Table of contents |
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परिचय |
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प्रमुख बातें |
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व्याख्या |
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सारांश |
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‘सीखो’ कविता श्रीनाथ सिंह जी ने लिखी है। यह कविता हमें बताती है कि हमें अपने आसपास के प्राकृतिक तत्वों से सीखना चाहिए। हमें इन प्राकृतिक चीजों से सीखना चाहिए जो हमारे जीवन में खुशी, तरक्की, और सहयोग लाती हैं।
फूलों से नित हँसना सीखो, भौंरों से नित गाना।
तरु की झुकी डालियों से नित सीखो शीश झुकाना।
सीख हवा के झोंकों से लो, कोमल भाव बहाना।
दूध तथा पानी से सीखो, मिलना और मिलाना।
सूरज की किरणों से सीखो, जगना और जगाना|
लता और पेड़ों से सीखो, सबको गले लगाना।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि जिस प्रकार फूल खिलकर अपनी सुगंध से सबके मन को प्रसन्नता से भर देते हैं, उसी प्रकार हमें फूलों से हँसने- मुसकराने की सीख लेकर चारों ओर खुशियाँ बिखेरनी चाहिए । भौंरों से अपनी धुन में मग्न रहकर गुनगुनाने की सीख लेनी चाहिए। जिस प्रकार पेड़ों की डालियाँ फल-फूलों से लदकर झुक जाती हैं, उसी प्रकार हमें भी अपने गुणों का अहंकार नहीं करना चाहिए बल्कि सबसे विनम्र व्यवहार करना चाहिए। जैसे मंद हवा के झोंके सबको भले लगते हैं वैसे ही अपने मन में सबके प्रति कोमल भाव रखना हम हवा के झोंकों से सीखें। दूध और पानी जिस प्रकार मिलकर एकरूप हो जाते हैं, उसी तरह हम भी आपस में मिल-जुलकर रहना सीखें। जिस प्रकार सूरज स्वयं पहले जगकर फिर अपनी किरणें फैलाकर दूसरों को जगाता है, उसी तरह सूरज की किरणों से सीख लेकर पहले हम स्वयं सत्य के मार्ग पर चलना सीखें फिर दूसरों को भी चलने के लिए प्रेरित करें। लता और पेड़ जिस प्रकार आपस में एक-दूसरे को प्रेम से गले लगाकर एक साथ आगे बढ़ते हैं। उनसे सीख लेकर हम भी परस्पर सहयोग करते हुए आगे बढ़ें।
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Chapter Notes: सीखो
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दीपक से सीखो जितना हो सके अँधेरा हरना।
पृथ्वी से सीखो प्राणी की सच्ची सेवा करना।
जलधारा से सीखो आगे, जीवन-पथ में बढ़ना।
और धुएँ से सीखो हरदम, ऊँचे ही पर चढ़ना।
व्याख्या: कवि कहता है कि दीपक छोटा-सा होता है किंतु अपनी क्षमता के अनुसार अँधेरे को दूर करता है ठीक उसी प्रकार हमें भी जीवन के अँधेरों को दूर करने की सीख दीपक से लेनी चाहिए। पृथ्वी अर्थात् धरती अपने ऊपर रहने वाले सभी लोगों की चाहे वे अच्छे हैं या बुरे, सबकी सच्ची सेवा करती है। सबके साथ एक समान व्यवहार करती है। पृथ्वी से हमें सच्ची सेवा का गुण ग्रहण करना (अपनाना) चाहिए। कवि आगे कहते हैं कि हमें जलधारा अर्थात् नदी से जीवन में सदा आगे बढ़ने की सीख लेनी चाहिए। नदी के रास्ते में चाहे कितने ही पत्थर-कंकड़ आए, नदी आगे बढ़ती ही रहती है ठीक वैसे ही हमें भी चाहे कितनी ही मुश्किलें आए, जीवन में आगे बढ़ते रहना चाहिए। इसी तरह धुएँ से हमें सदा ऊँचा उठना सीखना चाहिए। धुआँ सदा ऊपर की ओर जाता है वैसे ही हमें भी ऊँचा उठने की कोशिश करनी चाहिए।
इस कविता में हमें सिखाया गया है कि हमें जीवन में सबके साथ मिल-जुलकर और प्यार से रहना चाहिए। हमें प्रकृति से सीखना चाहिए और उसका ख्याल रखना चाहिए। इसके अलावा, हमें अपने भावों को प्यार और नर्मी से दिखाना चाहिए और हमेशा सच्चाई और ईमानदारी से जीना चाहिए। यह कविता हमें जीवन में अच्छे बदलाव लाने के लिए प्रेरित करती है।
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