संगम साहित्य - संगम युग, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : संगम साहित्य - संगम युग, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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भौगोलिक स्थिति
 

  • भारतीय प्रायद्वीप का दक्षिणी छोर, जो कृष्णा नदी के दक्षिण में पड़ता है, तीन राज्यों में विभक्त था - चोल, पाण्ड्य और चेर या केरल।
  • दक्षिण प्रायद्वीप के दोनों ओर अनेक प्राकृतिक बंदरगाह थे। पश्चिमी तट के बंदरगाह कोचीन, कालिकट, गोआ और मुम्बई बन्दरगाह जहाजों के लिए अपेक्षाकृत अधिक सुविधाजनक तथा उपयोगी थे। पूर्वी तट पर अरिकमेडु, महाबलिपुरम तथा कावेरीपट्टिनम जैसे बंदरगाह भी अपना खास महत्व रखते थे।
  • दक्षिण भारत की इस भौगोलिक स्थिति ने यहाँ स्थित राज्यों को विदेशी व्यापार में भाग लेने को प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप हम यहाँ चेर, चोल, पाण्ड्य जैसे शक्तिशाली और वैभवशाली राज्यों का उदय होते देखते हैं।
  • इन शक्तिशाली और वैभवशाली राज्यों के ही पृष्ठभूमि में हम यहाँ संगम साहित्य का चरमोत्कर्ष पाते हैं।


संगम साहित्य
 

  •  सुदूर दक्षिण के इतिहास का आरम्भ हम संगम साहित्य के ही उद्भव के साथ पाते हैं। इस साहित्य से हमें दक्षिण भारत के उस समय के सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक जीवन के संबंध में जानकारी मिलती है।
  • संगम तमिल कवियों का संघ अथवा मंडल था जो चेर, चोल व पाण्ड्य जैसे राज्यों के संरक्षण में आयोजित हुआ था।
  • संगम साहित्य मुख्यतः निम्नलिखित पुस्तकों में संकलित है - नर्रिणई, कुरुन्तोगई, ऐन्गुरूनूरू, पदिररूप्पट्ट¨, परिपाड्ल, कलित्तोगई, अगनानूरू और पुरनानूरू।
  • उपरोक्त संकलनों में जो रचनाएँ आज उपलब्ध हैं वे कुल 2289 हैं। इनमें से कुछ कविताएँ अत्यंत छोटी हैं जबकि कुछेक पर्याप्त लंबी हो। एक कविता तो आठ सौ पंक्तियों से भी अधिक लम्बी है।
  • ये कविताएँ 473 कवियों द्वारा रचित हैं जिनमें कुछ कवयित्रियाँ भी हैं।
  • अधिकांश कविताओं के अंत में टिप्पणियाँ भी दी गई हैं, जिनमें कवियों के नाम तथा कविता-रचना की परिस्थिति आदि का विवरण है।
  • सौ से अधिक ऐसी कविताएँ भी हैं जिनमें कोई टिप्पणी नहीं है।
  • कविताओं के अंत में दी गई टिप्पणियों का विशद अध्ययन करने पर पता चलता है कि संपूर्ण संगम साहित्य चार अथवा पाँच पीढ़ियों की रचना है और इसके रचनाकाल का विस्तार 120 से 150 वर्षों के बीच हो सकता है।
  • मदुरा में मंडल अथवा सम्मेलन के रूप में तमिल कवियों का एक संगम पर्याप्त समृद्ध स्थिति में था।
  • इरैयनार अगप्पोरूल (आठवीं सदी ई.) के अनुसार तीन संगमों का आयोजन हुआ था जो कुल मिलाकर 9,990 वर्षों तक चला।
  • इरैयनार अगप्पोरूल के अनुसार ही इन तीनों संगमों में 8,598 कवियों ने अपनी कविताओं से इस साहित्य को समृद्ध किया।
  • इसी विवरण के अनुसार 197 पाण्ड्य राजाओं ने इन संगमों को संरक्षण प्रदान किया।
  • सुदूर दक्षिण में ब्राह्मी लिपि में छोटे अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिसे ई. पू. दूसरी सदी का माना जाता है। इसके अध्ययन से यह पता चलता है कि उस समय की तमिल भाषा विकासोन्मुख थी। परंतु संगम काल की तमिल भाषा साहित्य अभिव्यक्ति के दृष्टिकोण से समुन्नात हो चुकी थी।
  • इन दोनों के तुलनात्मक अध्ययन से इस निष्कर्ष पर पहुँचने में देर नहीं लगती कि संगम साहित्य का रचनाकाल 100 ई. से 250 ई. तक था।
  • संगम साहित्य की कविताएँ मुख्य रूप से दो भागों में बँटी हैं - अगम और पुरम। अगम (अर्थात् अध्यात्म) प्रेम संबंधी विषयों पर लिखी गई है जबकि पुरम (अर्थात् भौतिक) राजाओं के प्रशंसा में रची गई है।
  • तमिल क्षेत्र (तिणई) के अनुसार संगमकालीन रचनाओं को पाँच भागों में बाँटा गया है - कुरिंजी (पहाड़ी), पालई (मरुभूमि), मुल्लाई (जंगल), मरुदम (कृषि भूमि), और नेडल (तटीय प्रदेश)।
  • उपरोक्त सभी तिणई एक विशेष प्रकार के अगम या पुरम से जुड़े हुए हैं। कुरिंजी की कविताएँ विवाह-पूर्व प्रेम संबंधों और पशु-संबंधी झगड़ों से जुड़ा है। मरुभूमि को प्रतीक बनाकर लिखी गई कविताओं में बिछड़े हुए प्रेमी का गाँवों में एकांतवास का वर्णन मिलता है। जंगल के माध्यम से कुछ समय के लिए बिछुड़े हुए प्रेमी युगलों के इधर-उधर भटकाव का वर्णन किया गया है। घाटी की पृष्ठभूमि में विवाह-पूर्व प्रेम संबंधों या गणिकाओं के कार्यकलापों का वर्णन मिलता है। तटीय प्रदेशों को आधार भूमि मानकर लिखी गई कविताएँ मछुआरों की अपनी प्रेमिकाओं या गृहस्वामिनी से विलगाव व युद्धों के वर्णन से संबंधित हैं।
  • इन सभी तिणई के निवासी, पेड़-पौधे और पशु-पक्षी अलग-अलग विशेषताओं से युक्त हैं।
  • ‘अष्ट संकलन’ अर्थात् इत्तुतोगई की प्रत्येक कविताएँ उपरोक्त पाँचों प्रकार के तिणई में किसी एक को आधार बनाकर लिखी गई हैं। परंतु हम कुछ ऐसी भी कविताओं को देखते हैं जिनका इनसे दूर का भी रिश्ता नहीं झलकता है।
  • दूसरे संगम की एक मात्र बची हुई कृति तोल्काप्पियम है, जिसके रचनाकर तोल्काप्पियार हैं। तोल्काप्पियार, जो उस समय के ग्यारह अन्य विद्वानों के साथ अगस्त्य मुनि के शिष्य परंपरा के माने जाते हैं, एक मध्यकालीन विद्वान नच्चिनाक्र्किनियर के अनुसार ब्राह्मण वंश के थे।
  • तोल्काप्पियम मूलतः एक व्याकरण की पुस्तक है, परंतु इसमें उस समय के समाज पर भी प्रकाश डाला गया है।
  • तोल्काप्पियम की रचनाओं का अध्ययन करने पर यह संगमकालीन अन्य ग्रंथों से पूर्व की लगती है, इसकी भाषिक संरचना कुछ अविकसित लगती है और शैली भी संगमकालीन अन्य रचनाओं से भिन्न जान पड़ती है। इस आधार पर कुछ विद्वान इसका रचनाकाल तीसरी सदी ई. पू. ठहराते हैं। कुछ अन्य विद्वान इसको पाँचवी सदी ई. का भी मानते हैं।
  • यह सारगर्भित रूप में तीन भागों में बँटा हुआ है। प्रत्येक भाग नौ इयलों (उप-भाग) से बना है जिसमें कुल मिलाकर 1,612 सूत्र संकलित हैं।
  • तोल्काप्पियम बाद के तमिल साहित्य के लिए रीड की हड्डी साबित हुआ।
  • रुद्रशर्मन ने विख्यात संगम राजकुमार उग्रपेरुवलूदि के प्रोत्साहन से अहनानूरु नामक संकलन तैयार किया।
  • इसी तरह विख्यात संगम राजा मंदरँजेरल इरुमपोरै की प्रेरणा और प्रोत्साहन से गूडलूर किलार ने रंगुगुरूनूरू नामक ग्रंथ को संपादित किया।
  • इस प्रकार हम देखते हैं कि संगमकालीन कविताओं का संकलन सातवीं सदी ई. तक होता रहा है।
  • ‘अष्ट संकलन’ के अतिरिक्त संगमकालीन कविताओं का एक अन्य संकलन पत्तुप्पाट्ट¨ (दस ग्राम्य काव्य) है। इसमें संकलित सारी कविताएं काफी लम्बी हैं।
  • संगम काल में जहाँ एक तरफ हम मुरुगन के अनुयायी नक्कीरर के द्वारा उनको समर्पित मुरुगर्रुप्पडै नामक रचना पाते हैं तो दूसरी ओर शिरुपणर्रुप्पडै, पेरुमबाणार्रुप्पडै, मदुरइक्कांजी और पट्टिनप्पालई ऐतिहासिक घटनाओं से भरा पड़ा है।
  • ई. सदी के प्रारंभ में रचित सुप्रसिद्ध महाकाव्य शिलप्पदिकारम और मणिमेकलई तमिल साहित्य का उज्ज्वलतम रत्न माना जाता है। परंपरा के अनुसार ये दोनों रचनाएँ समकालीन इलांगो अडिगल और शत्तनार द्वारा लिखी गईं। ये दोनों रचनाएँ धारावाहिक रूप में लिखी गई हैं।
  • शिलप्पदिकारम में एक जगह श्रीलंकाई राजा गजबाहु का उल्लेख मिलता है जो चेर राजा शेन्गुट्ट¨वन द्वारा कण्णगि देवी (सतियों की देवी) की मंदिर की अधिष्ठापना के समय मौजूद था। गजबाहु प्रथम का शासनकाल दूसरी सदी ई. के उत्तरार्ध में था। इससे पता चलता है कि शेन्गुट्ट¨वन का शासन काल और शिलप्पदिकारम का रचना काल भी इसी समय में था। इसमें एक प्रेम कथा वर्णित है। कोवलन नामक एक अमीर अपनी कुलीन धर्मपत्नी कण्णगि की उपेक्षा करके कावेरीपट्टिनम की माधवी नामक गणिका से प्रेम करने लगता है।
साम्राज्य की प्रमुख इकाइयाँ 
मंडलम                  संपूर्ण राज्य क्षेत्र
नाडु                      मंडलम से छोटी इकाई (प्रांत)
उर        शहर या बड़े ग्राम
सिरैयुर                   छोटे ग्राम
पट्टिनम                  तटीय शहर
चेरी                       शहर या बड़े गाँवों के मुहल्ले
पक्कम      पड़ोसी क्षेत्र
सलाई                    प्रमुख सड़क
तेरु                        शहर की मुख्य गली
  • शत्तनार रचित मणिमेकलई, शिलप्पदिकारम की ही कहानी को आगे बढ़ाता है। इसमें कोवलन और माधवी के संगम से उत्पन्न एक कन्या के साहसिक जीवन का वर्णन है, लेकिन यह महाकाव्य धार्मिक अधिक है साहित्यिक कम। शिलप्पदिकारम की महान शैली और कथ्य-शिल्प का इसमें अभाव झलकता है, फिर भी यह अन्य तमिल महाकाव्यों से अपनी अलग पहचान कायम रखने में सफल है।
  • शत्तनार ने, जो संगीत और नृत्य के जानकार थे, इसमें संगीत और नृत्य की जानकारी बड़े कलापूर्ण और नाटकीय शैली में प्रस्तुत किया है। संयोग से यह महाकाव्य एकमात्र प्राच्य कृति है जो संगमकालीन कला और संगीत की झलक देता है।
  • संगम साहित्य को दो और मुख्य भागों में बाँटा जा सकता है -
    •  आख्यान ग्रंथ - मेल्कन्नाकु अर्थात् अठारह मुख्य ग्रंथ। इसमें आठ पद्य संकलन और दस ग्राम्य गीत हैं।
    •  उपदेशात्मक ग्रंथ - कील्कणक्कु अर्थात् अठारह संक्षिप्त ग्रंथ।
  • अठारह कील्कणक्कु  कृतियों में अधिकांश, जिसमें कुरल, नालडियार, पलमोलि शामिल थे, की रचना शाही पल्लवों के पूर्व हो चुकी थी। इससे यह साबित होता है कि कील्कणक्कु कृतियों का छोटी रचनाओं में रूपान्तरण भ्रांतिपूर्ण है। यह कील परंपरा में रचित है जो मेल (इत्तुतोगई और पत्तुप्पाट्ट¨) परंपरा से भिन्न है।
  • मेल परंपरा की कविताएँ अधिक लंबी पंक्तियों में होती हैं जो अहवल या कलीमीटर में रची जाती हैं जबकि कील परंपरा की कविताएं छोटी होती हैं और मुख्यतया वेण्बा मीटर में रची होती हैं।
  • कुरल, जो तिरुवल्लूवर द्वारा रचित है, सार्वभौमिक स्तर पर महत्त्वपूर्ण माना गया है। यह अनेक अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुदित हुआ है। यह धर्मशाó, अर्थशाó और कामशास्त्र का अद्भुत सम्मिश्रण है। इसके अध्ययन से यह पता चलता है कि इसका लेखक कला की विविधताओं से पूर्ण वाकिफ था।
  • वेण्बा मीटर में रचित नालडियार स्वाभाविक रूप से नैराश्य दृष्टिकोण को सामने रखता है।
  • मूण्रूरै अरैयर कृत पलमोली  लोकोक्तियों के माध्यम से नैतिकता को एक नये ढंग से प्रस्तुत करता है।
  • संगम युग के उत्तरार्द्ध की रचना आचारक्कोवई परंपरावादी हिन्दुओं के दैनिक कार्यकलापों का वर्णन करता है।
  • पल्लवशाही और संगम-युग के संगम में कोंगुल्लवेलीर कृत पेरूण्गदई मूलरूप से बृहतकथा का संक्षिप्त प्रस्तुतिकरण है। यह महाकाव्य शैली में रचा गया है।
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