 
 ¯ रेलवे के विस्तार और उद्योगों के विकास के साथ कोयले की मांग बढ़ती गई। 
 ¯ भारत में आधुनिक तरीके से लौहगलन की शुरुआत 1874 ई. में हुई। किन्तु भारत में लोहा और इस्पात उद्योग की वास्तविक शुरुआत तब हुई जब 1907 ई. में जमशेदपुर में प्रसिद्ध ‘टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी’ की स्थापना हुई। 

स्मरणीय तथ्य
 ¯    दीनबंधु मित्र ने अपने नाटक ‘नील दर्पण’ में नील की खेती करने वाले कृषकों की आर्थिक दुर्दशा को चित्रित किया है। ताराशंकर बन्दोपाध्याय ने गणदेवता में पश्चिमी बंगाल में 1920 तथा 1930 के दशकों के ग्रामीण जीवन का चित्रण किया है। इसके द्वारा ‘जजमानी पद्धति’ (जिसके अन्तर्गत फसल में हिस्से की कीमत पर कारीगर किसानों को जरूरी वस्तु मुहैया कराते थे) के पतन को दर्शाया गया है।
 ¯    ‘जोतेदार’ बंगाल के सम्पन्न किसान होते थे।
 ¯    ‘बरगादार’ बंगाल में बटाईदारों को कहा जाता था।
 ¯    1901 ई. में कृषक मजदूरों की संख्या 5 करोड़ 24 लाख आंकी गई थी।
 ¯    कुछ परीक्षणात्मक खेतों तथा 1870 के दशक के ‘तकावी’ ऋणों को छोड़कर सरकार द्वारा खेती के विकास के लिए प्रत्यक्ष रूप में कुछ नहीं किया गया।
 ¯    1831 में ‘हाउस आॅफ कामन्स’ के सेलेक्ट कमिटी के सामने राजा राममोहन राय ने दोहन की समस्या का हल भारत के ‘औपनिवेशीकरण’ के रूप में प्रस्तुत किया क्योंकि उस स्थिति में भारत में अधिकारियों द्वारा अर्जित धन का निर्गमन भारत से नहीं होता।
 ¯    अनौद्यिोगिकीकरण का एक प्रारंभिक आलोचक ‘भोलानाथ चन्द्रा’ नामक बंगाली था जिसने अंग्रेजी सामानों के ‘बहिष्कार’ के रूप में इसका हल बताया।
 ¯    एम. सी. रानाडे ने यह आशा प्रकट की थी कि औद्योगीकरण जल्द ही सम्पूर्ण राष्ट्र की चेतना बन जायेगी एवं इस पुरातन राष्ट्र में आधुनिकता स्थायी रूप से स्थापित हो पाएगी।
 ¯    ‘आर्थिक दोहन’ संकल्पना पर आधारित तर्कों ने प्रारंभिक उदारवादी कांग्रेसी नेताओं की गतिविधियों व मांगों को सैद्धान्तिक आधार प्रदान किया।
 ¯    अंग्रेजों ने भारतीय कृषि उत्पादों जैसे नील, कपास, जूट तथा तेलहन के महत्व को 18वीं शताब्दी के अंत होते-होते समझा। 1833 में इस दिशा में कदम तब उठाया गया जब बंगाल में जूट की खेती को निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया गया।
 ¯    1855.56 का संथाल विद्रोह जिसमें सैकड़ों किसान देश की बागडोर संभालने उठ खड़े हुए तथा 1875 के दक्कनी दंगाü जिसमü किसान कई जगह अचानक उठ खड़े हुए तथा महाजनों को लूटना प्रारम्भ कर दिया, किसानों का महाजनों के विरुद्ध द्वेष का प्रतीक था।
 ¯    1900 में भूमि हस्तांतरण अधिनियम, पंजाब के द्वारा कृषिकेत्तर वर्ग द्वारा कृषकों से जमीन खरीदने अथवा 20 से अधिक वर्षों तक उसे गिरवी रखने पर रोक लगा दिया गया।


¯ 1911 ई. में इस कारखाने में काम शुरू हो गया, जबकि इस्पात का उत्पादन सर्वप्रथम 1913 ई. में संभव हो सका। 
 ¯ तत्पश्चात् बंगाल और मैसूर में भी लोहे के छोटे कारखाने स्थापित हुए। 
 ¯ भारत में लौह और इस्पात उद्योग की स्थापना प्रमुख रूप से भारतीय पूँजी, कौशल तथा उद्यम के द्वारा स्थापित हुई थी।
 ¯ स्वदेशी आन्दोलन, जिसकी शुरुआत 1905 ई. में हुई, और दो महायुद्धों की आवश्यकताओं ने भारत में आधुनिक उद्योगों के विकास के लिए बेहतर अवसर प्रदान किए। 
 ¯ 1919 ई. में भारत को ‘राजकोषीय स्वायत्तता’ प्रदान की गई। 
 ¯ सर इब्राहीम रहीमतुल्ला की अध्यक्षता में अक्टूबर, 1921 में राजकोषीय आयोग की स्थापना की गई। 
 ¯ इस आयोग ने ‘विभेदकारी संरक्षण’ की सिफारिश की जिसके तहत उन भारतीय उद्योगों को संरक्षण देने की बात कही गई जो आयोग द्वारा निर्धारित कुछ खास शर्तों को पूरा करते थे। 
 ¯ सरकार ने आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया तथा वर्तमान सदी के तीसरे दशक में कुछ उद्योगों को संरक्षण प्राप्त हुआ। ये उद्योग थे - लोहा और इस्पात, सूती वó, कागज, दियासलाई, चीनी तथा भारी रसायन उद्योग।
 ¯ परिणामस्वरूप औद्योगिक उत्पादन बढ़ा और कई नए उद्योगों का विकास हुआ। 
 ¯ रसायन उद्योगों में कोई खास प्रगति नहीं हुई। 
 ¯ सीमेंट उद्योग का विकास 1930 ई. से होने लगा। 
 ¯ भारतीय स्वामित्व वाला एक प्रमुख प्रयास था चीनी उद्योग, जिसका 1930 ई. के बाद तेजी से विकास हुआ। 
 ¯ मशीन-निर्माण के उद्योगों में बहुत कम प्रगति हुई। इस उद्योग का विकास न होने के कारण विभिन्न उद्योगों के लिए आवश्यक मशीनें बाहर से आयात करनी पड़ती थी।

भारतीय धन का बहिर्गमन
 ¯ समूची उन्नीसवीं सदी में भारत का विदेश व्यापार मुख्य रूप से इंग्लैंड के साथ ही था। 
 ¯ बीसवीं सदी में अमेरिका, जापान, जर्मनी और कुछ अन्य देशों के साथ भी व्यापार सम्बन्ध स्थापित हुए। इन देशों के साथ व्यापार में वृद्धि होती गई। 

स्मरणीय तथ्य
 ¯    दक्कन कृषक सहायता अधिनियम, 1879 के अन्तर्गत महाजनों द्वारा खाता दिखाना तथा रसीद देना अनिवार्य कर दिया गया।
 ¯    1833 के भूमि सुधार अधिनियम के तहत भूमि के विकास के लिए ‘तकावी’ ऋण की व्यवस्था की गई।
 ¯    1844 में कृषक ऋण अधिनियम पास किया गया जिसके द्वारा किसानों को बीज, जानवर, खाद तथा मशीन खरीदने के लिए ऋण की व्यवस्था की गई।
 ¯    1904 में सरकार ने सहकारी समितियों को कृषि ऋण की सहूलियत प्रदान की।
 ¯    विदेशियों द्वारा की जाने वाली रोपण कृषि में काम करने वाले भूमिहीन किसानों को रजनी पाम दत्त ने रोपण-दास (पौध-दास) कहा है।
 ¯    1834 में विलियम वेंटिक ने लिखा, ”वाणिज्यिक इतिहास में दुर्दशा का दूसरा समानांतर उदाहरण नहीं मिलता। सूती वó के बुनकरों की हड्डियों से भारतीय भूमि की सफाई की जा रही है“।
 ¯    अपनी पुस्तक ‘पाॅवर्टी एण्ड अन-ब्रिटिश रुल इन इंण्डिया’ में दादा भाई नौरोजी द्वारा दोहन की गहराई के संख्यात्मक गणना की चेष्टा की गई है तथा यह दिखाया गया है कि भारत की गरीबी का ‘आर्थिक दोहन’ से सीधा संबंध था।
 ¯    ”यह आर्थिक नियमों की निष्ठुर प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश नीतियों के अनौपचारिक व निष्ठुर कार्यों का परिणाम था; यह भारत में भारत की संपत्ति का निष्ठुर उदरस्थानान्तरण तथा इंग्लैंड के लिए किये जा रहे निष्ठुर दोहन का परिणाम था। संक्षेप में, यह मृत्यु शैय्या पर पड़े भारत का आर्थिक नियमों के विकृतिकरण द्वारा भारतीय रक्त के निष्ठुर दोहन का परिणाम था।“ - दादा भाई नौरोजी
 ¯    गृह-खर्च (होम चार्जेज) इंग्लैंड में किए जा रहे उस भुगतान को कहते थे जो उसे भारत में सेवाएü प्रदान करने के लिए दिया जाता था।
 ¯    सिर्फ कम्पनी के एजेंट के रूप में भूमिका निभाने वाले भारतीय व्यापारियों को ‘दोहनी’ कहा जाता था।
 ¯    1853 में जब भारत में सूती वó-उद्योग के कारखाने आरंभ किए गए तो मानचेस्टर च®बर आफ कामर्स ने भारत सरकार से अपील की कि वे सभ्यता के कारक, न्याय तथा ईसाईवाद को पहचानें।“
 ¯    राजस्व बोर्ड, मद्रास के अध्यक्ष जान सुल्लीवान ने टिप्पणी की, ”हमारी व्यवस्था उस गद्दे की तरह है जो गंगा घाटी की सभी अच्छी चीजों को सोखकर टेम्स की तलहटी में छोड़ रही है।“
 ¯    ”बिखरे हुए स्वायत्त गांवों के कवच को इस्पात के रेलों से छेद दिया गया जिससे उनके जीवन रक्त का ड्रनास हो गया“ - डी. एच. बुकानन


¯ इस बीच आयात तथा निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में भी कुछ परिवर्तन हुआ। 
 ¯ जैसे-जैसे भारतीय उद्योगों का विकास होता गया, वैसे-वैसे उत्पादित वस्तुओं के आयात में कमी आई और भारत अपनी उत्पादित वस्तुओं का निर्यात करने लगा।
 ¯ लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि भारत आर्थिक विकास के उच्च स्तर पर पहुँच गया था। ब्रिटिश शासन के पूरे दौर में भारत का धन लगातार इंग्लैंड पहुँचता रहा। ब्रिटिश स्वामित्व के उद्योगों तथा व्यापार से होने वाला मुनाफा तो इंग्लैंड भेजा ही जाता था, भारत सरकार द्वारा वसूल किए गए राजस्व का एक बड़ा हिस्सा भी ‘स्वदेश शुल्क’ के नाम पर इंग्लैंड पहुँचता था। 
 ¯ भारत पर शासन करने के लिए इंग्लैंड में जो कुछ खर्च होता था, जैसे कि भारत सचिव के कार्यालय का खर्च, वह सब भारत के राजस्व से अदा किया जाता था। 
 ¯ भारत के ब्रिटिश अधिकारी अपने वेतन का एक हिस्सा इंग्लैंड भेजते थे और सेवा से अवकाश ग्रहण करने पर उन्हें उनकी पेंशन भारत से भेजी जाती थी। 
 ¯ अनुमान लगाया गया है कि उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में भारत में वसूल किए गए राजस्व का एक-तिहाई भाग इंग्लैंड पहुँचा था।

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