कृषि (भाग - 2) - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

भूगोल (Geography) for UPSC Prelims in Hindi

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UPSC : कृषि (भाग - 2) - भारतीय भूगोल UPSC Notes | EduRev

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मृदा और भूमिगत जल मानचित्र

बेहतर भूमि संसाधन प्रबंध हेत सभी राज्यों के लिए मृदा मानचित्र विकसित किये गये। इसके लिए भूमि सर्वेक्षण और दूर संवेदी आंकड़ों का उपयोग किया गया। ज्यादा उपयोगकर्ताओं तक इन मानचित्रों की पहुंच बढ़ाने के लिए इनके अंकीकरण का काम प्रगति पर है। भूमिगत जल संसाधन के विकास के लिए एक भूमिगत जल-मानचित्र प्रकाशित किया गया।

भविष्य की प्राथमिकतायें

  • संकर किस्मों के अनुसंधान पर जोर

  • जैव प्रौद्योगिकी द्वारा पौध, पश और मत्स्य आनुवंशिकता को बढ़ावा

  • टिकाऊ संसाधन

  • विविधता

  • कृषि में बेहतर ऊर्जा प्रबंध

  • एकीकृत नाशीजीव और पोषण प्रबंध प्रणालियां

  • कटाई के बाद की प्रौद्योगिकी

  • सामाजिक विज्ञान अनुसंधान मूल्य-अभिवर्धन, निर्यात

  • लघ और सीमांत किसानों, पिछड़े पर्वतीय और जनजातीय क्षेत्रों के लिए प्रौद्योगिकी का विकास

  • अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों से संबंध और अधिक मजबूत करना

कृषि और जैव तकनीक

जैव तकनीक से लाभ

  • पौधों में आनुवंशिक परिवर्तनों से उन्हें मृदा तथा जलवाय की प्रतिकूल परिस्थितियों से जैव दबावों का मुकाबला करने योग्य बनाया जा सकता है। इस प्रकार फसल को दुगुना करने के लिए पर्यावरण संबंधी दबावों के प्रति पौधों की भौतिक प्रतिक्रिया तथा उनकी बनावट में संशोधन करने की उत्पादन प्रणालियों में पूरक सहभागी के रूप में सहयोगी बना सकते है।

  • जैव टेक्नोलाजी की संभवतः सबसे महत्वपूर्ण विशेषता, जो उसे हरित क्रांति अथवा बीज-उर्वरक टेक्नोलाजी से बेहतर बनाती है, वह है नाइट्रोजन के जैविक निर्धारण, जैव उर्वरक तथा कीड़ों का मुकाबला करने की क्षमता के कारण कीटनाशक दवाओं और उर्वरकों जैसी वस्तुओं की बचत।

  • जैव टेक्नोलाजी लागू हो जाने से हरित क्रांति टेक्नोलाजी से जुड़े ”रासायनीकरण“ का स्थान ”आनुवांशिक इंजीनियरी“ ले लेगी। जैव टेक्नोलाजी में बीच का केन्द्रीय स्थान है।

  • फसलों के नुकसान को कम करके वास्तविक तथा संभावित पैदावार में अंतर कम करती है और हरित क्रांति की तुलना में अधिक व्यापक क्षेत्र में उपयोगी हो सकती है, क्योंकि हरित क्रांति टेक्नोलाजी का इस्तेमाल केवल अनुकूल जलवाय वाले क्षेत्रों में किया गया। बीज तैयार करने की परंपरागत विधियों की तुलना में इसमें नए बीज विकसित करने में अधिक कार्यकुशलता तथा समय की बचत के कारण टेक्नोलाजी में प्रगति की दर अधिक रहने की संभावना है।

जैव तकनीक से कृषकों को लाभ/हानि

  • बीज-उर्वरक टेक्नोलाजी की भांति खेत के छोटा या बड़ा होने से इसकी उपयोगिता पर कोई असर नहीं पड़ता। इससे रासायनिक आदानों की बचत होती है, पैदावार में स्थिरता आती है और प्रतिकूल परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलों में इसके इस्तेमाल की बेहतर संभावनाएं है।

  • परन्त निर्धनों के हित की इसकी क्षमताओं का उपयोग अनुसंधान के लिए प्राथमिकताओं के निर्धारण पर निर्भर करता है। इसका कारण यह है जैव टेक्नोलाजी से अनेक प्रकार के वैकल्पिक अवसर प्राप्त होते है जिन्हें गरीबों के हितों के विरुद्ध भी बनाया जा सकता है। इसका ज्वलंत उदाहरण है कीड़ों का मुकाबला कर सकने और कीटनाशक दवाओं का मुकाबला कर सकने वाली किस्मों में से चुनाव करना। पहले प्रकार के बीज निर्धन लोगों के लिए हितकर तथा पर्यावरण संरक्षण में सहायक है। अतः इनसे कीटनाशक दवाओं की बचत होती है जबकि दूसरी तरह के बीजों से कीटनाशक दवाओं का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा हो सकता है।

जैव तकनीक और अनुसंधान कार्यनीति

  • जैव तकनीक में अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में आत्म निर्भरता प्राप्त करने के लिए सही प्राथमिकताएं निर्धारित करने में विकासशील देशों की सरकारों की भूमिका हरित क्रांति टेक्नोलाजी में अनुसंधान में निभाई गई भूमिका से कहीं अधिक आवश्यक और महत्वपूर्ण है, क्योंकि कृषि क्षेत्र में अधिक हिस्सा प्रतिकूल परिस्थितियों वाले इलाकों का है। अतः प्रगति तथा न्याय दोनों दृष्टियों से इन परिस्थितियों के अनुरूप टेक्नोलाजी विकसित करने में निवेश करना वांछनीय होगा।

  • आधुनिक जैव टेक्नोलाजी से संभावनाओं के जो नए द्वार खुले है, उन्हें देखते हुए कृषि अनुसंधान में इस निवेश की लाभप्रदता बढ़ गई है क्योंकि पूर्वी भारत जैसे प्रतिकूल परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में वास्तविक तथा संभावित पैदावार में बहुत अधिक अंतर है।

  • जैव टेक्नोलाजी से अनेक तरह के विकल्प उपलब्ध होने के फलस्वरूप अर्थशास्त्रियों और सामाजिक वैज्ञानिकों के लिए भी नई टेक्नोलाजी के विकास में योगदान करने की गुंजाईश बढ़ गई है। अर्थशास्त्री अभी तक नई बीज-उर्वरक टेक्नोलाजी अपनाए जाने के बाद के परिणामों का ही विश्लेषण करते रहे है। कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से उचित टेक्नोलाजी के विकास में तथा नीति निर्धारण स्तर पर उनका योगदान बहुत कम रहा है। अतः उचित टेक्नोलाजी विकसित करने तथा कृषि टेक्नोलाजी की नीति तय करने के लिए कृषि अर्थशास्त्रियों और कृषि वैज्ञानिकों के सामूहिक योगदान की दिशा में प्रयास करना अब आवश्यक है।

भारत में कृषि के प्रकार

  • जलवायु, मिट्टी, प्राकृतिक दशा आदि की भिन्नता के कारण भारतीय कृषि को 6 प्रकारों में विभाजित किया जाता है-
    (1) तर कृषि-200 सें. मी. से अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में वर्ष में एक से अधिक बार फसल उत्पन्न करने वाली कृषि को तर कृषि कहा जाता है। इसके अन्तर्गत-गन्ना, धान, जूट की कृषि बिना सिंचाई के की जाती है। यह कृषि प. बंगाल, मालाबार तट, पूर्वी मध्य हिमालय आदि में की जाती है।
    (2) आद्र्र कृषि-100-200 सें. मी. वर्षा वाले क्षेत्रों में, जहाँ पर काँप तथा काली मिट्टी उपलब्ध होती है, वर्ष में दो फसलें उत्पन्न की जाती है। इस कृषि को आद्र्र कृषि कहते है। मध्य प्रदेश तथा मध्य गंगा के मैदान में इस प्रकार की कृषि की जाती है।
    (3) सिंचित कृषि-50-100 सें. मी. वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाती है। सिंचित कृषि गंगा के पश्चिमी मैदान, उत्तरी तमिलनाड तथा दक्षिणी भारत की नदियों के डेल्टाई भागों में इस प्रकार की कृषि की जाती है। इसके अन्तर्गत-गेहूँ, चावल, गन्ना, जौ आदि की कृषि की जाती है।
    (4) शुष्क कृषि-50 सें. मी. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाने वाली कृषि को शुष्क कृषि कहा जाता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात आदि में इस प्रकार की कृषि की जाती है। इसके अन्तर्गत ज्वार, बाजरा, गेहूँ, जौ आदि की कृषि की जाती है।
    (5) पहाड़ी कृषि-पहाड़ी क्षेत्रों में पर्वतीय ढालों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर जो कृषि की जाती है, उसे पहाड़ी कृषि कहते है। असम तथा हिमालय के क्षेत्र में यह कृषि की जाती है। इसके अन्तर्गत-धान, चाय तथा आलू की कृषि की जाती है।
    (6) झूम कृषि-पर्वतीय क्षेत्रों में वन को साफ कर दो-तीन वर्ष तक एक स्थान पर कृषि कर, उसको त्याग कर फिर दूसरे स्थान पर कृषि की जाती है। इस प्रकार की जाने वाली कृषि को झूम कृषि कहते है। असम में ‘झूम’, मध्य प्रदेश में ‘डाह्या’, हिमालय के क्षेत्र में ‘खील’, पश्चिमी घाट में ‘कुमारी’, दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में ‘वालरा’ के नाम से इस कृषि को जाना जाता है।

झूम कृषि के दोष-(i) मृदा अपरदन
(ii) वन संपत्ति और जैव विविधता को हानि
(iii) मौसम परिवर्तन-शुष्कता का विस्तार
(iv) पर्यावरण संतुलन को खतरा

उपाय-(i) झूम कृषि को स्थायी कृषि में परिवर्तन करना
(ii) झूमियों को कृषि तकनीक और अधःसंरचना प्रदान करना
(iii) पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीदार कृषि को बढ़ावा देना

  • सरकारी योजना-झूम कृषि पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए केन्द्र प्रायोजित योजना अरुणाचल प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, उड़ीसा और त्रिपुरा में चलाया जा रहा है। इस समन्वित कार्यक्रम में झूम कृषि करने वाले परिवारों का स्थाई बसाव, झूम कृषि को स्थाई कृषि, सीढ़ीदार कृषि, बागानी कृषि और सामाजिक वानिकी एवं पशुपालन में तब्दील करने पर जोर दिया जा रहा है।

फसलों की भौगोलिक दशाओंक्षेत्र और इसके उत्पादन

चावल

भौगोलिक दशाएँ-चावल उष्ण एवं उपोष्ण कटिबन्धीय पौधा है। इसे अधिक तापमान तथा आद्र्रता की आवश्यकता होती है। बोते समय 200 सें. ग्रे., बढ़ते समय 240 सें. ग्रे. तथा विकास के समय 270 सें. ग्रे. तापमान की आवश्यकता होती है। 75 से 200 सें. मी. वर्षा तथा डेल्टा, बाढ़ आदि की जलोढ़ मिट्टी, कुशल श्रम आदि चावल की कृषि के लिए आवश्यक है।

क्षेत्र-चावल की कृषि मुख्य रूप से उत्तरी तथा पूर्वी भारत में की जाती है। पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि में चावल की कृषि की जाती है।

  • चावल उत्पादकता में वृद्धि के लिए ”चावल क्षेत्रों में समन्वित खाद्यान्न विकास कार्यक्रम“ (ICDP) चलाया गया था। केन्द्र प्रायोजित इस योजना में केन्द्र की सहभागिता 75% और संबंधित राज्य की 25% थी।

गेहूँ

भौगोलिक दशाएँ-गेहूँ समशीतोष्ण कटिबंधीय पौधा है। इसके बोते समय सर्द-शुष्क, विकास के समय नम तथा पकते समय उष्ण एवं शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है। बोते समय 200 सें. ग्रे., बढ़ते समय 160 सें. ग्रे. तथा पकते समय 220 से. ग्रे. तापमान, 50 से 75 सें. मी. वर्षा, दोमट, चिकनी तथा काली मिट्टी गेहूँ की कृषि के लिए आवश्यक होती है।

क्षेत्र-उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, हरियाणा, बिहार, राजस्थान, गुजरात आदि में गेहूँ की कृषि की जाती है।

  • देश में गेहूँ का प्रति हैक्टेयर उत्पादन करीब 2500 कि. ग्रा. है। देश के कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में गेहूँ उत्पादकता में वृद्धि के लिए केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रम ”गेहूँ उपज क्षेत्रों में समन्वित खाद्यान्न विकास कार्यक्रम“ चलाया गया।

मोटे फसल

ज्वार-यह उष्ण जलवाय का पौधा है। बोते समय 80-100 सें. ग्रे. तथा विकास के समय 240-300 से. ग्रे. तापमान की आवश्यकता होती है। इसकी कृषि कम वर्षा वाले क्षेत्र में की जाती है। दोमट मिट्टी ज्वार की कृषि के लिए अधिक उपयोगी होती है। इसकी कृषि महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान आदि में की जाती है।

बाजरा-इसे बोते समय 100-120 सें. ग्रे. तथा विकास के समय 250-310 सें. ग्रे. तापमान की आवश्यकता होती है। यह कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उगायी जाती है। इसकी कृषि पश्चिमी समतल मैदान से लेकर महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाड आदि के पठारी भागों में की जाती है।

  • मोटे अनाजों की उत्पादकता में वृद्धि के लिए केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रम-मोटे अनाजों के उपज क्षेत्र में समन्वित अनाज विकास कार्यक्रम” चलाया गया।

नकदी फसल

गन्ना-यह उष्णाद्र्र जलवाय का पौधा है। प्रारम्भ में 200 सें. ग्रे. और विकास के समय 200-250 सें. ग्रे. तापमान की आवश्यकता होती है। 100 सें. मी. वर्षा, जीवांशयुक्त जलोढ़ मिट्टी एवं समतल धरातल गन्नांे की कृषि के लिए उपयोगी है। गन्नांे के उत्पादन में भारत का विश्व में प्रथम स्थान है। प्रादेशिक दृष्टि से गन्नों के उत्पादन में उत्तर प्रदेश का प्रथम, महाराष्ट्र का द्वितीय तथा तमिलनाड का तृतीय स्थान है। गन्ना उत्पादक प्रमुख राज्य-उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, बिहार, प. बंगाल, पंजाब है।

कपास-इसकी कृषि के लिए 150 से 200 सें. ग्रे. तापमान, 200 दिन पालारहित मौसम, 50 से 100 सें. मी. वर्षा, विकास के समय उच्च तापमान, स्वच्छ आकाश, शुष्क जलवायु, काली तथा कछारी दोमट मिट्टी आवश्यक है। 70 प्रतिशत कपास की कृषि दक्षिणी भारत में की जाती है। कपास उत्पादन में गुजरात का प्रथम स्थान है। गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक, हरियाणा, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश भारत के प्रमुख कपास उत्पादक राज्य है।

  • कपास उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि के लिए 11 कपास उत्पादक राज्यों में केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रम ”गहन कपास विकास कार्यक्रम“ ICDP चलाया गया।

जूट-यह उष्ण कटिबन्धीय जलवाय का पौधा है। इसकी कृषि के लिए 270 सें. ग्रे. तापमान, 159 सें. मी. वर्षा, जलोढ़ मिट्टी, पानी के निकासयुक्त धरातल आदि आवश्यक हैं। जलवाय की दशाओं की आदर्श स्थिति, उर्वरक, जलोढ़ मिट्टी, उपयुक्त तापमान आदि कारकों के कारण महानदी के डेल्टाई भाग से लेकर गंगा नदी की डेल्टा, तिस्ता नदी का मैदानी क्षेत्र, ब्रह्मपुत्र की घाटी में जूट की कृषि की जाती है। कपास उत्पादन में पश्चिम बंगाल का प्रथम स्थान है। पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में इसकी कृषि की जाती है।

  • जूट उत्पादन, उत्पादकता और रेशे की गुणवता को उन्नत करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा 8 जूट उत्पादक राज्यों में ”विशेष जूट विकास कार्यक्रम“ चलाया गया।

तम्बाकू - तम्बाकू एक व्यापारिक फसल है। इसके उत्पादन में भारत का तृतीय स्थान है। इसकी कृषि के लिए 220C तापमान, 100 सें. मी. वर्षा, दोमट और बलुई दोमट मिट्टी, सस्ते एवं अधिक श्रमिक की आवश्यकता होती है। इसका उत्पादन आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, प. बंगाल, बिहार, पंजाब राज्यों में होता है।

उत्पादन-वर्जिनिया तम्बाकू मुख्यतः आन्ध्र प्रदेश में और बीड़ी तम्बाकू मुख्यतः गुजरात में होता है। 

बागानी फसल

चाय-यह उद्यान की कृषि में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसके लिए 180 से 240

सें. ग्रे. तापमान, 150 सें. मी. वर्षा, ढालूदार पर्वतीय मैदान, जीवांशयुक्त उर्वरा मिट्टी आदि भौगोलिक परिस्थितियाँ आवश्यक है। इसकी पत्तियों को सूखने के लिए 900 सें. ग्रे. तापमान उपयुक्त होता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक एवं निर्यातक देश है। असम, पश्चिम बंगाल, मेघालय, त्रिपुरा राज्यों में 75 प्रतिशत चाय का उत्पादन किया जाता है। भारत का सर्वाधिक चाय का क्षेत्र तथा उत्पादन असम में होता है। भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग में-कांगड़ा, कुल्लू क्षेत्र, देहरादून, नैनीताल, गढ़वाल, अल्मोड़ा आदि में चाय की कृषि की जाती है। दक्षिणी भारत में-मालावार के तट के पहाड़ी ढाला , नीलगिरि, मदुराई, तिरुनेवेली, कोयम्बत्तूर, रत्नागिरि, सतारा, शिवभोगा में चाय की कृषि की जाती है।

काॅफी/कहवा

यह एक बागानी फसल है। इसकी कृषि के लिए 160 सें ग्रे. से 270 से. ग्रे. तापमान, 150 से 225 सें. मी. वार्षिक वर्षा, लोहा और चूनायुक्त मिट्टी आवश्यक है।

  • कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल राज्यों  में कहवा की कृषि वृहत्-स्तर पर की जाती है। इसके अलावा महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, अण्डमान निकोबार, असम, पश्चिम बंगाल में कहवा की कृषि की जाती है।

रबर

  • यह बागानी फसल है जिसका विकास भारत में तीव्र गति से किया जा रहा है। इसकी कृषि के लिए 270 सें. ग्रे. तापमान, 200-250 सें. मी. वार्षिक वर्षा, सूर्य का तीव्र प्रकाश, गहरी दोमट, लाल, लेटराइट मिट्टियाँ आवश्यक है। रबर के उत्पादन में भारत का विश्व में 5वां स्थान है। केरल राज्य का उत्पादन में प्रथम स्थान है।
  • 95% रबर उत्पादन क्षेत्र केरल में है। इसके अलावे तमिलनाडु, कर्नाटक, अण्डमान-निकोबार में इसकी कृषि की जाती है।

भारत में बागानी कृषि का महत्व

बागानी कृषि का महत्व-देश के कुल कृषि क्षेत्र 14 करोड़ 20 लाख हेक्टेयर में से 10 करोड़ 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बारानी कृषि के अंतर्गत आता है। कुल कृषि उत्पादन में इन क्षेत्रों का योगदान 40% खाद्यान्न, 80% मक्का या ज्वार, 90% बाजरा और लगभग 95% दालों तथा 75% तिलहनों का रहा है। इसी प्रकार देश का 70% कपास उत्पादन और लगभग समूचे पटसन का उत्पादन वर्षा आधारित स्थितियों में होता है।

  • वर्षा पर निर्भर महत्वपूर्ण फसलों के उत्पादन और उनकी उत्पादकता में वृद्धि बहुत धीमी रही है। अतः

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा,
क्षेत्रीय और पौष्टिक असंतुलन को दूर करने,
कृषि आधारित उद्योगों के विकास और
भीतरी इलाकों में व्यापक स्तर पर ग्रामीण रोजगार पैदा करने के लिए बागानी और वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों की तरफ अधिक ध्यान देना होगा।

बागानी कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए समुचित तकनीकः

(i) भूमि और वर्षा जल प्रबन्ध: इसके लिए दो विधियाँ अपनाई जाती है-
(क) खेत पर वर्षा जल प्रबन्ध और
(ख) तालाबों के जरिये वर्षा जल का संरक्षण और उसे पुनः खेतों में सिंचाई के लिए इस्तेमाल करना।
(ii) परिष्कृत फसल उत्पादन पद्धतियांः इसके महत्वपूर्ण घटक इस प्रकार है-
(क) समुचित और समय पर जुताई
(ख) जल्दी बोआई
(ग) उपयुक्त फसलों और वनस्पतियों का चयन
(घ) पौधों की संख्या में अधिकतम वृद्धि
(ङ) समय पर खरपतवार नियंत्राण
(च) उर्वरकों का समुचित इस्तेमाल
(iii) प्रभावकारी फसल चक्र का इस्तेमाल
(क) अन्तर फसल प्रणाली
(ख) दोहरी फसल प्रणाली
(iv) भूमि के वैकल्पिक इस्तेमाल की प्रणाली
(क) कृषि वानिकी
(ख) वन चारागाह और
(ग) कृषि बागवानी का प्रयोग

सरकारी नीतियाँ

  • बागानी कृषि के उत्पादन और उत्पादकता में सुधार लाने के उद्देश्य से केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रम के रूप में सातवीं योजना के दौरान वर्ष 1986-87 से ”राष्ट्रीय जल विभाजक विकास कार्यक्रम“ शुरू किया गया जो देश के 16 राज्यों के 99 जिलों में चलाया गया।
  • जल विभाजक कार्यक्रम के अंतर्गत वर्षा जल के प्रबंध, भूमि के विकास, सूखा प्रतिरोधी किस्मों के सुधरे बीजों और उर्वरकों के इस्तेमाल, वनारोपण, पशुपालन और संबंधित कार्यक्रम चलाये जा रहे है।
  • राष्ट्रीय बागवानी मिशन राष्ट्रीय बागवानी कार्यक्रम के अंतर्गत केन्द्र द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम है जिसे मई 2005 में प्रारंभ किया गया।

भारत में बागवानी फसलों के नामउत्पादन क्षेत्रमहत्व

  • बागवानी के तहत शीतोष्ण, उपोष्ण और उष्ण जलवाय वाले फल , शाक-सब्जियां , सजावटी पौधों, औषधियों में काम आने वाले पौधों, नारियल, सुपारी, मसालों, काजू, तेल-खजूर ;व्पसचंसउद्ध, खुमी आदि का विकास किया जाता है।
  • केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, कश्मीर राज्य तथा नगरों के निकटवर्ती क्षेत्र बागवानी फसलों के उत्पादन के दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण है।
  • कृषि में विविधता लाने, प्रति इकाई क्षेत्र की आय में वृद्धि करने, रोजगार के अधिक अवसर पैदा करने, पर्यावरण को बेहतर बनाने तथा लोगों के लिए पोषण का बेहतर स्तर सुनिश्चित करने की दृष्टि से बागवानी कृषि की एक महत्वपूर्ण गतिविधि है।
  • बागवानी प्रभाग के अंतर्गत दो बोर्ड और दो निदेशालय आते हैं। ये है-राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड और नारियल विकास बोर्ड तथा कोचीन स्थित काजू विकास निदेशालय तथा कालीकट स्थित कोको, सुपारी और मसाले विकास निदेशालय। 

केन्द्रीय क्षेत्र की और केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजनाएं-
(क) केन्द्रीय क्षेत्र की योजनाएं-
(1) राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के कार्यक्रम; 
(2) विशिष्ट पौधों के बाग लगाना; 
(3) नारियल विकास बोर्ड के कार्यक्रम; 
(4) केरल में तेल-खजूर के पेड़ लगाना और तेल-खजूर का संसाधन; 
(5) काली मिर्च के लिए केन्द्रीय पौधशालाएं तैयार करना;
(6) कोका विकास के लिए योजना और 
(7) फलों व शाक-सब्जियों विशेषकर सब्जियों के बीजों का उत्पादन;
 

(ख) केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजनाएं-
(1) बढ़िया सेब के उत्पादन के लिए बेहतर प्रौद्योगिकी;
(2) केन्द्रशासित प्रदेशों में केला और अनानास के विकास के एकमुश्त कार्यक्रम; 
(3) काजू के विकास के लिए एकमुश्त कार्यक्रम; और मसालों के विकास के लिए समन्वित कार्यक्रम।

भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के कारणों का उल्लेख 

भारतीय कृषि के पिछड़ेपन का कारण
(1) सामान्य कारण
(अ) कृषि क्षेत्र में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव
(ब) ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक व आर्थिक पिछड़ापन
(स) वित्त एवं विपणन सुविधाओं का अभाव
(द) मानसून की अनिश्चितता
(2) संस्थागत कारण
(अ) उपखण्डन एवं उपविभाजन के कारण खेतों का आकार छोटा होना।
(ब) भू-स्वामित्व की अनुचित पद्धति के कारण काश्तकारों पर लगान का भारी बोझ तथा असुरक्षा
(स) ग्रामीण क्षेत्रों में बैंको की अपर्याप्त मात्रा के कारण ऋण सुविधाओं का अभाव
(3) तकनीकी कारण
(अ) अधिकांशतः पिछड़ी एवं अव्यावहारिक पद्धति
(ब) बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयों, उपकरणों आदि आगतों का अभाव।

भारत में बागवानी और पुष्प कृषि

  • कृषि जलवायु की अत्यधिक विभिन्नता भारत को बागवानी फसलों की कई किस्मों का उत्पादन करने में सक्षम बनाती है जिसमें फल, सब्जियां, फूल, मसाले और बागानी फसलें शामिल हैं। सुव्यवस्थित उच्च भूमि की चाय और काॅफी बागानों से लेकर विस्तृत और प्रायः नारियल के पेड़ों की घनी तटीय पट्टियों के साथ-साथ अन्तभौम कन्द और मूल वाली फसलें देश में बागवानी संभाव्यता की विविध प्रकृति की परिचायक हैं। देश को केले, आम, नारियल और काजू के विश्व-उत्पादन में प्रथम स्थान प्राप्त है और यह रसदार अनानास तथा  सेब के उत्पादन वाले दस देशों में शामिल है। फूलगोभी के विश्व-उत्पादन में भारत का प्रथम स्थान है और आलू, टमाटर, प्याज और हरी मटर के उत्पादन वाले दस शीर्षस्थ देशों में शामिल है। बागवानी उत्पाद-फल, सब्जियां, फूल, काजू, मसाले कुल कृषि निर्यात का लगभग 25 प्रतिशत होता है।
  • पुष्प कृषि-फूलों का उत्पादन, विशेषतया कटे हुए फूलों की निर्यात संभाव्यता, हाल के वर्षाें में अधिक उत्पादन वाले एक उदीयमान क्षेत्र के रूप में उभरा है। फूलों के उत्पादन में भारत की उपब्धियाँ उल्लेखनीय हैं। करीब 1014 लाख हेक्टेयर जमीन पर फूलों की खेती की जा रही है। जिसमें 6,70,000 मीट्रिक टन खुले फूल और 13009.3 मिलियन कतरे फूल शामिल हैं।

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