स्वराज पार्टी और रचनात्मक कार्यक्रम - स्वतंत्रता संग्राम, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

इतिहास (History) for UPSC (Civil Services) Prelims in Hindi

UPSC : स्वराज पार्टी और रचनात्मक कार्यक्रम - स्वतंत्रता संग्राम, इतिहास, यूपीएससी, आईएएस UPSC Notes | EduRev

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स्वराज पार्टी और रचनात्मक कार्यक्रम

 

स्वराज पार्टी और रचनात्मक कार्यक्रम

  • असहयोग आंदोलन को वापस लेने के बाद कांग्रेस दो दलों में बंट गई। 
  • जब असहयोग आंदोलन शुरू हुआ था, तब विधान परिषदांे का बहिष्कार करने का निर्णय लिया गया था। 
  • एक दल, जिसका नेतृत्व चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू और विट्ठलभाई पटेल कर रहे थे, चाहता था कि कांग्रेस को चुनावों में भाग लेना चाहिए और परिषदों को उनके भीतर पहुँचकर तोड़ना चाहिए। 
  • दूसरा दल, जिसका नेतृत्व बल्लभभाई पटेल, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और राजेन्द्र प्रसाद कर रहे थे, इस प्रस्ताव का विरोधी था। वे चाहते थे कांग्रेस रचनात्मक कार्य में लगी रहे।
  • सन् 1922 ई. में कांग्रेस का अधिवेशन गया में हुआ। इसके अध्यक्ष चितरंजन दास थे। 
  • इस अधिवेशन ने परिषदों में जाने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। 
  • इस प्रस्ताव के समर्थकों ने 1923 ई. में ‘कांग्रेस खिलाफत स्वराज पार्टी’ की स्थापना की। यह ‘स्वराज पार्टी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। 
  • अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में दिल्ली में आयोजित विशेष अधिवेशन में कांग्रेस ने स्वराजियों को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी। 
  • स्वराजियों ने केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों में काफी संख्या में सीटें प्राप्त की। 
  • इस काल में व्यापक राजनीतिक गतिविधियाँ नहीं हुईं; मगर ब्रिटिश-विरोधी भावनाओं को जीवित रखने में स्वराजियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। 
  • उन्होंने ब्रिटिश शासकों द्वारा प्रस्तुत उनकी नीतियों तथा प्रस्तावों के लिए परिषदों की सम्मति प्राप्त करना लगभग असंभव बना दिया।
  • सरकार ने 1928 ई. में विधान परिषद् में एक ऐसा बिल पेश किया जिसके तहत वह भारत के आजादी के संघर्ष को समर्थन देने वाले किसी भी गैर-भारतीय को देश से निकाल सकती थी। वह बिल पास नहीं हुआ। 
  • सरकार ने पुनः उस बिल को पेश करने की कोशिश की तो परिषद् के अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल ने उसे पेश करने की अनुमति नहीं दी। 
  • फरवरी 1924 ई. में गाँधीजी जेल से छूटे और रचनात्मक कार्यक्रम, जिसे कांग्रेस के दोनों गुटों ने स्वीकार किया था, कांग्रेस की प्रमुख गतिविधि बन गई। 
  • रचनात्मक कार्यक्रम के सबसे प्रमुख घटक थे - खादी का प्रचार, हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत बनाना और अस्पृश्यता को दूर करना। 
  • किसी भी कांग्रेस कमेटी के सदस्य के लिए यह अनिवार्य हो गया कि वह हाथों से काते तथा बुने गए खद्दर का ही इस्तेमाल करे और प्रति माह 2000 गज सूत काते। 
  • अखिल भारतीय खादी संगठन की स्थापना हुई। देश भर में खादी भंडार खोले गए। 
  • गाँधीजी खादी को गरीबों को दरिद्रता से मुक्ति देने वाला और देश के आर्थिक उत्थान का साधन मानते थे। 

किसानों और मजदूरों का आंदोलन

  • किसानों को संगठित करने वाले कुछ नेता थे - बाबा रामचंद्र, विजय सिंह पथिक, सहजानंद सरस्वती और एन.जी. रंगा।
  • अज्जूरि सीतारामराजू ने आंध्र के किसानों तथा आदिवासियों के विद्रोह का नेतृत्व किया। उन्हें पकड़ लिया गया और 1924 ई. में मार दिया गया।
  • किसान आंदोलन के दो पहलू थे। दोनों का ही आजादी के राष्ट्रीय संघर्ष से संबंध था। 
  • एक पहलू था किसानों का आजादी के संघर्ष में शामिल होना। इसने संघर्ष को व्यापक जन-आधार प्रदान किया और इसे एक वास्तविक जन-आंदोलन बना दिया। दूसरा पहलू किसानों की शिकायतों से संबंधित था, जैसे जमींदारों, सरकार तथा महाजनों द्वारा किसानों का शोषण, ऊँचे कर तथा लगान और उनका भूमिहीन होना। 
  • 1928 ई. में बल्लभभाई पटेल ने भू-राजस्व में वृद्धि के खिलाफ बारदोली के किसानों के संघर्ष का नेतृत्व किया। 
  • यद्यपि देश के अनेक भागों में किसानों के संगठन स्थापित हुए थे, मगर किसानों का पहला अखिल भारतीय संगठन 1936 ई. में स्थापित ‘आॅल इंडिया किसान सभा’ था। 
  • इस संगठन ने किसानों की माँगों और आजादी के संघर्ष के बीगहरे-संबंध स्थापित किए।
  • औद्योगिक मजदूर भारतीय समाज में एक नए वर्ग के रूप में उभरे थे। बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों से उन्होंने भी अपने को संगठित करना शुरू कर दिया था। आरंभिक दौर का एक प्रमुख मजदूर संगठन था - 1918 ई. में स्थापित ‘मद्रास लेबर यूनियन’। 
  • बी. पी. वाडिया, थिरू वी. कल्याणसुंदरम् चक्कराई चेट्टियार इसके प्रमुख नेता थे। 
  • भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन के एक अग्रणी नेता नारायण मल्हर जोशी थे। उन्होंने मजदूरों के पहले अखिल-भारतीय संगठन ‘आॅल-इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ की स्थापना में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। 
  • इस संगठन की स्थापना बंबई में 1920 ई. में हुई थी। इसके प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे। 
  • चितरंजन दास, जवाहर लाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस-जैसे चोटी के अनेक नेता आॅल-इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष बने।
  • मजदूरों और किसानों के आंदोलनों पर समाजवादी विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा था। भारत के समाजवादी आंदोलन के नेताओं ने मजदूरों और किसानों को संगठित करने में अधिकाधिक महत्व की भूमिका अदा की। 
  • आजादी के संघर्ष में शामिल होकर उन्होंने इसके सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को बड़ी गहराई से प्रभावित किया।
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