शिमला सम्मेलन , माउंटबेटन योजना और राजनीतिक एकता - स्वतंत्रता संग्राम, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : शिमला सम्मेलन , माउंटबेटन योजना और राजनीतिक एकता - स्वतंत्रता संग्राम, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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शिमला सम्मेलन , माउंटबेटन योजना और राजनीतिक एकता

 

शिमला सम्मेलन

  • जून 1945 में चर्चिल ने वेवेल को भारतीय नेताओं के साथ संधि-वार्ता करने की अनुमति दे दी। 
  • वेवेल ने कांग्रेस कमेटी के सभी मेंबरों को रिहा करने के आदेश दिए और एक नई एक्जीक्यूटिव काउंसिल की स्थापना का प्रस्ताव किया, जिसमें स्वयं वायसराय और कमांडर-इन-चीफ के अतिरिक्त सभी भारतीय होते। 
  • ”सवर्ण हिन्दुओं और मुसलमानों को बराबर प्रतिनिधित्व का अधिकार होगा, एक्जीक्यूटिव वर्तमान (तत्कालीन) संविधान के अंतर्गत कार्य करेगी (अर्थात् यह केन्द्रीय असेंबली के प्रति उत्तरदायी नहीं होगी), किंतु युद्ध जीत लेने के पश्चात् नए संविधान पर विचार-विमर्श के द्वार खुले रहेंगे।“
  • स्वभाविक रूप से शिमला सम्मेलन (25 जून-14 जुलाई 1945) में कांग्रेस ने इस बात पर आपत्ति की कि उसे केवल ‘सवर्ण हिन्दुओं के दल’ का दर्जा दिया जा रहा है और उसने सभी समुदायों के लोगों को अपने सदस्य नामजद करने के अधिकार पर जोर दिया। 
  • किंतु जिन्ना की मांगों के कारण वार्ता टूट गई। उनकी माँग थी कि सभी मुसलमान सदस्यों को चुनने का एकमात्र अधिकार लीग को ही हो और उसे एक प्रकार का सांप्रदायिक ‘विटो’ भी प्राप्त हो जिसमें अगर मुसलमान किसी निर्णय का विरोध कर रहे हों तो उसको पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता हो। 
  • लीग की इन दो मांगों के कारण वेवेल ने सम्मेलन को भंग कर दिया। 
  • कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल के नेता मौलाना आजाद थे।

आजाद हिंद फौज के मुकदमें और नौसैनिक विद्रोह

  • ब्रिटिश सरकार ने आजाद हिंद फौज के तीन अफसरों पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा चलाया। उन पर ब्रिटिश फौजों के खिलाफ लड़ने का अभियोग था। 
  • वे तीन अफसर थे - शाहनवाज खान, पी. के. सहगल और जी. एस. ढिल्लो। मुकदमें के विरुद्ध सारे देश में प्रदर्शन और हड़ताल हुईं। तीनों अफसरों को सजा सुनाई गई, मगर उन्हें रिहा कर देना पड़ा। 
  • फरवरी 1946 ई. में रायल इंडियन नेवी के नाविकों ने कई स्थानों पर विद्रोह कर दिया। मजदूरों तथा दूसरों ने उनका साथ दिया। 
  • नाविकों तथा उनके समर्थकों और ब्रिटिश फौज तथा पुलिस के बीजो संघर्ष हुआ उसमें बम्बई में करीब 300 लोगों की मृत्यु हुई। 


कैबिनेट मिशन

  • 24 मार्से जून 1946 तक ब्रिटिश मंत्रिमंडल के तीन सदस्य - भारत-सचिव लार्ड पेथिक लारेंस, सर स्टेफोर्ड क्रिप्स और ए.वी. एलेक्जैंडर - वेवेल के साथ मिलकर राष्ट्रीय नेताओं से बातचीत करते रहे। 
  • यह बातचीत दो मुद्दों को लेकर की जा रही थी - अंतरिम सरकार पर और एक ऐसा संविधान तैयार करने के सिद्धांतों एवं प्रक्रियाओं पर जिससे भारत को स्वतंत्रता मिलती। 
  • 15 मार्को एटली ने हाउस आॅफ काॅमन्स में एक वक्तव्य देकर, जिसमें शीघ्र पूर्ण स्वाधीनता देने का वादा किया गया था, कांग्रेस की आशाओं को पर्याप्त बढ़ा दिया था।
  • सदा की भाँति इस बार भी जब जिन्ना की पाकिस्तान की मांग पर वार्ता अटक गई तो 16 मई को कैबिनेट मिशन ने एक योजना प्रस्तुत की। 
  • मिशन का कहना था कि संप्रभुता सम्पन्न पाकिस्तान का बनाया जाना संभव नहीं है, क्योंकि इसमें गैर-मुस्लिमों की बहुत बड़ी संख्या रहेगी (उदाहरण के लिए, असम और बंगाल में 48ण्3 प्रतिशत)। 
  • जो विकल्प सुझाया गया था उसमें एक कमजोर केन्द्र की धारणा थी जो केवल विदेश विभाग, प्रतिरक्षा और संचार साधनों पर नियंत्रण रखता और जिसमें संविधान सभा का चुनाव करते समय प्रांतीय असेंबलियां तीन मंडलों में बांट दी जाती: हिंदू-बहुल प्रांतों के लिए मंडल ‘अ’ होता तथा उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी मुस्लिम-बहुल प्रांतों (असम सहित) के लिए मंडल ‘ब’ और ‘स’।
  • जिन्ना यह सोचते थे कि कांग्रेज इस योजना को अस्वीकार कर देगी और ऐसी स्थिति में अंग्रेज लीग को ही अंतरिम सरकार बनाने के लिए कहेंगे। यही आशा वेवेल को भी थी। 
  • परंतु जब कांग्रेस ने ये दीर्घावधि प्रस्ताव स्वीकार कर लिए तो उन्हें बड़ी निराशा हुई। 
  • कांग्रेस को इस बात पर आपत्ति थी कि संविधान सभा के लिए रजवाड़ों से कोई चुने हुए सदस्य नहीं थे। 
  • कांग्रेस के नए अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने 10 जुलाई को घोषणा की कि उनका दल केवल संविधान सभा के चुनावों में भाग लेने के लिए प्रतिबद्ध था।


प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस (1946)

  • लीग ने 29-30 जुलाई को कैबिनेट मिशन योजना पर अपनी स्वीकृति वापस ले ली और 16 अगस्त को ‘मुस्लिम राष्ट्र’ का आह्नान किया कि वे पाकिस्तान हासिल करने के लिए ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई’ का मार्ग अपनाएं। 
  • इस अशुभ दिन को कलकत्ता में सामूहिक नरसंहार हुआ। व्यापक हिंसा और लूटपाट से सैकड़ों लोगों की जानें गई और करोड़ों की सम्पत्ति बर्बाद हुई। 
  • कलकत्ता के बाद नोआखाली में दंगे फैले। 
  • बिहार, अहमदाबाद, पंजाब तथा उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में भी साम्प्रदायिक द्वेष की अग्नि फैल गई। 
  • नेहरू की अंतरिम सरकार इस बढ़ते हुए सांप्रदायिक नरसंहार को असहाय होकर देखती रही। नाम से सरकार होते हुए भी वस्तुतः यह वायसराय की पुरानी कार्यकारी परिषद से अधिक कुछ नहीं थी।


अंतरिम सरकार

  • केन्द्र में थोड़ी अवधि के लिए मिली-जुली सरकार स्थापित करने के वेवेल के प्रयास असफल हो गए। 
  • जिन्ना चाहते थे कि इसमें पांकांग्रेसी हिंदू, पाँलीगी मुसलमान, एक सिख और एक अनुसूचित जाति के सदस्य हों। 
  • कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया और मुसलमानों व हरिजनों को भी अपने सदस्य नामजद करने का अधिकार मांगा। 
  • परिणामस्वरूप वेवेल को 4 जुलाई को केवल अधिकारियों की कामचलाऊ सरकार बनानी पड़ी। किंतु जल्दी ही वायसराय फिर आग्रह करने लगे कि कांग्रेस को किसी न किसी प्रकार अंतरिम सरकार में शामिल किया जाए भले ही लीग इससे बाहर ही क्यों न रहे।
  • 2 सितंबर को नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस की प्रधानता वाली अंतरिम सरकार को शपथ दिलाई गई। 
  • नेहरू ने साफ कह दिया था कि उनकी पार्टी अब भी अनिवार्य समूहीकरण के विरुद्ध है, यद्यपि उन्होंने इस मामले को संघीय न्यायालय के हवाले करने की बात अवश्य कहीं; संघीय न्यायालय की संकल्पना कैबिनेट मिशन योजना में थी।
  • सामूहिक या किसी भी प्रकार से कार्य करना तब असंभव हो गया जब वेवेल ने 26 अक्टूबर को जिन्ना को सरकार में सम्मिलित होने के लिए मना लिया - इस आधार पर कि एक कांग्रेसी मुसलमान लिए जाने के बदले अनुसूचित जाति का एक लीग सदस्य (जोगेन मंडल) लिया जाए। 
  • बिना प्रत्यक्ष कार्रवाई की योजना त्यागे तथा कैबिनेट मिशन की दीर्घावधि योजना को अस्वीकार करने एवं अनिवार्य समूहीकरण पर बल देने के बावजूद लीग को सरकार में सम्मिलित होने दिया गया। 
  • लीग की बाधा डालो नीति के अंतर्गत नेहरू की ‘चाय पार्टी कैबिनेटों’ का बहिष्कार करना और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए एक बजट पेश किया जाना सम्मिलित है।
  • लीग ने संविधान सभा में बैठने से भी इंकार कर दिया जिसकी बैठक 9 सितंबर से आरम्भ होने वाली थी। 
  • इसके फलस्वरूप उस समय संविधान सभा को एक सामान्य ‘लक्ष्य सम्बन्धी प्रस्ताव’ पारित करने (जनवरी 1947) तक ही सीमित रहना पड़ा। इस प्रस्ताव को नेहरू ने तैयार किया था और इसमें एक ‘स्वतंत्र संप्रभुता संपन्न गणतंत्र’ के आदर्श को प्रस्तुत किया गया था।

प्लान बाल्कन

  • 20 फरवरी, 1947 को हाउस आॅफ काॅमन्स में अपने प्रसिद्ध भाषण में एटली ने जून 1948 को सत्ता-हस्तांतरण की अंतिम तिथि घोषित किया था। 
  • ब्रिटिश प्रधानमंत्री के उस भाषण में वेवेल के स्थान पर माउंटबेटन की नियुक्ति की घोषणा भी की गई थी। 
  • अपने भारत आगमन के पश्चात् भारतीय नेताओं से मिलने पर माउंटबेटन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कैबिनेट मिशन की रूपरेखा अव्यवहारिक हो चुकी थी। 
  • उन्होंने एक वैकल्पिक योजना बनाई जिसे ‘प्लान बाल्कन’ का गुप्त नाम दिया गया। 
  • इसमे विभिन्न प्रांतों को (या यदि हस्तांतरण से पूर्व संघ बन जाए तो संघों को) सत्ता हस्तांतरण की बात थी जिसमे पंजाब और बंगाल की विधायिकाओं को यह अधिकार होता कि वे चाहें तो अपने प्रांतों का विभाजन कर लें; इस प्रकार बनने वाली विभिन्न इकाइयाँ और रजवाड़े सर्वोच्चता समाप्त होने से स्वतंत्र हो जाएंगे और उनको यह स्वतंत्रता होगी कि वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में मिलें या स्वतंत्र रहें। 
  • लेकिन यह योजना तब शीघ्र ही त्याग दी गई जब 10 मई को शिमला में माउंटबेटन ने व्यक्तिगत रूप से नेहरू को इसकी सूचना दी और नेहरू ने इस पर अत्यंत तीखी प्रतिक्रिया प्रकट की।


माउंटबेटन योजना

  • ‘प्लान बाल्कन’ के स्थान पर वी.पी मेनन-पटेल की वह योजना उठाई गई जिसमें डोमिनियन स्टेटस के आधार पर भारत और पाकिस्तान की दो केन्द्रीय सरकारों को सत्ता हस्तांतरित किए जाने का सुझाव था। 
  • 2 जून को इस योजना को कांग्रेसी, लीगी और सिख नेताओं ने स्वीकार कर लिया और अगले दिन इसकी घोषणा कर दी गई। 
  • यही योजना ‘भारत स्वतंत्रता अधिनियम’ का आधार बनी जसकी पुष्टि 18 जुलाई को ब्रिटिश संसद और सम्राट ने कर दी और जो 15 अगस्त को लागू हो गई।

स्वतंत्र भारत

  • अंततः 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों के सुनहरे सपनों की तुलना में अनेक लोगों को यह तुच्छ ही प्रतीत हुई होगी। 
  • पश्चिमी पंजाब, पूर्वी बंगाल, सिंध और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत को मिलाकर पाकिस्तान का पृथक राज्य बना। 
  • जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। 
  • संविधान सभा स्वतंत्र भारत के संसद के रूप में काम करने लगी।

राजनीतिक एकता

  • स्वतंत्र भारत के सामने पहला कार्य था राजनीतिक एकता स्थापित करना। 
  • जब ब्रिटिश शासन का समाप्त होना निश्चित हो गया, तो देशी रियासतों के राजाओं ने अपने दमन में वृद्धि कर दी। जम्मू तथा कश्मीर, हैदराबाद, त्रावणकोर तथा राजस्थान की कुछ रियासतांे में यह दमन अधिक बर्बर था। 
  • कुछ राजाओं ने स्वतंत्र शासक बनने की योजना बनाई थी। राष्ट्रीय आन्दोलन ने, राज्यों की जनता की मदद से, उनकी योजना को विफल कर दिया। 
  • राज्यों का विभाग सरदार बल्लभभाई पटेल के जिम्मे था। उनके प्रयास से भारत के स्वतंत्र होने से पहले ही सभी राज्यों को भारत में मिला लिया गया था। 
  • केवल तीन ही राज्य स्वतंत्रता प्राप्ति तक भारत में नहीं मिले थे। वे तीन राज्य थे - जम्मू तथा कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़। 
  • अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान से कवायलियों द्वारा कश्मीर पर आक्रमण करने के बाद वहां के महाराजा भारत में सम्मिलित होने के लिए सहमत हो गए। पाकिस्तानी हमलावरों को मार भगाने के लिए भारतीय सेना वहाँ भेजी गई।
  • जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया। फरवरी 1948 ई. में जूनागढ़ की जनता ने भारत में मिल जाने के पक्ष में मत दिया। 
  • हैदराबाद के निजाम ने मान लिया कि जनता के प्रतिनिधियों द्वारा बनाई गई एक सरकार भारत में विलय के बारे में फैसला करेगी, मगर उसने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाए। इसके विपरीत, उसने हथियारबंद धर्मांधों को जनता पर जुल्म करने के लिए उकसाया। 
  • सितंबर 1948 ई. में भारतीय सैनिक सिंकदराबाद में घुसे और निजाम ने आत्म-समर्पण कर दिया। बाद में वह राज्य भारत में मिल गया।
  • भारत में पुर्तगाल और फ्रांस के उपनिवेशों से संबंधित क्षेत्र थे - फ्रांसीसी शासन के अंतर्गत पांडिचेरी, कराइकल, यनम, माहे तथा चंद्रनगर, और पुर्तगाली शासन के अंतर्गत गोवा, दमन, दीव तथा दादरा व नगर हवेली। इन क्षेत्रों में विदेशी शासन का अंत भारत के स्वतंत्र होने के कई साल बाद हुआ।
  • फ्रांस के भारतीय उपनिवेशों में आजादी के लिए संघर्ष काफी पहले शुरू हो गया था, मगर दूसरे महायुद्ध के बाद यह ज्यादा तीव्र हो गया। 
  • 1948 ई.  में माहे में विद्रोह हुआ और प्रशासन ने समर्पण कर दिया। 
  • 1949 ई. में चन्द्रनगर भारत में मिल गया। 
  • 1954 ई. में फ्रांस द्वारा शासित क्षेत्रों की जनता ने भारी बहुमत से भारत में मिलने का फैसला किया। तब भारत और फ्रांस के बीएक समझौता हुआ जिसके अंतर्गत सभी फ्रांस-शािसत क्षेत्र भारत में मिल गए।
  • पुर्तगाली उपनिवेशों में सशस्त्र संघर्ष काफी पहले शुरू हो गया था और अठारहवीं, उन्नीसवीं तथा बीसवीं सदियों में जारी रहा। 
  • गोवा में राष्ट्रीय आन्दोलन के जनक त्रिस्ताओ ब्रगांजा कुन्हा थे। 
  • उन्होंने 1928 ई. में कांग्रेस कमेटी की स्थापना की थी। 
  • 1954 ई. में स्वाधीनता सेनानियों ने दादरा और नगर हवेली को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराया।
  • भारत सरकार लम्बे समय तक पुर्तगाल की सरकार को समझाती रही कि वह अपने उपनिवेश छोड़ दे। बावजूद इसके, कई पाश्चात्य देश उसका समर्थन कर रहे थे, विशेषकर ब्रिटेन। अमेरिका भी इस बेहूदे दावे का समर्थन करता रहा कि गोवा पुर्तगाल का एक प्रांत है। 
  • 1955 ई. में एक सत्याग्रही आन्दोलन शुरू हुआ। 
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